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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

अकबरबीरबल विनोद १२४

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अकबरबीरबल विनोद १२४
मँगवाया। उन दोनोंके लालों का आकार एक सा था। तब एक
एक कर पाँचों साखियों का लाल भी मँगाकर देखा वे
पाँचो पाँच ढंग के थे! उनमें लाल के आकार का एक
भी न निकला। तब रूपचन्द के स्त्री की तलबी हुई, भला वह
बिचारी लाल का हाल क्या जाने निरा चुप रह गई। बीरबल
ने उससे पूछा-“तू ने अपना लाल क्यों नहीं बनाया?” वह पर्दे
की आड़ से बोली-“सरकार! आजतक मैं ने लाल आँखों से
देखा भी नहीं है तो कौन सा आकार बनाकर आपको
दिखलाती।” बीरबल ने उसकी करतूतों से उसे निर्दोष
समझा और उसको यह भी प्रकट हो गया कि यह सारी
करतूत फूलचन्द की ही, है, केवल अपने भाई को ठगने के लिये
ही यह सब प्रपंच रच रखा है। बीरबल फूलचन्द के साखियों
को फिर से धमकाया, परन्तु वे भलीभाँति गढ़ छोल कर
तय्यार किये गये थे। इसलिये उनमें से एक भी नहीं डिगा। तब
बीरबल ने दो सिपाहियों को इशारे से बुलाकर कोड़ा लगाने का
संकेत किया। वे दोनों चाबुक लेकर आगे आये और बीर-
बल के दूसरी आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे। यह दशा उपस्थित
देख उनमें से दो साखी फूट गये और वे सत्यर बात कहने को
प्रस्तुत हुये। उनका दूसरा बयान इस प्रकार हुआ-“पृथ्वी-
नाथ! हमारा कसूर माफ किया जाय क्योंकि हमने जो कुछ
भी झूठ कहा है उसका कारण एकमात्र फूलचन्द है। उसनेही
हमलोगों को बहकाकर झूठ बोलवाया है।”
बीरबल को फूलचन्द का हीं सारा दोष प्रतीत हुआ और
उसे ललकार बोला-“अब बता, तू क्या कहता है, तेरे

१२५ अकबर बीरबल विनोद

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१२५ अकबर बीरबल विनोद
साखियों ने अभी तेरे सामने क्या कहा है ? फूलचन्द ने उत्तर
दिया-“हुजूर मार की डर से भूत भागता है, आखिर वे तो
मनुष्य ही हैं। केवल मार से बचने के लिये ही सबों ने आपके
सामने झूठ बोलना स्वीकार किया है।" इस पर बीरबल ने
कहा-“तब ये मोम का पिंड लाल के आकार का क्यों नहीं
बनालाये, यदि लाल को देखे होते तो जरूर बना लाते।” बेशक
तू झूठा है और सजा के काबिल है।" बीरबल ने सिपाहियों
को उसे कोड़े लगाने की आज्ञा दी। सिपाहियों ने दोनों
तरफ से एक एक कोड़े जमाये। रूपचन्द भी ठिकाने आ गया
और अपना कसूर गर्दन कर अर्ज किया-“हुजूर वें लाल
मेरे ही पास हैं मैं उन्हें अभी ला देता हूँ।” लालों को मँगा कर
बीरबल ने एक लाल रूपचन्द को दिया और दूसरा फूलचन्द
के हिस्से का राज-कोष में जमा करा दिया। फूलचन्द
और उसके साखियों को झूठा बोलने के कारण उचित
दण्ड दिया गया।
—:*:—
सब सयानों का एकमत
एक दिन बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल
संसार के मनुष्यों की बुद्धि एक समान होती है वा
उसमें कुछ अन्तर भी होता है।” बीरबल ने जवाब दिया-
“पृथ्वीनाथ ! क्या आपने इस कहावत को नहीं सुना है-“सब
सयानों का एक मत।” यानी और सब बातों में तो लोगों
की बुद्धि में विभेद पाया जाता है, परन्तु स्वार्थ सिद्धि में

अकबर बीरबल विनोद १२६

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अकबर बीरबल विनोद १२६

सबकी मति एक समान ही देख पड़ती है।”
बादशाह बोला-“भला यह कैसे हो सकता है कि बुद्धि
तो जुदी जुदी हो और विचार सबका एक हो?”
बीरबल ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! “हाथ कंगन को आरसी
क्या।” यदि आपको प्रमाण की आवश्यकता हो तो मैं कल्ह
ही सिद्ध करके दिखला देने को तय्यार हूँ।”
बादशाह ने कहा-“बहुत बेहतर ।”
दूसरे दिन प्रातः काल बीरबल ने बादशाह की
अनुमति प्राप्तकर सरकारी बगीचे का एक बड़ा हौज़ जो
पानी से लबालब भरा था रिक्त करवा दिया और सारे नगर
में ढिंढोरा पिटवा दिया कि सब लोग अपने अपने घरों से
एक एक घड़ा दूध लाकर हौज़ को भरें। फिर हौज़ के ऊपर
एक सफेद चादर बिछवाकर उसे भलीभाँति ढक दिया। ऐसी
तरकीब कर बादशाह को देखने के लिये बुलवा भेजा। समय
रात्रिका था लोगों ने विचार किया कि जब हौज़ में इतना
घड़ा दूध पड़ेगा तो भला उसमें एकाध घड़ा जल छोड़
देने से खराबी क्या खराबी होगी । इसी विचार से
प्रत्येक घरों से दूध की जगह पानी ही डाला गया।
अँधेरी रात में किसी को भी न सूझा कि हौज़ में सभी लोग
पानी ही छोड़ रहे हैं। उनका निजी अनुमान था कि
मेरे सिवा अन्य नागरिक हौज़ को दूध ही से भर रहे हैं?
यदि किसी ने साहस कर देखा भी तो चादर की सफेदी
के कारण दूध का भ्रम हो गया, पानी तो नीचे छिपा हुआ था
जब सबेरा हुआ तो बादशाह बीरबल के साथ हौज़ का दूध

२७ अकबर बीरबल विनोद

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२७ अकबर बीरबल विनोद
खने के लिये गया। बीरबल ने बागवान को हौज की चादर
उठाने की आज्ञा दी। जब चादर उठा दी गई तो
हौज एकदम पानी से भरा हुआ निकला उसमें दूध
का लेश मात्र भी नहीं था। यह अजीब तमाशा देखकर
बादशाह दंग हो गया और उसकी समझ में न आया कि
आखिर मामला क्या है। जब बीरबल से उसका कारण
पूछा गया तो वह बोला- "गरीबपरवर ! आपने अपनी आँखों
देख लिया अब भी "सब सयानों का एक मत" वाली कहावत
मानने को तय्यार हैं वा नहीं ?
बादशाह ने सशंक होकर उत्तर दिया- "बीरबल कहावत
तो अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है, परन्तु फिर भी मैं
पूर्णतया संतुष्ट नहीं हुआ हूँ अतएव इसमें और भी खोज बीन
करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। अब मैं उसका
स्वयं अन्वेषण कर लूँगा तुम्हे कुछ करने की आवश्य-
कता नहीं है।
बीरबल तो हृदय से बादशाह का भक्त था इसलिये चुप
रह गया। दूसरे दिन जब बादशाह सोकर उठा तो उसे वही
बात वाली धुन समाई। वह अन्वेषण करने के अभिप्राय
से भेष बदल कर नगर की तरफ चला। कई चक्कर काटने के
बाद उसको एक मकान दृष्टिगत हुआ। इसकी दीवारें बहुत
ऊँची न थीं और न कोई टीम टाम की सजावट ही थी,
परन्तु मकान खूब साफ सुथरा था। बादशाह ने इसी मकान को
अपने अन्वेषण का केन्द्र ठहराया और द्वार पर पहुँच कर
मकान की घुन्डी खड़खड़ाइ । किवाड़ खुल गया। भीतर से

अकबर बीरबल विनोद १२८

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अकबर बीरबल विनोद १२८
एक आदमी ने पूछा-"आप कहाँ से आये हैं और आपका यहाँ
किससे और क्या प्रयोजन है?"
बादशाह बोला-मैं एक मुसाफर हूँ, कल का इसशहर में
आया हूँ मैने अपना डेरा सराय में डाला है, आज नगर देखने
की इच्छा से निकला तो घूमते फिरते रास्ता भूलकर
इधर आ पहुँचा, थकावट के कारण मेरे बदन में पीड़ा हो रही
है इसलिये कुछ समय तक विश्राम लेकर अपनी थकावट
दूर करना चाहता हूँ। बादशाह के प्रस्ताव को मकान
मालिक ने स्वीकार करते हुये उसे भीतर बुला लिया
और एक चारपाई दिखला कर विश्राम करने की आज्ञा दी
बादशाह चारपाई पर जा पड़ा और मकान मालिक
अपना निजी काम करने लगा। जब वह सब कामों से निपट
चुका तो मुसाफर के पास आया और उससे कुछ खाने पीने
का अनुरोध किया, परन्तु बादशाह ने उसके प्रस्ताव को
अस्वीकार कर दिया। उससे मकान मालिक से आपस दारी
की बातें होने लगीं।
मुसाफिर (बादशाह)-"भाई कलह मैं इस नगर में आकर
एक ढिंढोरा सुना था क्या यह बराबर प्रति मास पीटा जाता
है वा इसी बार पीटा गया था। मैं बड़े आश्चर्य में पड़
गया हूँ कि इस ढिंढोरे से बादशाह का क्या प्रयोजन है।"
मकान मालिक ने उत्तर दिया-"नहीं भाई पहले ऐसा कभी
नहीं सुनने में आया था, कल्ही अचानक यह नई बात सुनने
में आई, मुझे इसका भेद कुछ भी नहीं मालूम है।"
उसने फिर पूछा-"तो बादशाह इतने दूध को लेकर

