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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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कारण सारा बाग का बाग सूखा जा रहा है। उसमें न तो
अच्छे फूल आते हैं और न फल ही। तब वह वहाँ से बिदा
हो अपनी दूसरी लड़की से मिलने कोहार के घर गया। वह
लड़की मन मारकर द्वार पर बैठी हुई थी। पिता से मिलकर
बड़ी प्रसन्न हुई और अपना सारा दुखड़ा सुनाकर फिर मौन
हो गई। पिता ने उसकी ऐसी उदासी का कारण पूछा तो
वह बोली- "हे पिताजी! मैं आपसे अपने दुख की बात
क्या कहूँ। इधर कई दिनों से मेह बराबर बरस रहा है। न
बरतन सूखने पाते हैं और न सूखी गोहरी ही आँवाँ लगाने
को मिलती है। सब हाल रोजगार बन्द है। न मालूम इस
बारिस का क्रम कब तक जारी रहेगा।" पिता अपनी दोनों
लड़कियों की पृथक पृथक चाहना सुनकर चुप रहगया और
सोचने लगा-"यह सब कुछ नहीं, हम जीव धारी अपनी-
अपनी चाहते हैं। परन्तु ईश्वर किसकी करे और किसकी न
करे। वह जो कुछ करता है सब भला ही करता है।" इस
दृष्टान्त को सुनाकर बीरबल ने कहा- "पृथ्वीनाथ ! यों तो
पेशे के अनुसार सब की चाहना अलग-अलग होती है, परन्तु
आपके प्रश्नों का वही ठीक उत्तर है जो मैंने पहले दोनों दोहों
में आपको सुनाया है। बादशाह बीरबल के उत्तर से बहुत
सन्तुष्ट हुए।