१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
अध्याय २ में इस प्रकार वर्णन मिलता है—
शुकदेव जी के अन्त-करण में स्वतः ही ज्ञान उत्पन्न हुआ
था। पर उससे काम न चला। इस सम्बन्ध में 'महोपनिषद्'
अध्याय २ में इस प्रकार वर्णन मिलता है—
जात मात्रेण मुनिराड् यत्सत्यं तदवाप्तवान् ।
तेनासौ स्व विवेकेन स्वमेव महामनाः ।
प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्तवान् ।
"उन शुकदेव जी को बिना गुरु के उपदेश के ही स्वतः
आत्मज्ञान हुआ था। उनकी वासनाएँ स्वतः निवृत्त हो गई
थीं। परन्तु वह ज्ञान दृढ़ न होने के कारण उनके मन को शान्ति
नहीं हुई। उन्हें अपने ज्ञान में विश्वास नहीं हुआ। इसलिए
अपने पिता व्यास जी के आदेश से उन्हें जनक के पास ज्ञान
ग्रहण करने जाना पड़ा।"
यह भी ध्यान रखने की बात है कि सत्पात्र श्रद्धालु और
विश्वासी शिष्य ही गुरु कृपा का लाभ उठा सकता है। जिसमें
यह गुण नहीं उस ऊसर भूमि में किसी भी गुरु का बोया हुआ
ज्ञान-बीज नहीं जम सकता है। गुरु के एक पक्षीय प्रयत्न से
भी शिष्य का कल्याण नहीं हो सकता। दोनों ही पक्षों की
श्रेष्ठता से गुरु-शिष्य संयोग का सच्चा लाभ मिलता है। कहा
भी है: -
गुरुश्चेदुद्धरत्यज्ञमात्मीयात्पौरुषादृते ।
उष्ट्रं दान्तं बलीवर्दं तत्कस्मान्नोद्धरत्यसौ ।
—योगवाशिष्ठ ५।४३।१६
"यदि गुरु किसी अविचारी और पुरुषार्थहीन का उद्धार
कर सकते होते तो ऊँट हाथी बैल आदि का उद्धार क्यों न
करते ?"
( ४५ )
आज कोई गुरु बनने की फिकर में है। क्योंकि इससे
गुरु बनने वाले को शिष्य से पूजा, सम्मान, आदर और दक्षिणा
मिलते रहने से धन का लाभ भी होता है और अपने अहङ्कार की
तृप्ति भी होती है। इसलिये लोगों ने शिष्य मूँडना, कान
फूंकना भी एक व्यवसाय बना लिया है। पर वस्तुतः यह कार्य
हर किसी का नहीं है। जिसमें इतना चरित्र तथा आत्मबल
हो कि अपना ही नहीं शिष्य का भी कल्याण कर सके, उसे ही
यह महान उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लेने का साहस करना
चाहिये। गुरु की योग्यता इस प्रकार की होनी चाहियेः—
मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः।
सर्वागमानां सारज्ञः सर्व शास्त्रार्थ तत्ववित्।
परोपकार निरतो जप पूजादि तत्परः।
अमोघ वचनः शान्तोवेद वेदार्थ पारगः।
योगमार्गानुसन्धायी देवताहृदयङ्गमः।
इत्यादि गुण सम्पन्नो गुरुरागम सम्मतः।
—शारदातिलक
"जो असली माता-पिता से पैदा हो सदाचारी हो, शुद्ध
भावना वाला हो, इन्द्रियाँ जिसके वश में हों, जो समस्त शास्त्रों के
सार को जानता हो, परोपकारी हो, जप पूजा आदि उपासनाओं
में संलग्न हो, जिसकी वाणी अमोघ हो, शान्त हो, वेद
और वेदार्थ का पारदर्शी हो, योगमार्ग में जिसकी प्रगति हो, जो
हृदय में देवता के समान हो, इस प्रकार के गुण जिसके
स्वभाव में हों, वही शास्त्र सम्मत गुरु बनाने योग्य है।"
ऐसे गुरु ही अपने द्वारा दीक्षित शिष्य का हित-साधन
कर सकते हैं। कहा भी है :—
( ४६ )
यः समः सर्व भूतेषु विरागो वीत मत्सरः ।
कर्मणा मनसा वाचा भीतेचाभयदः सदा ॥
समबुद्धिपदं प्राप्तस्तत्रापि भगवन्मयः ।
पञ्चकाल परश्चैव पाञ्चा रात्रार्थ वित्तथा ॥
विष्णु तत्वं परिज्ञाय एकं चानेक भेदगम् ।
दीक्षयेन्मेदिनीं सर्वां किं पुनश्चोपसन्नतान् ॥
—तत्त्वसार
"जो समस्त प्राणियों को समान मानते हैं, राग-द्वेष रहित
हैं, मन-कर्म वचन से दूसरों के दुख को दूर करने में रत हैं,
जिनकी बुद्धि सम है, जो भगवन्मय हैं, जो नित्य कर्म में
सावधान हैं, भगवत् तत्व को जानते हैं, वे शरणागत अधि-
कारी शिष्य को ही नहीं सारी पृथ्वी को दीक्षित कर
सकते हैं।"
शास्त्रों में दस श्रेणी के व्यक्तियों को गुरु कहा गया है—
उपाध्यायः पितामाता ज्येष्ठो भ्राता महीपति
मातुलः श्वसुरश्चैव मातामह पितामहो ।