१२६ अकबर बीरबल विनोद

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१२६ अकबर बीरबल विनोद

आखिरश करेगा क्या।" मकानमालिक-“भाई चाहे वह जो
कुछ भी करे, परन्तु मैं आपसे सत्य २ बतलाता हूँ कि मैं तो दूध
की जगह हौज़ में पानी हीं डाल आया था।” मैंने देखा कि
शहर में जब सभी लोग दूध की तलाश में हैं तो इतना दूध
कहाँ से आवेगा और यदि हजारों घड़े दूध में इक घड़ा पानी
ही डाल दूँगा तो उससे क्या होता जाता है!”
बादशाह ने मुस्करा कर कहा-“बेशक! युक्ति तो आपने
अच्छी निकाली, परन्तु यह बात कहीं बादशाह की कानों तक
पहुँचे तो फिर आपकी कौन सी दुर्गति हो, इसपर भी
आपने कुछ बिचार किया था?” मकान मालिक ने कहा-“भाई
यह बात किसी प्रकार प्रकट नहीं हो सकती।” बादशाह ने
सोचा कि अब अपना असली स्वरूप इसपर प्रगट कर देना
चाहिये ताकि अपनी धूर्तता पर इसे पश्चात्ताप हो। वह
तुरत अपना ऊपरी लिवास हटाकर शाही लिवास में
प्रकट हुए। मकान मालिक बड़ा भयभीत हुआ और
उसका मुख मलीन हो गया। तब बादशाह उसे ढाढ़स
बँधाते हुए बोले-“तुम घबराओ नहीं, इससे तुम्हारा
कोई अनिष्ट न होगा। फिर असल बात तो यह है कि आपने
अपने मुख से ही अपना दोष स्वीकार किया है, सुनो मैं यहाँ
किसी अपराधी को दण्ड देने के अभिप्राय से नहीं आया हूँ
केवल मुझे झूठ सच की जाँच करनी थी, जो मैं शाही
लिवास में आया होता तो यह बात मुझे न मालूम होती।”
इस प्रकार उस मकानदार को निर्भय कर बादशाह अपने
चेहरे को फिर नकली लिवास में ढक लिया और उससे
६

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अकबर बीरबल विनोद १३०
बिदा हो एक दूसरे धनी के घर जा पहुँचे। यह धनी अपनी
दयालुता के कारण सारे नगर में विख्यात हो रहा था। बाद-
शाह ने उससे भी अपनी वही पहली युक्ति निकाली, यानी अपने
को बहुत थका माँदा बतलाकर थोड़ी देर के लिये आश्रय माँगा।
वह रईस बादशाह की थकावट सुन दयार्द्र हो कर बोला-
“मियाँ मुसाफिर! यह घर आपका ही है, आप सानन्द जितनी
देर जी चाहे विश्राम कर लो, वह सामनें कई चारपाइयाँ पड़ी
हुई हैं। वहाँ पर आपको सब प्रकार का सुपास मिलेगा।”
बादशाह ने कहा-“महाशय जी! मैं अपने भार से आपको
दबाने नहीं आया हूँ, बल्कि थोड़ी थकावट मिटाकर राही हो
जाऊँगा।” फिर उन दोनों में देशकाल की बातें छिड़ीं। बातों २ में
फँसाकर बादशाह ने फिर उससे वही बात छेड़ी। तब रईस
बोला-“भाई ! किफायत सभी को पसन्द है, दूसरे लोगों ने
चाहे भले ही दूध डाला हो; परन्तु मैंने तो पानी ही डाला है।
बादशाह ने कहा-“परन्तु इसपर आपने आगा-पीछा का विचार
नहीं किया नहीं तो दूध की जगह पानी न डालते। अगर
किसी प्रकार यह बात बादशाह को प्रगट हो जायगी तो
आप राजाज्ञा भंग करने के अपराधी होंगे।” धनाढ्य ने कहा-
“सिवा मेरे और आपके दूसरा कोई भी मनुष्य इस बात को
नहीं जानता। यदि तुम नहीं कहोगे तो बादशाह किसी प्रकार
नहीं जान सकता।”
बादशाह ने अपना नकली लिवास उतार कर अलग रख
दिया और उसके देखते २ असली लिवास में हो गया। “काटो
तो बदन में लोहू नहीं।” विचारा धनाढ्य एकदम ठिठुक गया

१३१ अकबर बीरबल विनोद

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१३१ अकबर बीरबल विनोद
उसके हवास गुम हो गये । तब बादशाह उसे आश्वासन
देते हुए बोला-“चिन्ता करने की कोई बात नहीं है, जैसे
आपने किया है उसी प्रकार सभी लोग अपने २ घर किया
करते हैं, परन्तु उसके लिये किसी को दण्ड नहीं दिया
जाता।” उसे धीरज दे बादशाह शाही पोशाक बदल कर चला
गया और बीरबल के पाण्डित्य की सतत प्रशंसा की ।

थोड़ा और बहुत
एक दिन बीरबल अपनी छोटी कन्या को साथ लेकर
दर्बार में गया । पहले बादशाह ने उस का बहुत प्यार किया
जब वह प्रसन्न होकर कुछ बातें करने को उद्यत हुई तो बाद-
शाह ने पूछा-“क्यों बेटी ! क्या तुम बातें करना जानती
हो ?” तब उस लड़की ने जवाब दिया-‘थोड़ा और बहुत ।’
बादशाह ने पूछा-इस “थोड़ा और बहुत” का क्या मतलब है?”
लड़की बोली-“सरकार ! इसका मतलब यह है कि बड़ों से
थोड़ा बोलना जानती हूँ और छोटों से बहुत ।” उस लड़की
की ऐसी बुद्धिमत्तापूर्ण बातें सुनकर बादशाह को बड़ी
प्रसन्नता हुई, और बीरबल के घराने की स्वाभाविक
हाजिर जवाबी पर ईश्वर को कोटिशः धन्यवाद दिया ।
—:०:*:०:—
घुँघची की माला
एक दिन धार्मिक बातों पर चरचा छिड़ी तो बादशाह
ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल ! तुम्हारे कृष्ण

अकबर बीरबल विनोद १३२

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अकबर बीरबल विनोद १३२
भगवान घुँघची की माला क्यां पसंद करते हैं, ? उन्हें एक
से एक अमूल्य रत्नों की मालाएँ क्यों नहीं पसन्द आतीं ?”
बीरबल ने उत्तर दिया—“पृथिवीनाथ ! हमारे शास्त्र में
ऐसा लिखा है कि जो एक बार भी सोने से तौला जाता
है वह पवित्र हो जाता है; फिर यह घुँघची तो बारंबार सोने
से तौली जाती है। यही खास कारण है कि घुँघची के माले
की इतनी प्रतिष्ठा की जाती है। इसी विचार से भगवान कृष्ण
भी बहुमूल्य हीरे मोतियों की मालाओं को न पहनकर
इसे अपने गले का हार बनाते हैं। इस उत्तर से बादशाह का
चेहरा खिल गया और हँस पड़े।
बीरबल के कुटुम्ब की परीक्षा ।
एक दिन बादशाह के मन में बीरबल के कुटुम्ब की परीक्षा
लेने का उमंग उठा। वे अपना भेष बदलकर कई अन्य
सभासदों के साथ बीरबल के घर पहुँचे। इस समय बीरबल
के घर पर कोई बड़ा बूढ़ा आदमी नहीं था, वे लोग निजी
काम से घर से बाहर चले गये थे। केवल बीरबल का एक
छोटा लड़का और एक लड़की आपस में द्वार पर खेल कूद
मचा रहे थे। लड़के ने बादशाह को देखकर कहा—“वह
आये।” तब लड़की ने लड़के के प्रश्न का उत्तर दिया—“वह
नहीं हैं।” बीरबल की स्त्री दालान में बैठी हुई कुछ दस्तकारी
कर रही थी, वह भी इनकी बातें बराबर सुनती जा रही
थी। वह बोली—“बच्चों ! यह भी होता है और वह
भी होता है।”

१३३ अकबल बीरबल विनोद

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१३३ अकबल बीरबल विनोद
इन तीनों की उपरोक्त गुप्त वार्ता सुनकर बादशाह लौट
गया और दरबार में पहुँच कर समस्त दरबारियों के सामने
इस बात की चर्चा की और उसका अर्थ भी पूछा—"वह
आये।” “वह नहीं हैं।” “और यह भी होता है वह भी होता है।”
ऐसी भेदभरी बातें सुनकर सब लोग चकित होकर
बादशाह का मुह देखने लगे। कितने दरबारियों ने तो लज्जा
वश अपनी गरदन नीची कर ली और नाखून से जमीन
कुरेदने लगे। जब बादशाह ने देखा कि इनसे कोई मतलब नहीं
निकलेगा तो वह बीरबल को बुलवाया और उससे भी ऊपर
कही बातें सुनाकर उसका अर्थ पूछा। बीरबल ने कहा—"गरीब
परवर ! यह वार्ता किसी मूर्ख पर छिड़ी थी। प्रश्नका तात्पर्य
यह निकलता है कि किसी सभ्य के घर उसकी अनुपस्थिति
में जाना उचित नहीं है और यदि कोई हठकर मूर्खतावश जावे
ही और उसके घर वाले उसके लिये ऐसा कहें तो समझना
चाहिये, "वह आये" यानी बैल राज आये। "वह नहीं है।"
याने इनको सींग नहीं है। "यह भी होता है और वह भी होता
है" "का यह अभिप्राय है कि किसी २ बैल को सींग रहती है
और किसी किसी को नहीं भी।"
बादशाह बीरबल के ऐसे सारगर्भित उत्तर को सुनकर
शरमिन्दा हुआ और उसने मन में ऐसी गुस्ताखी आगामी
कभी न करने का प्रण कर लिया।
—०*०—

