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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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१३६ अकबर बीरबल विनोद
खोद कर लाया था।”
नौकर-“हाँ पृथिवीनाथ ! लाया था।”
बीरबल भृकुटी चढ़ाकर बोला-“क्या उस पेड़ के नीचे
गड़ी अशर्फियों को तू ही खोद लाया है ? बेहतरी चाहता है
तो उन्हें जल्द लाकर उपस्थित कर, नहीं तो अभी तेरी चमड़ी
उखाड़ ली जायगी।”
नौकर बीरबल की धमकियों में आकर घबड़ा गया और
काँपता हुआ बोला-“पृथिवीनाथ ! मेरा अपराध क्षमा किया
जाय तो मैं उन अशर्फियों को आपके सामने ला धरूँ। बीर-
बल ने उसे अभयदान दिया। वह अपने घर जाकर सारी
अशर्फियाँ उठा लाया। बीरबल अशर्फियों को देखकर भीतर
भीतर बड़ा प्रसन्न हुआ और उन अशर्फियों को मट्ठीचूस के
हवाले कर बिदा किया। विचारे वैद्य छोड़ दिये गये।
❖
जलकुण्ड में बरहमन
एक दिन शीत काल में कुछ लोगों के साथ बादशाह हवा
सेवन के लिये नगर से बाहर निकला। वह घूमते २ एक ऐसे
स्थान पर जा पहुँचा जहाँ एक पुराना जलकुण्ड जल से
लभालभ भरा हुआ था। उस कुण्ड पर आदमियों वा
जानवरों का समागम भी बहुत कम था। बादशाह ने अपना
हाथ कुण्ड में डुबोया, उसका जी सन्न हो गया, उस मैदान के
तालाब का जल हवा और ओसके प्रभाव से अत्यधिक शीतल
हो रहा था। बादशाह बड़ा रसिक और बहादुरों की कदर
करने वाला था। अतएव अपने साथियों के परीक्षार्थ बोला-