अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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दी । जब सबेरा हुआ तो रुपये लेने की लालचसे अपनी
गीली धोती निचोड़ता हुआ गिरता पड़ता दर्बार में
हाजिर हुआ । साथ में वे सब पहरे के सन्तरी भी थे।
बादशाह ने सन्तरियों से बरहमन के सच्चे झूठे के निस्बत
शाक्षी ली। सभों ने एक स्वर से उसका सच्चा होना स्वीकार
किया। बादशाह ने बरहमन को रुपये देने की आज्ञा दी।
मसल मशहूर है-“तेली का तेल जले और मशालची को पीड़ा
हो ।” परिश्रम किसने की और पुरस्कार कौन देगा, इसका
ख्याल न कर कुछ कुटिल दर्बारी जल गये और वे इस उपाय
में लगे कि येन केन उपायेन इसको यह द्रव्य न मिले।
उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ कुटिल चुपके से उठकर एक संतरी
से जा मिला और उसे उल्टी सीधी सिखाकर बादशाह के
सन्मुख खड़ा किया। वह बोला-“पृथिवीनाथ ! यह बरह-
मन तो जल में कंडा हो गया होता, परन्तु इसने एक चालाकी
की थी जिससे जीता बच गया। सामने पहाड़ पर आग जल
रही थी यह उसो को देखता हुआ उसकी गरमी के सहारे से
खड़ा रह गया।”
बादशाह बोला-“क्यों, क्या यह संतरी सच कह रहा है?”
इस पर एक दूसरे संतरी ने भी हामी भर दी। तब बादशाह
उस बरहमन से बोला-“देखो तुम अपने कौल पर नहीं रहे
बल्कि अग्नि को देखकर रात बिताया है अतएव तुमको
पुरस्कार के रुपये नहीं दिये जायँगे ।”
उस उपस्थित मंडली में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं
निकला जो उस दीन की सहायता करता । आखिरकार रोता