अकबर बीरबल विनोद १३४

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अकबर बीरबल विनोद १३४
मित्र मित्र में ईर्षा ।
लोग कहा करते हैं कि सन्तान पर माता पिता के खून का
बड़ा असर पड़ता है; सो प्रत्यक्ष देखने में भी आया। बाद-
शाह और दीवानके मैत्री का प्रभाव उनके लड़कों पर भी पड़ा।
वे आपस में बड़े मित्र हो गए। यहाँ तक नौबत पहुँची कि वे
दोनों अपना सारा कारोबार छोड़कर। मैत्रीभाव का पालन करने
लगे। यह बात बढ़ते २ बादशाह के कान तक पहुँची, जिस
कारण वह बहुत क्षुभित हुआ और उनकी मैत्री भंग करने का
उपाय सोचने लगा। उसने इस काम का भार बीरबल को
सुपुर्द किया। एक दिन वह भरी सभा में दीवान के लड़के
को बुलाकर उसके कान से मुँह सटा कर अलग कर लिया,
परन्तु कहा कुछ भी नहीं। फिर लोगों को सुनाकर बोला-
“सावधान ! इस बात को किसी दूसरे के सामने कदापि न
कहना।” दीवान का लड़का वहाँ से विदा होकर चुपचाप
अपने घर चला गया।
जब दोनों मित्र फिर अपने समय पर एकत्रित हुए तो
शाहजादे ने पूछा- “कहिये मित्र ! आपके कान से लगकर कल
सभा में बीरबल ने क्या कहा था?” तब दीवान के लड़के ने
उत्तर दिया- “मित्रवर ! उसने मुझसे कहा तो कुछ भी नहीं,
परन्तु झूठमूठ मेरे कान से मुँह लगाकर हटा लिया।” शाह-
जादे ने कहा- “मित्रवर ! आज यह नयी प्रणाली कैसी? आप
तो कभी किसी बात की मुझसे छिपाव नहीं करते थे?” शाह-
जादे के मनमें इतनेही से खटका उत्पन्न हो गया, जिससे वह
थोड़े समय में ही दीवान के लड़के से पृथक हो गया और फिर

१३५ अकबर बीरबल विनोद

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१३५ अकबर बीरबल विनोद
कभी उससे मित्रता न की। इधर से दिल का झुकाव हट
जाने से उसका मन निजी कारोबार में लग गया। बादशाह ने
बीरबलकी इस बुद्धिमत्ता से बड़ा प्रसन्न हुआ और उसे खुश
करने के लिये बहुत सा पुरस्कार दिया।
मट्ठीचूस का द्रव्य ।
दिल्ली नगर एक बड़ा शहर है, उसमें सभी श्रेणी
के मनुष्य निवास करते हैं। इसी शहर में एक अति
दीन मनुष्य भी रहता था। यह बड़ा कंजूस था। कंजूसी
के कारण धीरे २ इसके पास बहुतेरी मुहरें इकट्ठी हो गईं ।
जब उसे मुहरों को घर में रखने से चोरी हो जाने की आशंका
हुई तो उन को एक छोटे से बक्स में बन्द कर एक विस्तृत
मैदान में आशापल्लव के नीचे गढ़ा खोदकर गाढ़ आया
ताकि उसे कोई चुरा न सके। उसकी देखरेख करने के लिये
कभी २ उस वृक्ष तले जाकर गुपचुप लौट आता।
एक दिन उसका द्रव्य वहाँ से गायब हो गया, और जब
वह नित्य के अनुसार पेड़तले अपना द्रव्य देखने गया तो
क्या देखता है कि वह जगह खुदी पड़ी है, वहाँ द्रव्य का नामो-
निशान तक नहीं है। मारे चिन्ता के छाती पीट २ कर रोने
और चिल्लाने लगा। इस प्रकार बड़ी देर तक कुँहुक २
कर रोता रहा, जब थककर लाचार हो गया तो हृदय को
ढाढ़स देते हुए कुछ शान्त हुआ। वह रात्रि चिन्तना करते
ही बीत गई। दूसरे दिन साहस कर बादशाह की अदालत
में गया। वहाँ के कुछ दरबारियों की सम्मति से

अकबर बीरबल विनोद १३६

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अकबर बीरबल विनोद १३६
एक कागज पर अपनी विपत्ति गाथा लिखकर बादशाह के
पास पेश किया। बादशाह उसका समाचार पढ़कर बड़े चिन्तित
हुए। सूमड़ा उनके सामने और भी फूट-फूटकर रोने लगा।
इसकी चिल्लाहट और रुलाई से सारा दर्बार घबड़ा उठा
सब लोग अपना २ कामकाज बंद कर एकमात्र उसकी दर्दभरी
रुलाई सुनने लगे। बादशाह के पूछने पर उस दुःखित सूमड़े
ने अपना आद्योपान्त समाचार कहकर गिड़गिड़ाता
हुआ बोला-"गरीबपरवर ! मैं बेहद लुट गया, मेरे
निर्वाह के लिये अब मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है, क्योंकर
जीवन-रक्षा करूँगा।" बादशाह का हृदय पिघल गया
खजांची को हुक्म दिया-"जबतक इसका द्रव्य नहीं मिलता
तबतक इसे खाने पहनने को दर्बार से दिया जाय।" फिर
सूमड़े को जाँच कराने की तसल्ली देकर बादशाह ने दूसरा
कार्य्यारम्भ किया।
जब सब कामों से निश्चिन्त होकर बादशाह और बीर-
बल सन्ध्या समय एकत्रित हुए तो बादशाह सूमड़े के संबंध
की बातें बतलाकर बोला- "बीरबल ! इसका खोज कराना बड़ा
जरूरी है।" यदि धन न मिला तो सूमड़ा रोते २ अपना प्राण गँवा
देगा।" बीरबल ने कहा- "पृथिवीनाथ ! मैं खोज कराकर
उसका द्रव्य यथाशीघ्र ढूँढ निकालने की कोशिश करूंगा।" तब
बादशाह को कुछ शान्ति मिली और फिर बीरबल के सहित
महल में दाखिल हुआ। वे एक अलग कमरे में बैठकर आपस
में गुप्त परामर्श करने लगे। कुछ देर 'बाद बीरबल को एक
युक्ति सूझी और वह उसे बादशाह से कहकर सुनाया।

