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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

प्रथमः खण्डः

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri

नीलरुद्रोपनिषत्

प्रथमः खण्डः

अपश्य त्वावरोहन्तं दिदितः पृथिवीमवः ।
अपश्यं युद्रमस्यन्तं नीलग्रीवं शिखण्डिनम् ॥
दिव उग्रोऽवारुक्षत् प्रत्यस्थाद्भूभ्यामधि ।
जनासः पश्यतेमं नीलग्रीवं विलोहितम् ॥
एष एत्यवीरहा रुद्रो जलासभेषजीः ।
वित्तेऽक्षेममनीनशद्धातीकारोऽप्येतु ते ॥
नमस्ते भवभामाय नमस्ते भवमन्यवे ।
नमस्ते अस्तु बाहुभ्यामुतो त इषवे नमः ॥
यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यास्तवे ।
शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिँँसीः पुरुषं जगत् ॥
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि ।
यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्मं सुमना असत् ॥
या त इषुः शिवतमा शिवं बभूव ते धनुः ।
शिवा शरव्या या तब तया नो मृड जीवसे ॥
या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।
तया नस्तन्वा शांतमया गिरिशन्ताभिचाकशीत् ॥
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुर्विलोहितः ।
ये चेमे रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशोऽवैषांहेड ईमहे ॥१॥
हे नीलकण्ठ ! अपने दिव्य धाम से भूमण्डल पर अवतीर्ण होते
हुए हमने आप को देखा । अपने उग्र रुद्र रूप से मोरपंख के समान
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

४२६ ] [ नीलरुद्रोपनिषत्
आकाश को अपना मुकुट बनाये हुए आप पृथिवी पर अविर्भूत होकर
पृथिवी में ही प्रतिष्ठित होते हुए दुष्टों का संहार करते हुए हम आपको
देखते हैं ।
मनुष्यों ! इन भगवान् नीलकण्ठ का अत्यन्त रक्तवर्ण है, इनका
दर्शन करो। यही भगवान् रुद्र हैं जो जल में उत्पन्न ओषधियों में निहित
होकर रोग रूप पापों को नष्ट करते हैं। यह प्राणियों के लिए प्राण रूप
हैं। अमङ्गल को नष्ट करने के लिए और अप्राप्त कामनाओं को पूर्ण
के लिए वे तुम्हारे निकट पधारें।
हे भगवान् रुद्र ! आपके क्रोध रूप को हमारा नमस्कार ! हे
भगवान् भव ! आपके क्रोधावेश रूप को नमस्कार । हे भगवान् नील-
कण्ठ ! आपकी दोनों भुजाओं और उनमें ग्रहण किए हुए बाणों को भी
नमस्कार । हे कैलाश निवासी शिव ! आप पर्वत पर निवास करते
हुए भी सबका कल्याण करते हो । आपने अपने जिस बाण का, दुष्टों को
लक्ष्य बनाने के लिए संधान किया है, उस बाण को हमारे लिए कल्याण
करने वाला कीजिए। उसके द्वारा हमारे जनों का संहार मत करना ।
हे कैलाशवासी शिव ! हम अपनी मङ्गलमयी वाणी के द्वारा
आपके अत्यन्त निर्मल यश का गान करते हैं। क्योंकि ऐसा करने से यह
सम्पूर्ण विश्व हमारे अनुकूल होकर दुःख से शून्य हो जायगा । आपके
बाण कल्याणकारी हैं। आपका धनुष और उसकी प्रत्यञ्चा भी कल्याण
के करने वाली है। हे कल्याणस्वरूप ! अपने इन आयुधों के द्वारा आप
हमें जीवन देते हैं ।
हे भगवान् रुद्र ! आप पर्वत पर निवास करते हुए भी सबका
मङ्गल करते हैं। आपका जो पापनाशक स्वरूप है, उसके द्वारा हमें सब
ओर से प्रकाश दीजिए। आपके लाल, अत्यन्त लाल, भूरा तथा ताम्रवर्ण
वाले विभिन्न स्वरूप हैं, उन सबकी स्तुति के लिए हम अभिलाषा करते
हैं ॥ १ ॥