वर्ण ज्येष्ठः पितृव्यश्च सर्वे ते गुरवः स्मृताः ॥
—कौर्य० उत्तरा० १२।२६
"उपाध्याय, पिता-माता, बड़ाभाई, राजा, मामा श्वसुर,
नाना, बाबा, ब्राह्मण ये दस गुरु कहे गये हैं।"
किन्तु इन सब में आचार्य श्रेणी के गुरु की महत्ता विशेष
रूप से प्रतिपादित की गई है :—
आचार्य श्रेष्ठो गुरूणाम्
—गौ० ध० सू १।३।५६
( ४७ )
गुरुओं में आचार्य ही श्रेष्ठ है। आचार्य किसे कहते हैं ?
उसमें यह लक्षण होने चाहिये :—
आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि ।
स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन चोच्यते ।
— वायुपुराण
“जो शास्त्रों के उद्देश्यों (अर्थों) को जाने, स्वयं सदाचारी
हो और जनता को सदाचार में लगावे उसे आचार्य कहते हैं।”
स्वयमाचरते यस्मादाचारं स्थापयत्यपि ।
आचिनोति च शास्त्राणि आचार्यस्तेनचोच्यते
—ब्रह्माण्ड पर्व ३२।३२
“स्वयं श्रेष्ठ आचरण करे और दूसरों को वैसी ही प्रेरणा
करे। शास्त्र के मर्म को जाने, उसे आचार्य कहते हैं।”
इस श्रेणी के सत्पुरुष आजकल नहीं के बराबर हैं।
मनसि वचसि काये प्रेम पीयूष पूर्णा—
स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः।
परगुणपरमाणून् पर्वती कृत्य नित्यं
निज हृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः।
—भृतहरि
“जिनका मन, वचन और काया प्रेमरूपी अमृत में भरे
हैं, अपने उपकारों की बाढ़ से जो तीनों लोकों को निमग्न करते
हैं, दूसरों के छोटे गुणों को भी पर्वत के समान महान मानते हैं,
अपने हृदय को विकसित करते रहते हैं, ऐसे सन्त इस संसार में
कितने हैं ?”
फिर भी प्रयत्न करने से किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्तियों
( ४८ )
को सद्-गुरु क्षमता वाले मार्ग दर्शक भी प्रयत्न करने पर मिल
जाते हैं। संसार में किसी वस्तु का पूर्ण अभाव कभी नहीं होता।
कमी भले ही हो जाय।
शिष्य के भी गुरु के प्रति अनेक कर्तव्य हैं। उन सब में
आवश्यक कर्तव्य है सच्ची श्रद्धा और भक्ति भावना का होना।
यही वह आकर्षण है जिसके बल पर शिष्य गुरु के हृदय में से
आवश्यक सहायता और कृपा प्राप्त कर सकता है। यदि बछड़ा
थन को चूसेगा नहीं तो गाय उसके मुख में अपना दूध उड़ेल
नहीं सकेगी। जिसके मन में भक्ति भावना का अभाव है,
केवल चिन्ह पूजा के लिये अथवा प्रयोजन विशेष के लिये किसी
गुरु को वरण किया है तो ऐसे लोग वह प्रसाद प्राप्त नहीं कर
सकते जो श्रद्धा भावना वाले शिष्य प्राप्त करते हैं।
शिष्य को आरम्भ में गुरु-भक्ति की स्थापना हृदय में
करनी पड़ती है और यही आगे चलकर ईश्वर-भक्ति के रूप में
परिणित हो जाती है। गुरु-भक्ति ईश्वर-भक्ति का ही प्रारम्भिक
एवं स्थूल रूप है। आरम्भिक शिष्यों के लिये इसकी उपयोगिता
बताते हुये कहा गया है कि :-
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता
ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। प्रकाशन्ते महात्मनः।
---श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।२३
"जिसके मन में परमात्मा की भक्ति के समान ही गुरु
की भी भक्ति है, उसी महान आत्मा वाले के हृदय में यह ज्ञान
प्रकाशित होता है। उसी के हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित
होता है।"
माता-पिता पूज्य हैं। उनके प्रति संतान का महान कर्तव्य
एवं उत्तरदायित्व है, किन्तु शिष्य का गुरु के प्रति भी काम
( ४६ )
उत्तरदायित्व नहीं है, वरन् उससे भी कुछ अधिक ही है।
क्योंकि गुरु भी आध्यात्मिक जीवन को प्रदान करने वाला पितर
ही है।
गुरुर्गरीयान् मातृतः पितृतश्चेति मे भातिः ।
शा० १०८।१७
“माता-पिता से भी गुरु का स्थान ऊँचा है।”
क्योंकि—
माता पितरौ शरीरमेव काष्ठ कुं ण्यादि समं जनयतः ।
आचार्यस्तु सर्वं पुरुषार्थ क्षम रूपं जनयति ।
“माता-पिता तो लकड़ी के ढोल सरीखे इस देह को ही
जन्म देते हैं पर आचार्य सब पुरुषार्थ भरे अध्यात्म रूप को ही
जन्म देता है।”
अध्यात्म विद्या का प्रवेशद्वार गुरुदीक्षा है। यों भावना
से भी किसी को गुरु माना जा सकता है पर दीक्षा का विशेष
विज्ञान एवं महत्व है। कोई स्त्री चाहे तो भावना मात्र से भी
किसी को पति मान सकती है पर यदि विधिवत् विवाह संस्कार
के साथ देवताओं और गुरुजनों को साक्षी में पति वरण किया
जाय तो उसका प्रभाव और महत्व दूसरा ही है। गुरुदीक्षा
का भी अपना विज्ञान है। इस संस्कार के माध्यम से गुरु अपनी
प्राणशक्ति की चिनगारी शिष्य के हृदय में विधिवत् स्थापित
करता है। जो उचित शुभ सिंचन होते रहने से एक दिन प्रचण्ड
तेजोमयी दिव्य ज्योति के रूप में प्रस्फुटित होती है। साधन-
पथ के पथिकों के लिये यह प्रक्रया आवश्यक मानी गई है :—
दीक्षां बिना न मोक्ष स्यात् प्राणिनां शिव शासनात्,
सा च न स्याद विनाचार्यमित्याचार्यं परम्परा ॥
( ५ )
उपासना शते नापि यां विना नैव सिद्ध्यति ।
तां दीक्षामाश्रयेद् यत्नात् श्रीगुरोर्मन्त्रसिद्धये ॥
—पिच्छिला तंत्र
'शिवजी के आवेश के कारण दीक्षा के बिना किसी को
मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । आचार्य परम्परा के विरुद्ध दीक्षा
भी सफल नहीं होती । अनेकों प्रकार की उपासनायें हैं पर बिना
दीक्षा के कोई सफल नहीं होतो । गुरु दीक्षा के आधार पर
ही मोक्ष प्राप्त होता है।”
दिव्य ज्ञानं यतो दद्यात्कुर्यात्पापस्य संक्षयम् ।
तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तंत्र वेदिभिः ॥
दीक्षा मूलं जपं सर्वं दीक्षा मूलं परं तपः ।
दीक्षामाश्रित्य निवसेद्यत्र कुत्राश्रमे वासन् ।
देवि दीक्षा विहीनस्य न सिद्धिर्न च सद्गतिः ।
तस्मात्सर्वं प्रयत्नेन गुरुणादीक्षितो भवेत् ॥
“जिससे दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है और पापों का क्षय
होता है, इसलिये उसे दीक्षा कहते हैं। जप का मूल दीक्षा है,
तप का मूल दीक्षा है। किसी भी आश्रम में रहे दीक्षा लेकर
रहे। हे पार्वती ! दीक्षाहीन को न सिद्धि मिलती है न सद्गति ।
इसलिये प्रयत्नपूर्वक दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।”
ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।
यैर्नलब्ध्वा हरेर्दीक्षा नार्चितोवा जनार्दनः ॥
—स्कन्द पुराण
“संसार में वे मनुष्य पशु तुल्य हैं, उनके जीवन में क्या
लाभ ? जिनने दीक्षा लेकर भगवान् की उपासना नहीं की।”
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( ५१ )
दीक्षाग्नि दग्ध कर्मा सौ यायाद्विच्छिन्न बन्धनः ।
गतस्तस्य कर्म बन्धो निर्जीवश्च शिवो भवेत् ॥
—कुलार्णव
“दीक्षा की अग्नि में कर्म जल जाने से बन्धन कट जाते
हैं और जीव शिवत्व को प्राप्त कर लेता है ।”
दीयते परमं ज्ञानं क्षीयते पाप पद्धतिः ।
तेन दीक्षोच्यते मंत्रे स्वागमार्थ वलावलात् ॥
—लघु कल्प सत्र
“जिससे परम ज्ञान दिया जाय और पाप प्रकृया नष्ट
हो उसे शास्त्रों में दीक्षा कहा गया है ।”
दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पाप क्षयं ततः ।
तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्व तंत्रस्य संमता ॥
—विश्वसार
“जिससे दिव्य ज्ञान दिया जाय, और पाप क्षय हों, उसे
दीक्षा कहते हैं ।”
ददाति दिव्यं भावञ्चैत् क्षिणुयात् पाप संततिम् ।
तेन दीक्षेति विख्याता मुनिभिस्तंत्र पारगैः ॥
—गौतमीय तंत्र
“जिसके द्वारा दिव्य भाव दिया जाय और पाप शृङ्खला
टूटे, उसे मुनियों ने दीक्षा कहा है ।”
रसेन्द्रेण यथा विद्धमयः सुवर्णतां व्रजेत् ।
दीक्षा विद्धस्तथैवात्मा शिवत्वंलभते प्रिये ॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi --कुलर्णव
( ५२ )
"जिस प्रकार रसायन विधि से साधारण धातु स्वर्ण बन
जाती है, उसी प्रकार दीक्षा विधान से साधारण आत्मा भी
शिवत्व को प्राप्त करती है।"
अनीश्वरस्य मर्त्यस्य नास्तित्राता यथा भुवि ।
तथा दीक्षा विहीनस्य नेहस्वामी परत्र च ॥
—दत्तात्रेय यामल
"दीक्षा विहीन मनुष्य का इस लोक और परलोक में
कहीं कल्याण नहीं।
यथा कूर्मः स्वतन्यान्ध्यान मात्रेण पोषयेत् ।
वेध दीक्षोपदेशस्तु मानसः स्यात्तथाविधः ॥
—कुलार्णव
"जिस प्रकार कछुआ अपने बच्चों का ध्यान मात्र से
पोषण करता है, उसी प्रकार गुरु भी अपनी मनः स्थिति से
शिष्य की मनःस्थिति का पोषण करता है, इसे वेध-दीक्षा
कहते हैं।"
अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये मार्ग-दर्शक
का चुनाव एवं वरण करना आवश्यक है। यह कार्य विधि-
विधान के साथ सम्पन्न किया जाय तो ही उसका समुचित लाभ
भी मिलता है। गुरुदीक्षा का यही तत्वज्ञान है।
उपनिषदों में देव-उपासना
उपनिषदों में वर्णित साधना विधान में देव-उपासना का
भी महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ आत्म चिन्तन, ब्रह्मध्यान,
मनोनिग्रह, विवेक वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ है
( ५३ )
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वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं
महत्वों की चर्चा हुई है । कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर
ही हैं, उसमें :प्रतिपादित देवता के गुण धर्म एवं उपासना के
प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । उच्च मनोभूमि के साधक
वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ
नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ठ काम्य-प्रयो-
जनों की भी पूर्ति करते रहें, ऐसा अभिमत उपनिषद्कारों का
रहा है ।
सूर्य, शिव, गणेश, नृसिंह, गरुड़, हनुमान, कृष्ण, राम,
राधा, सीता, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, त्रिपुरा आदि देवी
देवताओं की उपासना का उद्देश्य क्या है और उनका क्या
प्रतिफल प्राप्त होता है,उसका वर्णन उन देवताओं के प्रयोजन से
बने हुए उपनिषदों में हुआ है । यह देवपूजा विशेषतया
लौकिक प्रयोजनों के लिये की जाती है । पीछे अध्यात्म-मार्ग पर
चलते हुए साधक ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर
अभिमुख हो जाता है। देव-उपासना भी परमात्मा के एक रूप
विशेष की ही पूजा है और उससे सीमित उद्देश्य की
पूर्ति भी होती है । देव-उपासना के परिणामों की कुछ चर्चा
नीचे देखिये:—
“एक बार कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा—मैंने
सूर्य की उपासना की, इससे तू मेरा एक पुत्र हुआ । तू सूर्य की
किरणों का सब ओर से आवर्तनकर, उन सबके रूप में ॐकार
का चिन्तन कर, इससे निश्चय ही तेरे बहुत पुत्र होंगे ।”
—छान्दोग्य, पंचम खंड
“सूर्य नारायण का आष्टाक्षर मंत्र नित्य जपने वाला
ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ५४ )
रोगों से छुटकारा मिलता है, दरिद्रता दूर होती है, पाप दूर
होते हैं। प्रातःकाल पाठ करने से भाग्यवृद्धि होती है। उसे
पशु, धन आदि के साथ ही वेदार्थ ज्ञान की उपलब्धि भी होती
है। सूर्य के हस्त नक्षत्र पर रहते हुये इसका जप करने वाला
महामृत्यु से पार होता है।"
—सूर्योपनिषद्
“चाक्षुषी विद्या नेत्र रोगों का नाश करने वाली तथा नेत्रों
को तेजयुक्त करने में समर्थ है। इसका विनियोग नेत्र रोगों के
शमनार्थ होता है।
—चाक्षुषोपनिद्
‘गणपति का अभिषेक करने वाला वक्ता बन जाता है।
चतुर्थी तिथि को उपवास करके जो इसे जपता है वह विद्यावान
होता है, ऐसा महर्षि अथर्वण का कथन है। इस मन्त्र द्वारा तप
करने वाले को कभी भय नहीं लगता। दूर्वा के अंकुरों द्वारा
