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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०५

त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् [ २०५
॥ ९९ ॥ इस विधि से प्रातः मध्याह्न, सायं और आधीरात
को चार बार कुम्भक करे और उसे क्रमशः अस्सी मात्रा तक पहुंचा दे
॥ १०० ॥
एकाहमात्रं कुर्वाणः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
संवत्सरत्रयादूर्ध्वं प्राणायामपरो नरः ॥१०१
योगसिद्धो भवेद्योगी वायुजिद्विजितेन्द्रियः ।
अल्पाशी स्वल्पनिद्रश्च तेजस्वी बलवान्भवेत् ॥१०२
अपमृत्युमपक्रम्य दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।
प्रस्वेदजननं यस्य प्राणायामेषु सोऽधमः ॥१०३
कम्पनं वपुषो यस्य प्राणायामेषु मध्यमः ।
उत्थानं वपुषो यस्य स उत्तम उदाहृतः ॥१०४
अधमे व्याधिपापानां नाशः स्यान्मध्यमे पुनः ।
पापरोगमहाव्याधिनाशः स्यादुत्तमे पुनः ॥१०५
अल्पमूत्रोऽल्पविष्ठश्च लघुदेहो मिताशनः ।
पट्विन्द्रियः पटुमतिः कालत्रयविदात्मवान् ॥१०६
इस विधि से एक दिन अभ्यास करने से ही सब पापों से
छुटकारा हो जाता है और तीन वर्ष तक इस प्रकार प्राणायाम करने
वाला योग सिद्ध हो जाता है। वह योगी वायु को जीतने वाला,
जितेन्द्रिय, अल्प आहार, स्वल्प निद्रा वाला, तेजस्वी तथा बलवान
होता है। अकाल मृत्यु का भय मिटाकर दीर्घ आयु प्राप्त होती
है। जिस प्राणायाम में पसीना आता है वह अधम है, जिसमें शरीर में
कँपकँपी होती है वह मध्यम है और जिसमें शरीर ऊपर को उठता है
वह उत्तम है ॥ १०१--१०४ ॥ अधम प्राणायाम से व्याधि और
पापों का नाश होता है, मध्यम से महाव्याधियां, पाप तथा रोग
मिट जाते हैं, उत्तम से अल्प-मूत्र, अल्प-मल शरीर की लघुता