१३७ अकबर बीरबल विनोद

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१३७ अकबर बीरबल विनोद

उसकी युक्ति से बादशाह भी सहमत हो गया और उसे
तत्क्षण कार्यान्वित करने के लिये बीरबल को आज्ञा दी।
बीरबल का कार्यारम्भ हुआ।
वह बहुतेरे वैद्यहकीमों को बुलावा भेजा, जब वे आये तो उन
से पूछा-“आपको जड़ी बूटियों का हाल भलीभाँति मालूम है—
यदि न भी मालूम हो तो एक हफ्ते में छानबीन कर बतलावें
कि आशापल्लव की पत्तियाँ और उसकी जड़ किन-किन
दवाओं में काम आती है?” बीरबल की आज्ञा मानकर सब
वैद्य लौट गये और घर पहुँचकर उसके अनुसन्धान में
यथासक्य कोशिश करने लगे।
जब सप्ताह का अन्तिम दिन आया तो अपनी-अपनी
सम्मति देने के लिये दर्बार में उपस्थित हुए। सभी ने अपनी
खोज का पृथक २ वर्णन किया; परन्तु बीरबल के मतलब की
बात किसीने नहीं बतलाई। तब उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ वैद्य
बोला-“दीवानजी! आपकी आज्ञानुसार मैंने भी अपने भरसक
अनुसन्धान किया है। बड़ी खोजबीन के पश्चात् मुझे निघण्टु
से एक बात मिली है। सुश्रुत और निघण्टु में लिखा है कि
आशापल्लव के पत्ते का चूर्ण बना कर देने से पीलिया रोग
वाले को तत्काल आरोग्य-लाभ होता है और जलन्धर वाले
रोगी को इसकी जड़ की धूनी देने से जलन्धर का रोग जड़
से जाता रहता है।”
बीरबल ने पूछा-“क्या आप बतला सकते हैं कि इस
महीने के अन्तर्गत कितने लोग जलन्धर के रोग से ग्रसित
हुए थे और उससे बचने के लिये उन रोगियों ने किन-किन

अकबर बीरबल विनोद १३८

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अकबर बीरबल विनोद १३८
औषधियों का सेवन किया था। इसका ठीक २ अनुसन्धान
कर आप लोग पुनः एक हफ्ते के बाद मुझसे मिलें और
सारी बातों का पूरा २ रिपोर्ट दें।"
वैद्यों ने घर पहुँचकर हर प्रकार से खोजबीन कर आठवें
दिन फिर दर्बार में उपस्थित हुए। एक वैद्य ने कहा-“पृथिवी-
नाथ ! इस मांस में केवल चार रोगियों की दवा की गई
थी जिसमें एक रोगी को आशापल्लव के जड़ की धूनी से
आरोग्य-लाभ हुआ था।"
तब बीरबल ने पुनः प्रश्न किया-“अच्छी बात है, अब
बतलाओ कि इसकी जड़ तुम लोग कहाँ-कहाँ से लाये थे,
ध्यान रहे कि झूठ बोलने वाले को कठिन दण्ड दिया
जायगा।" बीरबल की ऐसी सख्ती देखकर विचारे वैद्यों के
रोंगटे खड़े हो गये, उनमें से एक जो आशापल्लव के जड़ का
इस्तेमाल किये था; डरकर बोला-“महाशयजी ! मेरा नौकर
उसको जंगल से खोद लाया था, मेरा अपराध क्षमा किया
जाय, आगे फिर ऐसा न करूंगा।" बीरबल बोला-“पहले
उस नौकर को उपस्थित करो फिर जैसा होगा उसपर आगे
विचार किया जायगा।" वैद्य ने उसका पता ठिकाना बतला
दिया । तब एक अर्दली को भेजकर उसे बुलवाया
गया। नौकर तुरत हाजिर हुआ। बीरबल ने पूछा-"क्या तू
आशापल्लव के वृक्ष को पहचानता है?"
नौकर ने उत्तर दिया-“बेशक ! गरीबपरवर उसे मैं
बखूबी पहचानता हूँ।"
बीरबल-“किसी दिन तू वैद्य की आज्ञा से उसका मूल