गणपति का यजन करने वाला कुवेर के समान धनवान होता है।
लाजाओं द्वारा यज्ञ करने वाला यशस्वी होता है। सहस्र
मोदकों द्वारा यजन करने वाला इच्छित फल पाता है। जो घृत
और समिधा से यज्ञ करता है, उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता
है। सूर्य ग्रहण के समय किसी महानदी या प्रतिमा के निकट
बैठ कर जप करे तो मन्त्र सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा साधक
विघ्नों से भी छुटकारा पा लेता है।
—गणपत्युपनिषद्
“एक समय मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता अत्यन्त
भयभीत हुए और भागकर प्रजापति की शरण में पहुँचे।
ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान नृसिंह का मन्त्र बताया देवताओं ने
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इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा 'मृत्यु पर विजय प्राप्त करली। वे
सब पापों से मुक्त हो गये और संसार रूपी समुद्र को भी लांघ
गये। अतः जो मनुष्य मृत्यु, पाप और भवसागर से भय
मानता हो, वह इस नृसिंह मन्त्र की शरण ग्रहण करे।"
—नृसिंहपूर्वतापनोपनिषद्
"प्रजापति ब्रह्मा ने कहा—प्रणव, यजुर्लक्ष्मी, गायत्री और
नृसिंह गायत्री ये सब मन्त्रराज के अङ्गभूत मंत्र हैं। इनका
ज्ञाता ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ ही अन्त में अमृतत्व को प्राप्त कर
लेता है।"
—नृसिंहपूर्व तापनीयोपनिषद्
"जो व्यक्ति नृसिंह मन्त्र का नित्य प्रति जप करता है, वह
अग्नि की गति रोकने में भी समर्थ होता है वह वायु की भी
गति रोक देता है। सूर्य चन्द्रमा की गति तथा जल के
प्रवाह को रोक देता है। वह सब ग्रहों की गति रोक सकता है,
सब देवताओं को स्तंभित कर सकता है तथा विष का भी
स्तंभन कर सकता है।······सब देवताओं, यज्ञों तथा नागों
को आकर्षित कर लेता है। मनुष्य भी उसकी ओर खिंचते हैं
तथा सभी उससे आकर्षित रहते हैं।"
—नृसिंहपूर्व तापनीयोपनिषद्
नृसिंह सबका कल्याण करने वाले हैं। ये ही विष्णु
हैं। ये ही सर्वतोमुख हैं। ये ही उग्र वीर एवं तुरीय हैं। ये ही
महान् ज्वलन और भीषण हैं। ये ही कल्याण स्वरूप हैं
तथा ये ही मृत्यु के लिये भी मृत्यु हैं। ये ही 'नमामि' पद के
लक्ष्यार्थ तथा अहम्' पद के आश्रयभूत हैं—······'महान्
ज्वलन्, उग्र, वीर, भीषण,सर्वतोमुख, कल्याणमय नृसिंह रूप यह
( ५६ )
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सब कुछ ब्रह्म ही है..................अतः जो ब्रह्म को भय
रहित एवं उपरोक्त गुणों से सम्पन्न जानता है वह ज्ञानी भय
रहित होता है और ब्रह्म ही बन जाता है।”
—नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद्
“जो इस नरसिंह चक्र को जानता है, वह सभी वेदों का
अध्ययनकर्त्ता समझा जाता है। वह सभी यज्ञों का कर्त्ता समझा
जाता है। उसने सभी तीर्थों में स्नान कर लिया। उसे
सभी मन्त्रों की सिद्धियां भी प्राप्त हो जाती हैं। वह सर्वत्र शुद्ध
हो जाता है। सब की रक्षा करता है। भूत, प्रेत, पिशाच,
डाकिनी, शाकिनी, बेताल आदि भयङ्कर योनियों का
नाश करने वाला भी वह होता है और सब प्रकार निर्भय
हो जाता है।”
—नरसिंहषट्चक्रोपनिषद्
मनुष्यो ! इन भगवान नीलकंठ का दर्शन करो।
यही भगवान रुद्र हैं, जो जल में, औषधियों में निहित
होकर रोग रूप पापों को नष्ट करते हैं। यह प्राणियों के
लिए प्राण रूप हैं। तुम्हारे अमङ्गल को नष्ट करने के लिये और
अप्राप्त कामनाओं को पूर्ण कराने के लिये तुम्हारे निकट
पधारें।”
—नीलरुद्रोपनिषद्
“जो इस विद्या का अमावस्या के दिन अध्ययन करता है,
उसे सारे जीवन भर सांप नहीं काटते।...........मन से ही
बिष को मुक्त किया जा सकता है।”
—गरुड़ोपनिषद्
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ५७ )
