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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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“यह परमात्मा ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र, ब्रह्म,
और वरुण है।”
तमादि देवमजरं केचिदाहुः शिवामिधम्
केचिद्विष्णुं सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदुच्यते
—बृहन्नारदीय पुराण १।२।५
“उस अनादि, अजर परमात्मा कोई शिव, कोई विष्णु,
कोई ब्रह्मा कहते हैं।”
त्रिधाभिन्नोह्यहं विष्णो, ब्रह्मा विष्णु हराख्यया ।
सर्गरक्षालय गुणैर्निष्क्लोऽहं सदा हरे ।
—शिव पुराण २।१।६।२८
“सृष्टि के उत्पादन, पालन तथा संहार के गुणों के कारण
मेरे ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव यह तीन भेद हुये हैं। वस्तुतः मेरा
स्वरूप सदा भेद रहित है।”
ब्रह्मा दक्षः कुवेरो यमवरुणमरुद्वह्नि चन्द्रैन्द्र रुद्राः ।
शैलानद्यः समुद्रा ग्रह गण मनुजा दैत्य गन्धर्वनागाः ॥
द्वीपां नक्षत्र तारा रवि वसु मुनयोव्योमभूरिश्वनौ च ।
संलीना यस्य सर्वे वपुषि स भगवान् पातु वोर्विश्वस्वरूपः ॥
“ब्रह्मा, दक्ष, कुवेर, यम, वरुण, मरुत, अग्नि, चन्द्र, इन्द्र,
रुद्र, पर्वत, नदी, समुद्र, ग्रह, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व नाग, द्वीप,
नक्षत्र, तारागण, रवि, वसु, मुनि, आकाश-पृथ्वी, अश्वनीकुमार
आदि सभी जिसमें लीन हैं, उस विश्वरूप परमात्मा को
नमस्कार है।”
यो ब्रह्मा स हरिः प्रोक्तो यो हरिः स महेश्वरः ।
या काली सैव कृष्णः स्याद् यः कृष्ण सैव कालिका ॥
देव देवीं समुद्दिश्य न कुर्यादन्तरं क्वचित् ।
तत्तद्भेदों न मन्तव्यः शिव शक्तिमयं जगत् ॥
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi