१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
६६ ] [द्वितीय अध्याय
६६ ] [द्वितीय अध्याय
प्रकाशात्मक होने के कारण यह चेतन स्वरूप है, परन्तु
वेदनात्मक होने से शिला रूप है। अपने अन्तरतम में यह विभिन्न
प्रकार के विश्व का उन्मेष करने वाला है। यह विश्व उसी का अपना
प्रकाश मात्र होने से उससे भिन्न नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में
परिलक्षित होता है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। सबसे सम्बद्ध
होने के कारण उसकी गति सर्वत्र है, परन्तु उसमें गति न होने से
चलता-फिरता नहीं है। निराश्रित होने से वह नास्ति रूप है, परन्तु
तत्स्वरूप होने के कारण उसे अस्ति रूप मात्र हो गया है। वही धन
देने वाले की महान गति है। आनन्द एवं विज्ञान रूप जो ब्रह्म है तथा
जिसका ग्रहण सभी मानसिक सङ्कल्पों का त्याग मात्र ही है, मेधावी
जन जिसकी प्रतीति जाग्रत अवस्था की प्रतीति न होने को ही कहते हैं
तथा जिसके संकोच से प्रलय और विकास से सृष्टि की रचना
होती है ॥ ६-१० ॥
निष्ठा वेदान्तवाक्यानामथ वाचामगोचरः ।
अहं सच्चित्परानन्दब्रह्म वास्मि न चेतरः ॥११
स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्वं विज्ञातवान् शुकः ।
स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ॥१२
इदं वस्त्विति विश्वासं नासावात्मन्युपाययौ ।
केवलं विररामास्य चेतो विषयचापलम् ।
भोगेभ्यो भूरिभङ्गेभ्यो धाराभ्य इव चातकः ॥१३
एकदा सोऽमलप्रज्ञो मेरावेकान्तसंस्थितम् ।
पप्रच्छ पितरं भक्त्या कृष्णद्वैपायनं मुनिम् ॥१४
संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने ।
कथं च प्रशमं याति कियत् कस्य कदा वद ॥१५
जो वेदान्त वाक्यों को निष्ठा रूप तथा वाणी के लिए अकथनीय
हैं, मैं उस सत् चित् एवं परमानन्द स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं हूँ।
महोपनिषत् ] [ ६७
अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा श्री शुकदेव जी ने यह सब कुछ जान लिया
और इस स्वयं उपलब्ध परम तत्व में वे निरन्तर लगे रहने वाले मन
से युक्त हुये। उनके हृदय में इस प्रकार विश्वास जम गया कि यही वस्तु
है, इनसे भिन्न कुछ नहीं है। जैसे धारा प्रवाह वर्षा से सन्तुष्ट हुये
चातक की चञ्चलता दूर हो जाती है, वैसे ही शुकदेव जी का चित्त
विभिन्न प्रकार के भोगों से उत्पन्न चञ्चलता से मुक्त होकर कैवल्य
अवस्था को प्राप्त हुआ। उन शुकदेव जी ने एक बार मेरु पर्वत के
निर्जन में स्थित अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन की कुटी में जाकर उनसे
भक्तिपूर्वक निवेदन किया—'महामुने ! इस संसार रूप प्रपञ्च की उत्पत्ति
किस प्रकार हुई और इसका विलय किस प्रकार होता है, यह क्या है,
किसका है, इसकी उत्पत्ति कब हुई, यह सब मुझे कृपापूर्वक
कहिये ॥ ११--१५ ॥
एवं पृष्टेन मुनिना व्यासेनाखिलमात्मजे ।
यथावदखिलं प्रोक्तं वक्तव्यं विदितात्मना ॥१६॥
अज्ञासिषं पूर्वमेवमहमित्यथ तत्पितुः ।
स शुकः स्वकया बुद्ध्वा न वाक्यं बहु मन्यत ॥१७॥
व्यासोऽपि भगवान् बुद्ध् वा पुत्राभिप्रायमीदृशम् ।
प्रत्युवाच पुनः पुत्रं नाहं जानामि तत्त्वतः ॥१८॥
जनको नाम भूपालो विद्यते मिथिलापुरे ।
यथावद्वेत्त्यसौ वेद्यं तस्मात् सर्वमवाप्स्यसि ॥१९॥
पित्रैत्युक्तः शुकः प्रायात् सुमेरोर्वसुधात लम् ।
विदेहनगरीं प्राप जनकेनाभिपालिताम् ॥२०॥
शुकदेव जी इस प्रकार जिज्ञासा देखकर आत्मज्ञानी मुनि ने
सभी बातें यथावत् कहीं। परन्तु शुकदेव जी ने समझा कि यह सब
बातें तो मैं पहले से ही जानता हूं और अपने पिता की बातों पर
विशेष ध्यान न दिया। उनके इस भाव को व्यास जी ने समझ लिया