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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१५४ ] [ पंचम अध्याय

१५४ ] [ पंचम अध्याय
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आस्थामात्रमनन्तानां दुःखानामाकरं विदुः ।
अनास्थामात्रमभितः सुखानामालयं विदुः ॥८५
वासनातन्तुबद्धोऽयं लोको विपरिवर्तते ।
सा प्रसिद्धाऽतिदुःखाय सुखायोच्छेदमागता ॥८६
धीरोऽप्यतिबहुज्ञोऽपि कुलजोऽपि महानपि ।
तृष्णया बध्यते जन्तुः सिंहः शृङ्खलया यथा ॥८७
परमं पौरुषं यत्नमास्थायादाय सूक्ष्मम् ।
यथाशास्त्रमनुद्वेगमाचरन् को न सिद्धिभाक् ॥८८ .
अहं सर्वमिदं विश्वं परमात्माऽहमच्युतः ।
नान्यदस्तीति संवित्त्या पर [ प्रथ ] मा सा ह्यहंकृतिः ॥८९
सर्वस्माद्व्यतिरिक्तोऽहं वालाग्रादप्यहं तनुः ।
इति या संविदो ब्रह्मन् द्वितीयाऽहंकृति शुभा ॥६०
मोक्षायैषा न बन्धाय जीवन्मुक्तस्य विद्यते ॥६१
पाणिपादादिमात्रोऽयमह मित्येष निश्चयः ।
अहंकारस्तृतीयोऽसौ लौकिकस्तुच्छ एव सः ॥६२
वर्ज्य इव दुरात्माऽसौ कन्दः संसारदुस्तरोः ।
अनेनाभिहतो जन्तुरधोऽधः परिधावति ॥६३
अनया दुरहंकृत्या भावात् संत्यक्तया चिरम् ।
शिष्टाहङ्कारवान् जन्तुः शमवान् याति मुक्तताम् ॥६४
प्रथमो द्वावहङ्कारावङ्गीकृत्य त्वलौकिकौ ।
तृतीयाऽहंकृतिस्त्याज्या लौकिकी दुःखदायिनी ॥६५
अथ ते अपि संत्यज्य सर्वाहंकृतिवर्जितः ।
स तिष्ठते तथाऽत्युच्चैः परमेवाधिरोहति ॥६६
संसार में आशा ही अनन्त दुःखों को उत्पन्न करने वाली है,
केवल अनास्था ही सुख का सदन समझना चाहिए । वासना के सूत्र-
बन्धन में बँधा हुआ यह विश्व पुनः-पुनः प्रकट होता है । वह वासना

महोपनिषत् ] [ १५५
अत्यन्त दुःखदायिनी होती हुई समस्त सुखों को समूल नष्ट करने वाली
होकर आती है। वासना के पाश में अत्यन्त धीर, वीर कुलीन, महान्
अथवा बहुश्रुत भी वैसे ही बंध जाते हैं, जैसे जंजीरों में सिंह बँध जाता
है। ऐसा कौन-सा पुरुष है जो शास्त्रानुकूल आचरण और श्रेष्ठ कामों को
करता हुआ भी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता ? मैं सम्पूर्ण विश्वस्वरूप हूँ,
अच्युत परमात्मा हूँ, मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं है, इस प्रकार का
ज्ञानात्मक अहंभाव श्रेय माना गया है। 'मैं बाल के अग्रभाग से भी
अत्यन्त सूक्ष्म हूँ और सम्पूर्ण प्रपंच से परे हूँ' इस प्रकार का अहङ्कारयुक्त
भाव मुक्ति देने वाला है, बन्धन प्राप्त कराने वाला नहीं। जीवन्मुक्त
पुरुष ही ऐसे अहंभाव से युक्त होते हैं। 'मैं हाथ-पांव आदि सहित
शरीर वाला हूँ' यह लौकिक अहंकार अत्यन्त तुच्छ श्रेणी का है।
अहङ्कार से ओत-प्रोत दुरात्मभाव वाला प्राणी ही दुःखदायी संसार-वृक्ष
की जड़ है। इसके द्वारा ताड़ित जीव नीचे गर्त की ओर ही जाता है।
इस तृतीय प्रकार के दुःखदायी अहङ्कार को छोड़कर श्रेष्ठ अहंभाव में
लगने वाला प्राणी शमवान् होता हुआ कल्याण को पाता है। प्रारम्भ
में प्रथम दो अहंभावों में लगकर तीसरे प्रकार के अहंभाव का त्याग
करे और जैसे ही साधन शक्ति बढ़े, वैसे ही उन दोनों का भी त्याग
कर निरहंकार वृत्ति धारण करे, इससे ही उच्च पद की प्राप्ति
सम्भव है ॥८५-६६॥
भोगेच्छामात्र को बन्धस्तत्त्यागो मोक्ष उच्यते ।
मनसोऽभ्युदतो नाशो मनोनाशो महोदयः ।
ज्ञमनो नाशमभ्येति मनोऽज्ञस्य हि शृंखला । ६७
नानन्दं ननिरानन्दं नचलं नाचलं स्थिरम् ।
नसन्नासन्न चैतेषां मध्यं ज्ञाननिमनो विदुः ॥६८
यथा सौक्ष्म्याच्चिदाभास्य आकाशो नोपलक्ष्यते ।
तथा निरंशश्चिद्भावः सर्वगोऽपि न लक्ष्यते ॥६६