अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
Page 138 of 292
Read in contextअकबरबीरबल विनोद १२४
मँगवाया। उन दोनोंके लालों का आकार एक सा था। तब एक
एक कर पाँचों साखियों का लाल भी मँगाकर देखा वे
पाँचो पाँच ढंग के थे! उनमें लाल के आकार का एक
भी न निकला। तब रूपचन्द के स्त्री की तलबी हुई, भला वह
बिचारी लाल का हाल क्या जाने निरा चुप रह गई। बीरबल
ने उससे पूछा-“तू ने अपना लाल क्यों नहीं बनाया?” वह पर्दे
की आड़ से बोली-“सरकार! आजतक मैं ने लाल आँखों से
देखा भी नहीं है तो कौन सा आकार बनाकर आपको
दिखलाती।” बीरबल ने उसकी करतूतों से उसे निर्दोष
समझा और उसको यह भी प्रकट हो गया कि यह सारी
करतूत फूलचन्द की ही, है, केवल अपने भाई को ठगने के लिये
ही यह सब प्रपंच रच रखा है। बीरबल फूलचन्द के साखियों
को फिर से धमकाया, परन्तु वे भलीभाँति गढ़ छोल कर
तय्यार किये गये थे। इसलिये उनमें से एक भी नहीं डिगा। तब
बीरबल ने दो सिपाहियों को इशारे से बुलाकर कोड़ा लगाने का
संकेत किया। वे दोनों चाबुक लेकर आगे आये और बीर-
बल के दूसरी आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे। यह दशा उपस्थित
देख उनमें से दो साखी फूट गये और वे सत्यर बात कहने को
प्रस्तुत हुये। उनका दूसरा बयान इस प्रकार हुआ-“पृथ्वी-
नाथ! हमारा कसूर माफ किया जाय क्योंकि हमने जो कुछ
भी झूठ कहा है उसका कारण एकमात्र फूलचन्द है। उसनेही
हमलोगों को बहकाकर झूठ बोलवाया है।”
बीरबल को फूलचन्द का हीं सारा दोष प्रतीत हुआ और
उसे ललकार बोला-“अब बता, तू क्या कहता है, तेरे