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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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अकबर बीरबल विनोद १३६
एक कागज पर अपनी विपत्ति गाथा लिखकर बादशाह के
पास पेश किया। बादशाह उसका समाचार पढ़कर बड़े चिन्तित
हुए। सूमड़ा उनके सामने और भी फूट-फूटकर रोने लगा।
इसकी चिल्लाहट और रुलाई से सारा दर्बार घबड़ा उठा
सब लोग अपना २ कामकाज बंद कर एकमात्र उसकी दर्दभरी
रुलाई सुनने लगे। बादशाह के पूछने पर उस दुःखित सूमड़े
ने अपना आद्योपान्त समाचार कहकर गिड़गिड़ाता
हुआ बोला-"गरीबपरवर ! मैं बेहद लुट गया, मेरे
निर्वाह के लिये अब मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है, क्योंकर
जीवन-रक्षा करूँगा।" बादशाह का हृदय पिघल गया
खजांची को हुक्म दिया-"जबतक इसका द्रव्य नहीं मिलता
तबतक इसे खाने पहनने को दर्बार से दिया जाय।" फिर
सूमड़े को जाँच कराने की तसल्ली देकर बादशाह ने दूसरा
कार्य्यारम्भ किया।
जब सब कामों से निश्चिन्त होकर बादशाह और बीर-
बल सन्ध्या समय एकत्रित हुए तो बादशाह सूमड़े के संबंध
की बातें बतलाकर बोला- "बीरबल ! इसका खोज कराना बड़ा
जरूरी है।" यदि धन न मिला तो सूमड़ा रोते २ अपना प्राण गँवा
देगा।" बीरबल ने कहा- "पृथिवीनाथ ! मैं खोज कराकर
उसका द्रव्य यथाशीघ्र ढूँढ निकालने की कोशिश करूंगा।" तब
बादशाह को कुछ शान्ति मिली और फिर बीरबल के सहित
महल में दाखिल हुआ। वे एक अलग कमरे में बैठकर आपस
में गुप्त परामर्श करने लगे। कुछ देर 'बाद बीरबल को एक
युक्ति सूझी और वह उसे बादशाह से कहकर सुनाया।