अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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आखिरश करेगा क्या।" मकानमालिक-“भाई चाहे वह जो
कुछ भी करे, परन्तु मैं आपसे सत्य २ बतलाता हूँ कि मैं तो दूध
की जगह हौज़ में पानी हीं डाल आया था।” मैंने देखा कि
शहर में जब सभी लोग दूध की तलाश में हैं तो इतना दूध
कहाँ से आवेगा और यदि हजारों घड़े दूध में इक घड़ा पानी
ही डाल दूँगा तो उससे क्या होता जाता है!”
बादशाह ने मुस्करा कर कहा-“बेशक! युक्ति तो आपने
अच्छी निकाली, परन्तु यह बात कहीं बादशाह की कानों तक
पहुँचे तो फिर आपकी कौन सी दुर्गति हो, इसपर भी
आपने कुछ बिचार किया था?” मकान मालिक ने कहा-“भाई
यह बात किसी प्रकार प्रकट नहीं हो सकती।” बादशाह ने
सोचा कि अब अपना असली स्वरूप इसपर प्रगट कर देना
चाहिये ताकि अपनी धूर्तता पर इसे पश्चात्ताप हो। वह
तुरत अपना ऊपरी लिवास हटाकर शाही लिवास में
प्रकट हुए। मकान मालिक बड़ा भयभीत हुआ और
उसका मुख मलीन हो गया। तब बादशाह उसे ढाढ़स
बँधाते हुए बोले-“तुम घबराओ नहीं, इससे तुम्हारा
कोई अनिष्ट न होगा। फिर असल बात तो यह है कि आपने
अपने मुख से ही अपना दोष स्वीकार किया है, सुनो मैं यहाँ
किसी अपराधी को दण्ड देने के अभिप्राय से नहीं आया हूँ
केवल मुझे झूठ सच की जाँच करनी थी, जो मैं शाही
लिवास में आया होता तो यह बात मुझे न मालूम होती।”
इस प्रकार उस मकानदार को निर्भय कर बादशाह अपने
चेहरे को फिर नकली लिवास में ढक लिया और उससे
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