१३६ अकबर बीरबल विनोद

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१३६ अकबर बीरबल विनोद
खोद कर लाया था।”
नौकर-“हाँ पृथिवीनाथ ! लाया था।”
बीरबल भृकुटी चढ़ाकर बोला-“क्या उस पेड़ के नीचे
गड़ी अशर्फियों को तू ही खोद लाया है ? बेहतरी चाहता है
तो उन्हें जल्द लाकर उपस्थित कर, नहीं तो अभी तेरी चमड़ी
उखाड़ ली जायगी।”
नौकर बीरबल की धमकियों में आकर घबड़ा गया और
काँपता हुआ बोला-“पृथिवीनाथ ! मेरा अपराध क्षमा किया
जाय तो मैं उन अशर्फियों को आपके सामने ला धरूँ। बीर-
बल ने उसे अभयदान दिया। वह अपने घर जाकर सारी
अशर्फियाँ उठा लाया। बीरबल अशर्फियों को देखकर भीतर
भीतर बड़ा प्रसन्न हुआ और उन अशर्फियों को मट्ठीचूस के
हवाले कर बिदा किया। विचारे वैद्य छोड़ दिये गये।
❖
जलकुण्ड में बरहमन
एक दिन शीत काल में कुछ लोगों के साथ बादशाह हवा
सेवन के लिये नगर से बाहर निकला। वह घूमते २ एक ऐसे
स्थान पर जा पहुँचा जहाँ एक पुराना जलकुण्ड जल से
लभालभ भरा हुआ था। उस कुण्ड पर आदमियों वा
जानवरों का समागम भी बहुत कम था। बादशाह ने अपना
हाथ कुण्ड में डुबोया, उसका जी सन्न हो गया, उस मैदान के
तालाब का जल हवा और ओसके प्रभाव से अत्यधिक शीतल
हो रहा था। बादशाह बड़ा रसिक और बहादुरों की कदर
करने वाला था। अतएव अपने साथियों के परीक्षार्थ बोला-

अकबर बीरबल विनोद १४०

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अकबर बीरबल विनोद १४०
“आप लोगों में कोई ऐसा भी बीर है जो इस जलकुण्ड में
धँसकर एक पहर रात्रि तक खड़ा रहे।”
किसी को बादशाह के प्रश्न का उत्तर देने का शाहस न
हुआ, आखिरकार फिर बादशाह ने एक दूसरी घोषणा
की। उसने कहा-“जो कोई आज इस तालाब के जल
में गले तक डूबकर रात्रि भर खड़ा रहेगा, उसको पचास
हजार रुपये बतौर पारितोषिक के दिये जायेंगे।”
फिर भी कोई मनुष्य उस जान लेवा देवा कर्तव्य के लिये
उद्यत न हुआ। तब उसी गिरोह का एक बरहमन जो वस्त्रा-
भाव के कारण अर्धनग्न हो रहा था, बढ़कर सबसे आगे
आया। उसने अपने मन में सोचा-“रोज रोज की यातना
से एक दिन में ही कष्ट सहकर प्राण त्याग देना उत्तम
है, मैं किसी दिन भर पेट अन्न खाकर नींद भर नहीं सोता,
रात दिन गरीबी की आग में जला करता हूँ, तो क्यों न इसी
बहाने प्राण त्याग दूँ ! यदि ईश्वर सहायक हुआ तब तो कहना
ही क्या है। इस पुरस्कार से आजन्म सुखपूर्वक निर्वाह
करूंगा।” फिर बादशाह से अपना दोनों हाथ जोड़कर
बोला-“पृथिवीनाथ ! मुझे आपकी शर्ते मंजूर हैं।” बादशाह
ने कहा-“अच्छी बात है, यदि तू अपने कौल का सच्चा निक-
लेगा तो मैं तुझे पचास हजार रुपयों के अतिरिक्त बहुत सा
वस्त्राभूषण भी इनाम में दूँगा।”
तालाब के चारों तरफ बादशाह ने संतरियों का पहरा
बैठा दिया। फिर वह दीन ब्राह्मण नंग धड़ंग होकर उस
जल में पैठा और राम राम करके सारी रात बिता

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दी । जब सबेरा हुआ तो रुपये लेने की लालचसे अपनी
गीली धोती निचोड़ता हुआ गिरता पड़ता दर्बार में
हाजिर हुआ । साथ में वे सब पहरे के सन्तरी भी थे।
बादशाह ने सन्तरियों से बरहमन के सच्चे झूठे के निस्बत
शाक्षी ली। सभों ने एक स्वर से उसका सच्चा होना स्वीकार
किया। बादशाह ने बरहमन को रुपये देने की आज्ञा दी।
मसल मशहूर है-“तेली का तेल जले और मशालची को पीड़ा
हो ।” परिश्रम किसने की और पुरस्कार कौन देगा, इसका
ख्याल न कर कुछ कुटिल दर्बारी जल गये और वे इस उपाय
में लगे कि येन केन उपायेन इसको यह द्रव्य न मिले।
उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ कुटिल चुपके से उठकर एक संतरी
से जा मिला और उसे उल्टी सीधी सिखाकर बादशाह के
सन्मुख खड़ा किया। वह बोला-“पृथिवीनाथ ! यह बरह-
मन तो जल में कंडा हो गया होता, परन्तु इसने एक चालाकी
की थी जिससे जीता बच गया। सामने पहाड़ पर आग जल
रही थी यह उसो को देखता हुआ उसकी गरमी के सहारे से
खड़ा रह गया।”
बादशाह बोला-“क्यों, क्या यह संतरी सच कह रहा है?”
इस पर एक दूसरे संतरी ने भी हामी भर दी। तब बादशाह
उस बरहमन से बोला-“देखो तुम अपने कौल पर नहीं रहे
बल्कि अग्नि को देखकर रात बिताया है अतएव तुमको
पुरस्कार के रुपये नहीं दिये जायँगे ।”
उस उपस्थित मंडली में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं
निकला जो उस दीन की सहायता करता । आखिरकार रोता

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बिलखता हुआ बीरबल के घर पहुँचा। उसका आद्योपान्त
समाचार सुनकर बीरबल ने उसे ढाढ़स दिया और उसे
चुपचाप घर जाकर बैठने की सम्मति देकर बिदा किया।
दूसरे दिन जब बीरबल को दरबार जाने का समय
हुआ तो एक नई तरकीब सोच कर निकाली। मार्ग में
एक नदी का तट मिला वहीं पर रुककर झटपट पड़ोस के
गाँव से एक बड़ा लम्बा बाँस मँगवाया और उसके सिरेपर
एक काली हड़िया बाँधकर उसमें पानी और थोड़ा दाल
चावल छोड़कर बाँस के तने को जमीन पर गाड़ दिया और
उससे सटकर आग जलाना शुरू किया।
जब दरबार के समय बादशाह अपनी सभा में आया तो
बीरबल अनुपस्थित था वह उसके आने की प्रतीक्षा करने लगा।
जब इस प्रकार घंटों हो गया और बीरबल नहीं आया तो
उसे चिन्ता हुई और तुरत बीरबल को बुलाने के लिये एक
द्रुतगामी दूत को भेजा। बीरबल के घर पहुँच कर
उस सिपाही को विदित हुआ कि बीरबल नदी तट पर
किसी कार्य्य वश गया है। वह सीधे नदी तट की तरफ मुड़ा
और वहाँ पहुँच कर बीरबल से बादशाह की आज्ञा सुनाकर
बोला-"आपको बादशाह शीघ्र बुला रहे हैं।"
बीरबल ने कहा-"भाई थोड़ी सबर कर फिर चलता
हूँ।" सिपाही बोला-"यह आप क्या कर रहे हैं?" बीरबल
ने उत्तर दिया-क्या तू इतना भी नहीं समझता, मैं खिचड़ी
पका रहा हूँ।" सिपाही बीरबल के चरित्रों से परिचित था
अतएव उसने उसमें कुछ रहस्य की बात समझकर हँसता

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हुआ चला गया। दरबार में पहुँचकर उसने बीरबल का सारा
वृतान्त कह सुनाया। बादशाह बीरबल से मिलने के लिये और
भी उत्सुक हुआ। कुछ समय और प्रतीक्षा करने पर जब वह
न आया तब उसे बुलाने के लिये एक दूसरे आदमी को भेजा।
वह भी वही पहले सा सूखा उत्तर लेकर लौटा। बादशाह मिनट २
पर उसे बुलाने को आदमी भेजने लगा, परन्तु बीरबल सबको
यही एक उत्तर देकर लौटाता—"भाई खिचड़ी पका रहा हूँ,
थोड़ी देर में आता हूँ।"
बादशाह को बीरबल की बाट निहारते-निहारते कई घंटे
हो गये और दरबार का सारा काम इसी आवा-जाही के
कारण बन्द रहा। बीरबल की ऐसी धृष्टता बादशाह
को असह्य हो गई और वह क्रोध में परिणत होकर
बोला- "वाह मुझे प्रतीक्षा करते करते कई घण्टों का समय
व्यतीत हो गया और अभी तक उसकी खिचड़ी
न पकी। मैं स्वयं चलकर उसकी खिचड़ी देखता हूँ।"
बादशाह कुछ लोगों को साथ लेकर स्वयं उस स्थान पर
गया, जहाँ महाशय बीरबल की खिचड़ी पक रही थी। अजीब
दृश्य था. ऊपर बाँस के सिरे में बँधी हुई एक काली हाँड़िया
टँगी थी और वह नीचे घास सुलगा कर खिचड़ी पका रहा
था। बादशाह बोला—"बीरबल यह तूँ क्या कर रहा है?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ खिचड़ी पका रहा हूँ!
बादशाह-"मैं देखता हूँ कि आज तुम्हारा दिमाग घूमा
हुआ है? भला-आकाश में हड़ियाँ टाँगकर कहीं जमीन पर
घास सुलगाने से खिचड़ी पक सकती है?"