अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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औषधियों का सेवन किया था। इसका ठीक २ अनुसन्धान
कर आप लोग पुनः एक हफ्ते के बाद मुझसे मिलें और
सारी बातों का पूरा २ रिपोर्ट दें।"
वैद्यों ने घर पहुँचकर हर प्रकार से खोजबीन कर आठवें
दिन फिर दर्बार में उपस्थित हुए। एक वैद्य ने कहा-“पृथिवी-
नाथ ! इस मांस में केवल चार रोगियों की दवा की गई
थी जिसमें एक रोगी को आशापल्लव के जड़ की धूनी से
आरोग्य-लाभ हुआ था।"
तब बीरबल ने पुनः प्रश्न किया-“अच्छी बात है, अब
बतलाओ कि इसकी जड़ तुम लोग कहाँ-कहाँ से लाये थे,
ध्यान रहे कि झूठ बोलने वाले को कठिन दण्ड दिया
जायगा।" बीरबल की ऐसी सख्ती देखकर विचारे वैद्यों के
रोंगटे खड़े हो गये, उनमें से एक जो आशापल्लव के जड़ का
इस्तेमाल किये था; डरकर बोला-“महाशयजी ! मेरा नौकर
उसको जंगल से खोद लाया था, मेरा अपराध क्षमा किया
जाय, आगे फिर ऐसा न करूंगा।" बीरबल बोला-“पहले
उस नौकर को उपस्थित करो फिर जैसा होगा उसपर आगे
विचार किया जायगा।" वैद्य ने उसका पता ठिकाना बतला
दिया । तब एक अर्दली को भेजकर उसे बुलवाया
गया। नौकर तुरत हाजिर हुआ। बीरबल ने पूछा-"क्या तू
आशापल्लव के वृक्ष को पहचानता है?"
नौकर ने उत्तर दिया-“बेशक ! गरीबपरवर उसे मैं
बखूबी पहचानता हूँ।"
बीरबल-“किसी दिन तू वैद्य की आज्ञा से उसका मूल