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“जो कवित्व, भोग, निर्भयता अथवा मोक्ष की इच्छा
करता हो वह इन मन्त्रों के द्वारा भगवती सरस्वती की भक्तिपूर्वक
पूजा स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धा सहित विधिपूर्वक पूजा करने
वाला, नित्य स्तुति करने वाला भगवती की कृपा शीघ्र ही प्राप्त
कर लेता है। वह दूसरों से सुने बिना भी ग्रन्थों के अर्थों को
समझने वाला होता है।”
—सरस्वती रहस्योपनिषद्
“इस सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् की साधना से साधक
अग्निपूत और वायुपूत होता है। वह सब धन-धान्य, स्त्री, पुत्र,
हाथी, अश्व, गौ, भैंस, सेवक आदि ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर
ज्ञानी बनता है और अन्त में परम पद को प्राप्त करता है।”
—सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद्
“सर्वाङ्ग सुन्दरी त्रिपुरा देवी का देह रूप गुहा में स्थित
काम, रूप, कला का ध्यान करके मनुष्य काम रूप हो जाता है
और कामनाएँ पूर्ण करता है। इस कामोपभोग संस्कारों से फिर
जन्म धारण करने पड़ते हैं। अतः मोक्ष के इच्छुकों को यह कामो-
उपासना नहीं करनी चाहिये।”
--त्रिपुरोपनिषद्
———
देवता और उनकी सिद्धि साधना
इस सृष्टि का उत्पादक, पोषक, संहारक, कर्ता-हर्ता—एक
परमात्मा ही है। उसे ही अनेक नाम से पुकारते हैं।
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ती” उस एक ही सत् परमात्मा को
विद्वानों ने बहुत प्रकार से कहा है।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ५८ )
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सृष्टि में अनेकों प्रक्रयाएँ चलती हैं। उनकी संचालक
शक्तियां भी अनेक हैं। यद्यपि वे सभी परमात्मा की ही
शक्तियाँ हैं पर उनकी गतिविधियों की प्रथकता के अनुरूप उनके
नामकरण अलग-अलग किये गये हैं। सूर्य एक ही है पर उसकी
अनेक किरणें अपने गुण धर्म की प्रथकता के कारण अल्टा
वायलेट, अल्फा वायलेट, एक्सरेज़ आदि अनेक नामों से
पुकारी जाती हैं। मनुष्य शरीर एक ही है पर उसके विभिन्न
अंगों का उपयोग और स्वरूप भिन्न-भिन्न होने के कारण उन
अंगों के नाम भी पृथक-पृथक हैं। शरीर को जो कार्य करना
होता है वह अपने तदनुकूल अंग से ही उसे पूरा कराता है।
ईश्वर के विराट स्वरूप से अंग प्रत्यंगों को उसकी क्रिया-
किरणों को देवता नाम से पुकारते हैं। यह देवता अपने-
अपने कार्य क्षेत्र में उसी प्रकार संलग्न रहते हैं जिस प्रकार
किसी सरकार के अनेक मन्त्री एवम् अफसर अपने अपने विभाग
को संभालते हुये राजतन्त्र का संचालन करते हैं।
देवताओं की सत्ता पृथक से दृष्टिगोचर होते हुये भी वे
वस्तुतः एक ही विराट ब्रह्म के अवयव मात्र हैं। उनका स्वतन्त्र
अस्तित्व भासता तो है पर है नहीं। लहरें और बबूले जल के
ही अंग हैं। विविध देवताओं का जहाँ स्वरूप और गुण धर्म
शास्त्रकारों ने वर्णन किया है वहां यह भी स्पष्ट कर दिया है कि
वे सब वस्तुतः एक ही परमात्मा के अंग-प्रत्यंगमात्र हैं।
कहा गया है कि :—
एकं सद्विप्रा बहुता वदन्ति
—ऋग्वेद ६।३।२२।४६
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ५६ )
उस एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेक नामों से
वर्णन करते हैं।”
एकं सन्तं बहुधा कल्पपन्ति ।
“उस एक ही अनेक रूपों में कल्पना की गई है।”
सृष्टि स्थित्यन्तकरणीं ब्रह्मविष्णु शिवाभिधाम् ।
स संज्ञा यांति भगवानेक एक जनार्दनः ।
—विष्णु पुराण १।२।६६
“वह एक ही भगवान् सृष्टि का उत्पादन, पालन और
संहार करता है। उसी के ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाम हैं।”
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्
—एतरेय १।१।१
“यह आत्मा एक ही था !”
एकमेवाद्वितीयम्
—छान्दोग्य ६।२।१
“वह एक ही है, दो नहीं।”
एकैव सा महाशक्तिस्तया सर्वं भिदं ततम् ।
“वह एक ही महाशक्ति है। उसी से यह सारा विश्व
आच्छादित है।”
एक एव तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन
—शिव पुराण
“तब ( सृष्टि के आदि में ) अकेला रुद्र ही था और कोई
नहीं।”
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदुचंद्रमाः
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः
—यजु० ३२।१
( ६० )
“यह परमात्मा ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म,
और वरुण है।”
तमादि देवमजरं केचिदाहुः शिवामिधम्
केचिद्विष्णुं सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदुच्यते
—बृहन्नारदीय पुराण १।२।५
“उस अनादि, अजर परमात्मा कोई शिव, कोई विष्णु,
कोई ब्रह्मा कहते हैं।”
त्रिधाभिन्नोह्यहं विष्णो, ब्रह्मा विष्णु हराख्यया ।
सर्गरक्षालय गुणैर्निष्क्लोऽहं सदा हरे ।
—शिव पुराण २।१।६।२८
“सृष्टि के उत्पादन, पालन तथा संहार के गुणों के कारण
मेरे ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीन भेद हुये हैं। वस्तुतः मेरा
स्वरूप सदा भेद रहित है।”
ब्रह्मा दक्षः कुवेरो यमवरुणमरुद्वह्नि चन्द्रैन्द्र रुद्राः ।
शैलानद्यः समुद्रा ग्रह गण मनुजा दैत्य गन्धर्वनागाः ॥
द्वीपां नक्षत्र तारा रवि वसु मुनयोव्योमभूरिश्वनौ च ।
संलीना यस्य सर्वे वपुषि स भगवान् पातु वोर्विश्वस्वरूपः ॥
“ब्रह्मा, दक्ष, कुवेर, यम, वरुण, मरुत, अग्नि, चन्द्र, इन्द्र,
रुद्र, पर्वत, नदी, समुद्र, ग्रह, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व नाग, द्वीप,
नक्षत्र, तारागण, रवि, वसु, मुनि, आकाश-पृथ्वी, अश्वनीकुमार
आदि सभी जिसमें लीन हैं, उस विश्वरूप परमात्मा को
नमस्कार है।”
यो ब्रह्मा स हरिः प्रोक्तो यो हरिः स महेश्वरः ।
या काली सैव कृष्णः स्याद् यः कृष्ण सैव कालिका ॥
देव देवीं समुद्दिश्य न कुर्यादन्तरं क्वचित् ।
तत्तद्भेदों न मन्तव्यः शिव शक्तिमयं जगत् ॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
( ६३ )
“जो ब्रह्मा है वही हरि हैं, जो हरि हैं वे ही महेश्वर हैं।
जो काली है वही कृष्ण है, जो कृष्ण हैं वही काली है। देव
और देवी को लक्ष्य करके कभी मन में भेद भाव उत्पन्न होने
देना उचित नहीं है। देवता के चाहे जितने नाम और रूप
हों, सभी एक हैं। यह जगत् शिव शक्तिमय है।”
विभिन्न देवताओं की अलग-अलग उपासना का तात्पर्य
परमात्मा की उस शक्ति से सम्बन्ध स्थापित करना है जो साधक
के अभीष्ट प्रयोजन से सम्बन्धित है। जैसे समस्त प्रजा एक ही
राजा के राज्य में रहती है तो भी उसे अलग-अलग प्रयोजनों
के लिये अलग-अलग विभागों के दफ्तरी एवं कर्मचारियों के
पास जाना पड़ता है। देव उपासना का भी यही प्रयोजन है।
साधक अपनी आवश्यकता और आकांक्षा के अनुरूप उनमें
से समय समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और
छोड़ता रहता है।
किस देवता की आराधना किस प्रयोजन के लिये किस
प्रकार करनी चाहिये इसका वर्णन और साधना शास्त्रों में
विस्तारपूर्वक मिलता है। श्रीमद्भागवत में भी इस प्रकार
का प्रसंग आता है:–
ब्रह्मवर्चसमामस्तु यजेत ब्रह्मणस्पतिम् ।
इन्द्रमिन्द्रिय कामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् ॥
देवीं यायाँ तु श्रीकामस्तेजत्कामो विभावसुम् ।
वसुकामो वसून् रुद्रान्वीर्य कामोऽथ वीर्यवान् ॥
अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्ग कामोऽदितेः सुतान् ।
विश्वान् देवान् राज्यकामः साध्यान्संसाधको विशाम् ॥
आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टि काम इलां यजेत् ।
प्रतिष्ठा कामः पुरुषो रोदसी लोक मातरो ॥
रूपाभिकामो गन्धर्वान्स्त्रीकामोऽप्सर उर्वसीम् ।
[Header]
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( ६२ )
आधिपत्य कामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् ॥
यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् ।
विद्या कामस्तुगिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम् ॥
धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन्पितॄन्यजेत् ।
रक्षाकामः पुण्य जनानोजस्कामो मरुद्गणान् ॥
राज्य कामो मनून्देवान् निर्ऋतित्वभिचरन्यजेत् ।
कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् ॥
—श्रीमद्भागवत २।३।२—६
"ब्रह्मतेज की इच्छा वाले को ब्रह्मा की, इन्द्रिय भोगों के
लिये इन्द्र की, सन्तान के लिये प्रजापति की, सौभाग्य के लिये
दुर्गा, की तेज, के लिए अग्नि की धन के लिये वसुओं की,
वीर्य के लिए रुद्र की, अन्न के लिए अदिति की, स्वर्ग के लिए
आदित्यों की, राज्य के लिये विश्वेदेवों की, लोक प्रियता के लिए
साध्यगण की, दीर्घायु के लिए अश्विनी कुमारों की पुष्टि के
लिये बसुन्धरा की, प्रतिष्ठा के लिए अन्तरिक्ष की, रूप के लिए
गन्धर्वों की रमणी के लिये उर्वशी की, आधिपत्य के लिए
प्रजापति की, यश के लिए यज्ञ की, कोश के लिए वरुण की,
विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिये गौरी की, धन
संचय के लिये नारायण की, कुटुम्ब वृद्धि के लिए पितृगण की,
रक्षा के लिए यज्ञों की, बल के लिये मरुद्गण की, अभिचार
के लिए राक्षसों की, भोगों के लिए चन्द्रमा की, और जिसे कोई
इच्छा न हो वह परमात्मा की उपासना करे।"
यह देव शक्तियां विभिन्न आकार प्रकार में चित्रित की
गई हैं। इनकी आकृतियां, आयुध, वाहन, आदि का भी स्वरूप
दिखाया गया है पर वस्तुतः इस सब का आधार ध्यान-विद्या
का विज्ञान है। किस प्रकार से ध्यान करने पर कौन-सी
देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का
( ६३ )
देव शक्ति को साधक अपनी धारणा में अवतीर्ण कर सकता
है, इस सूक्ष्म विज्ञान के ज्ञाता बहुत खोज करने पर ही प्राप्त हो
सकते हैं।
देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का
महत्व है वहाँ श्रद्धा और विश्वास की सुदृढ़ भावना का होना भी
आवश्यक है। उथली श्रद्धा के साथ, केवल कौतुक, कौतूहल
समझकर, मन्त्र या देवता की परीक्षा के लिए कुछ आधा-अधूरा
साधन कर लेने से समुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता।
उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य
है। इस श्रद्धा-विश्वास को ही (अमृत) कहते हैं। इसी को पीकर
देवता तृप्त एवं प्रसन्न होते हैं। उपनिषद् में इसी प्रकार का
वर्णन आता है:—
न वै देवा अश्नन्ति, न पिवन्त्येत देवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।
—छान्दोग्य ३।६।१
“देवता न तो खाते हैं, न पीते हैं। केवल अमृत को देख
कर तृप्त रहते हैं।”
उपासक केवल विधि-विधान की लकीर पीट रहा है
या वह ‘अमृत’ भी अर्पण कर रहा है, इसकी परीक्षा के लिए
कई बार देवताओं की ओर से साधना काल में लोभ और भय
के अवसर उपस्थित किए जाते हैं। दुर्बल मनोभूमि का साधक
उस परीक्षा में विचलित हो जाता है, फलस्वरूप अभीष्ट सिद्धि
से उसे वंचित रहना पड़ता है।
यों देवता सर्वव्यापी हैं पर उनका सबसे निकटवर्ती
निवास स्थान अपनी 'देह' ही है। इस मानव शरीर में सभी
देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यङ्गों में विभिन्न