अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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हुआ चला गया। दरबार में पहुँचकर उसने बीरबल का सारा
वृतान्त कह सुनाया। बादशाह बीरबल से मिलने के लिये और
भी उत्सुक हुआ। कुछ समय और प्रतीक्षा करने पर जब वह
न आया तब उसे बुलाने के लिये एक दूसरे आदमी को भेजा।
वह भी वही पहले सा सूखा उत्तर लेकर लौटा। बादशाह मिनट २
पर उसे बुलाने को आदमी भेजने लगा, परन्तु बीरबल सबको
यही एक उत्तर देकर लौटाता—"भाई खिचड़ी पका रहा हूँ,
थोड़ी देर में आता हूँ।"
बादशाह को बीरबल की बाट निहारते-निहारते कई घंटे
हो गये और दरबार का सारा काम इसी आवा-जाही के
कारण बन्द रहा। बीरबल की ऐसी धृष्टता बादशाह
को असह्य हो गई और वह क्रोध में परिणत होकर
बोला- "वाह मुझे प्रतीक्षा करते करते कई घण्टों का समय
व्यतीत हो गया और अभी तक उसकी खिचड़ी
न पकी। मैं स्वयं चलकर उसकी खिचड़ी देखता हूँ।"
बादशाह कुछ लोगों को साथ लेकर स्वयं उस स्थान पर
गया, जहाँ महाशय बीरबल की खिचड़ी पक रही थी। अजीब
दृश्य था. ऊपर बाँस के सिरे में बँधी हुई एक काली हाँड़िया
टँगी थी और वह नीचे घास सुलगा कर खिचड़ी पका रहा
था। बादशाह बोला—"बीरबल यह तूँ क्या कर रहा है?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ खिचड़ी पका रहा हूँ!
बादशाह-"मैं देखता हूँ कि आज तुम्हारा दिमाग घूमा
हुआ है? भला-आकाश में हड़ियाँ टाँगकर कहीं जमीन पर
घास सुलगाने से खिचड़ी पक सकती है?"