अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद २३०
को देख रहा था। पहले जब वह आया तो उसके हाथ
पर केवल खैनी थी। चूने की तलाश में अगल बगल की
दीवारों को देखता जा रहा था। दैवात् एक सण्डास पर
ताजा चूना छूया गया था। झट अँगुलियों से चूना पोछकर
खैनी बनाकर खा लिया। अब आपही बतलावें कि जो
सण्डास का चूना खैनी में मिलाकर खाने में नहीं हिचकता
उसके लिये यह काम करना कौनसा आश्चर्य है।” उसी
समय मुझे विदित हो गया कि यह व्यक्ति व्यसनों का सच्चा
गुलाम है। बादशाह को बीरबल की ऐसी गुप्त पहिचान
से बड़ी प्रसन्नता हुई और वह घर आकर उसको एक जोड़ी
दुशाला पारितोषिक दिया।
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लोहा और पारश का स्पर्श
एक दिन सन्ध्या समय बादशाह बीरबल को साथ ले
घोड़सवारी द्वारा हवा खाने के लिये महल से बाहर निकले। ये
आपस में वार्तालाप करते हुए मध्य बाजार में जा पहुँचे। वहाँ
सब प्रकार की वस्तुएँ बिक रही थीं, परन्तु इन्हें क्या प्रयोजन
जो कहीं उतर कर कुछ सौदा खरीदते। इसी बीच बादशाह
की दृष्टि एक वृद्धा स्त्री पर पड़ी। उसके हाथ में पुरानी म्यान
से ढकी हुई एक तलवार लटक रही थी। उसकी तलवार
देखते ही बादशाह के जी में आया कि अक्सर पुराने
लोगों के पास अच्छी वस्तुए निकल आती हैं। इसलिये