१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १८७
त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् ] [ १८७
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अवकाशविधूतदर्शनपिण्डीकारणाधारणाः सूक्ष्मतमा जैव-
तन्मात्रविषयाः ॥ ७ ॥
एवं द्वादशाङ्गानि आध्यात्मिकान्याधिभौतिकान्याधिदैवि-
कानि । अत्र निशाकरचतुर्मुखदिग्वातार्कवरुणाश्व्यनीन्द्रोपेन्द्र-
प्रजापतियमा अक्षाधिदेवतारूपैर्द्वादशनाड्यन्तःप्रवृत्ताः प्राणा
एवाङ्गानि अङ्गज्ञानं तदेव ज्ञातेति ॥ ८ ॥
अथ व्योमानिलानलजलान्नानां पञ्चीकरणमिति । ज्ञातृत्वं
समानयोगेन श्रोत्रद्वारा शब्दगुणो वागधिष्ठित आकाशे तिष्ठति
आकाशस्तिष्ठति । मनो व्यानयोगेन त्वग्द्वारा स्पर्शगुणः पाण्यधि-
ष्ठितो वायौ तिष्ठति वायुयुस्तिष्ठति । बुद्धिरुदानयोगेन चक्षुर्द्वारा
रूपगुणः पादाधिष्ठितोऽग्नौ तिष्ठत्यग्निस्तिष्ठति । चित्तमपान-
योगेन जिह्वाद्बारा रसगुण उपस्थाधिष्ठितोऽप्सु तिष्ठत्यापस्ति-
ष्ठन्ति । अहंकारः प्राणयोगेन घ्राणद्वारा गन्धगुणो गुदाधिष्ठितः
पृथिव्यां तिष्ठति पृथिवी तिष्ठतीत्येवं वेद ॥ ६ ॥
ज्ञान, संकल्प, निश्चय, अनुसंधान अभिमान आकाश के कार्य
तथा अन्तःकरण के विषय है । समीकरण, नेत्र खोलना, पकड़ना, सुनना,
उच्छ्वास---ये वायु के कार्य और प्राणादि के विषय हैं । शब्द, स्पर्श रूप,
रस, गन्ध, ये अग्नि के कार्य और ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं और जल के
आश्रित हैं । बोलना, दान, गमन, विसर्जन तथा आनन्द पृथ्वी के कार्य
तथा कर्मेन्द्रियों के विषय हैं । ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के विषयों में
प्राण तथा तन्मात्राओं के विषय भी अन्तर्भूत हैं । मन और बुद्धि में
चित्त और अहङ्कार अन्तर्भूत हैं । अवकाश, हटाना, दर्शन, धारणा,
सूक्ष्मतम तन्मात्रा के विषय हैं । इस प्रकार बारह अङ्ग हैं, जो आध्या-
त्मिक, आधिभौतिक और अधिदैविक—तीनों भागों में हैं । इनमें चन्द्रमा,
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi