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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

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देव शक्ति को साधक अपनी धारणा में अवतीर्ण कर सकता
है, इस सूक्ष्म विज्ञान के ज्ञाता बहुत खोज करने पर ही प्राप्त हो
सकते हैं।
देव उपासना में जहाँ विधि-विधान और कर्मकाण्ड का
महत्व है वहाँ श्रद्धा और विश्वास की सुदृढ़ भावना का होना भी
आवश्यक है। उथली श्रद्धा के साथ, केवल कौतुक, कौतूहल
समझकर, मन्त्र या देवता की परीक्षा के लिए कुछ आधा-अधूरा
साधन कर लेने से समुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता।
उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य
है। इस श्रद्धा-विश्वास को ही (अमृत) कहते हैं। इसी को पीकर
देवता तृप्त एवं प्रसन्न होते हैं। उपनिषद् में इसी प्रकार का
वर्णन आता है:—
न वै देवा अश्नन्ति, न पिवन्त्येत देवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ।
—छान्दोग्य ३।६।१
“देवता न तो खाते हैं, न पीते हैं। केवल अमृत को देख
कर तृप्त रहते हैं।”
उपासक केवल विधि-विधान की लकीर पीट रहा है
या वह ‘अमृत’ भी अर्पण कर रहा है, इसकी परीक्षा के लिए
कई बार देवताओं की ओर से साधना काल में लोभ और भय
के अवसर उपस्थित किए जाते हैं। दुर्बल मनोभूमि का साधक
उस परीक्षा में विचलित हो जाता है, फलस्वरूप अभीष्ट सिद्धि
से उसे वंचित रहना पड़ता है।
यों देवता सर्वव्यापी हैं पर उनका सबसे निकटवर्ती
निवास स्थान अपनी 'देह' ही है। इस मानव शरीर में सभी
देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यङ्गों में विभिन्न