अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद १३४
मित्र मित्र में ईर्षा ।
लोग कहा करते हैं कि सन्तान पर माता पिता के खून का
बड़ा असर पड़ता है; सो प्रत्यक्ष देखने में भी आया। बाद-
शाह और दीवानके मैत्री का प्रभाव उनके लड़कों पर भी पड़ा।
वे आपस में बड़े मित्र हो गए। यहाँ तक नौबत पहुँची कि वे
दोनों अपना सारा कारोबार छोड़कर। मैत्रीभाव का पालन करने
लगे। यह बात बढ़ते २ बादशाह के कान तक पहुँची, जिस
कारण वह बहुत क्षुभित हुआ और उनकी मैत्री भंग करने का
उपाय सोचने लगा। उसने इस काम का भार बीरबल को
सुपुर्द किया। एक दिन वह भरी सभा में दीवान के लड़के
को बुलाकर उसके कान से मुँह सटा कर अलग कर लिया,
परन्तु कहा कुछ भी नहीं। फिर लोगों को सुनाकर बोला-
“सावधान ! इस बात को किसी दूसरे के सामने कदापि न
कहना।” दीवान का लड़का वहाँ से विदा होकर चुपचाप
अपने घर चला गया।
जब दोनों मित्र फिर अपने समय पर एकत्रित हुए तो
शाहजादे ने पूछा- “कहिये मित्र ! आपके कान से लगकर कल
सभा में बीरबल ने क्या कहा था?” तब दीवान के लड़के ने
उत्तर दिया- “मित्रवर ! उसने मुझसे कहा तो कुछ भी नहीं,
परन्तु झूठमूठ मेरे कान से मुँह लगाकर हटा लिया।” शाह-
जादे ने कहा- “मित्रवर ! आज यह नयी प्रणाली कैसी? आप
तो कभी किसी बात की मुझसे छिपाव नहीं करते थे?” शाह-
जादे के मनमें इतनेही से खटका उत्पन्न हो गया, जिससे वह
थोड़े समय में ही दीवान के लड़के से पृथक हो गया और फिर