अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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ठगों ने कहा-"बहुत अच्छा, हम कल दोपहर को आपके
पास आवेंगे, परन्तु आप भी एक बातका ध्यान रखना कि
जब हम दोनों ही एक साथ होकर आवें तो आभूषणों को देना
अन्यथा नहीं।" वे ठग इस प्रकार उसे बातों में बाँधकर
वहाँ से आगे बढ़े। कुछ दूर जाकर वे फिर वापस
लौटे। उनमें से एक आदमी कुछ दूर मोड़ पर एक
आदमी से झूठी गप्प मारने लगा और दूसरा उस सेठ की
दूकान पर पहुँचकर बोला-"सेठजी ! हमारा विचार रास्ते
में जाकर पलट गया इसलिये हमको फिर लौटकर आपके पास
आना पड़ा। हम चाहते हैं कि इस समय आप हमारे आभूषणों
को लौटा दें, कल दोपहर को हम इनको लेकर आपके
पास आवेंगे, तबतक आप भी ग्राहक ठीक कर रक्खें।" सेठने
कहा-"तुम्हारी चीज तुमको लौटाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं
है परन्तु तुमारा दूसरा साथी कहाँ है; उसको भीअपने साथ
लेकर आओ।" ठगने अँगुली का संकेत कर उसे नुक्कड़ पर एक
दूसरे आदमी से बातचीत करते हुए दिखलाया। व्योपारी ने
देखा तो बात सही थी। वह नुक्कड़ पर खड़ा होकर किसी से कुछ
वार्तालाप कर रहा था। व्योपारी को अब कोई शक न रहा,
वह आभूषणों को तत्काल उसे दे दिया और अपने काम में
दत्तचित्त हुआ। उसको इनकी तरफ से कोई शंका नहीं
थी क्योंकि उसका हृदय साफ था। इससे वह दूसरोंको भी
अपने ही समान समझता था।
दूसरे दिन दोपहर के समय दूसरा ठग आया और सेठ
से अपने गहनों की माँग। सेठने कहा-"गहने तो कल ही