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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय

१०४ ] [ द्वितीय अध्याय
फल की कामना किये कर्म में लगा रहता है. वह पुरुष जीवन्मुक्त ही
है। जिसने धर्माधर्म और सभी कामनाओं तथा सांसारिक विषयों के
चिन्तन का त्याग कर दिया है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं । जिसने इस
दिखाई पड़ने वाले विश्वरूप प्रपंच का भले प्रकार त्याग कर दिया है, वह
जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो पुरुष, खट्टे, चरपरे, कडुवे, मीठे, नमकीन
आदि पदार्थों को स्वाद की चिन्ता किये बिना अर्थात् स्वादिष्ट और
स्वाद रहित तथा खराब स्वाद वाले पदार्थों को एक समान मानकर
भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त है । जो वृद्धावस्था, मृत्यु विपत्ति,
ऐश्वर्य-भोग एवं दारिद्रय में समभाव रखता हुआ सब स्थितियों में संतुष्ट
रहता है, वह जीवन्मुक्त है। धर्माधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म मरण में हर्ष
विषाद न करने वाला पुरुष जीवन्मुक्त है। जो उद्वेग और आनन्द से
रहित, शोक अथवा हर्षोत्साह से ममत्व एवं स्वच्छ बुद्धि वाला है,
वह जीवन्मुक्त है। सभी इच्छाओं, शंकाओं, कामनाओं और निश्चयों को
जिसने पूर्णतः त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त है । उत्पत्ति, स्थिति और
विलीनावस्था में तथा उन्नति-अवनति में जो समान मन वाला है. वह
जीवन्मुक्त है। जो केवल प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला आकां-
क्षाओं में रहित तथा किसी के प्रति द्वेष-ईर्ष्या नहीं करता. वह जीवन्मुक्त
है। जो कलायुक्त होते हुये भी कला-रहित रहता है, चित्त के रहते हुये
भी जो चित्त रहित बना हुआ है तथा जिसने सांसारिक विषयों का
चिन्तन छोड़ दिया है, वह जीवन्मुक्त है । विश्व के सभी अर्थ-जालों के
मध्य स्थिर होकर भी उसने पराये धन से निस्पृह रहने वाले धर्मात्मा
के समान जो पुरुष निस्पृह रहता है, वह आत्मा में ही पूर्णता का अनु-
भव करने वाला महात्मा जीवन्मुक्त हैं ॥४२-६२॥
जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।
विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥६३॥
विदेहमुक्तो नोदेति नास्तमेति न शाम्यति ।

महोपनिषत् ] [ १०५
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न सन्नासन्न दूरस्थो न चाहं न च नेतरः ॥६४॥
ततः रितमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ।
अनाख्यमनभिव्यक्तं सत् किंचिदवशिष्यते ॥६५॥
न शून्यं नापि चाकारि न दृश्यं नापि दर्शनम् ।
न च भूतपदार्थौघसदनन्ततया स्थितम् ॥६६॥
किमप्यव्यप देशात्मा पूर्णात् पूर्णतराकृतिः ।
न सन्नासन्न सदसन्न भावो भावनं न च ॥६७॥
चिन्मात्रं चैत्यरहितमनन्तमजरं शिवम् ।
अनादिमध्यपर्यन्तं यदनाधि निरामयम् ॥६८
द्रष्टृ दर्शनदृश्यानां मध्ये यद्दर्शनं स्मृतम् ।
नातः परतरं किंचिन्निश्श्वयोऽस्त्यपरो मुने ॥६६
स्वयमेव त्वया ज्ञातं गुरुतश्च पुनः श्रुतम् ।
स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निसंकल्पाद्विमुच्यते ॥७०-
तेन स्वयं त्वया ज्ञातं ज्ञेयं यस्य महात्मनः ।
भोगेभ्यो ह्यरतिर्जाता दृश्याद्वा सकलादिह ॥७१
प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं भवता पूर्णचेतसा ।
स्वरूपे तपसि ब्रह्मन् मुक्तास्त्वं भ्रान्तिमुत्सृज ॥७२
अतिबाह्यं तथा बाह्यमन्तराभ्यन्तरं धियः ।
शुक पश्यन्न पश्येस्त्वं साक्षी संपूर्णकेवलः ॥७३
वह पुरुष काल के द्वारा शरीर के कलवित कर लिये जाने
पर जीवन्मुक्ता अवस्था को त्यागकर उसी प्रकार विदेह मुक्तावस्था को
प्राप्त होता है जिस प्रकार गतिहीन पवन हो जाता है । विदेहमुक्त
अवस्था में उन्नति, अवनति से दूर रहता है, उस समय उसका लय भी
नहीं होता । उसकी वह अवस्था सत्, असत् से परे होती है और वह
दूरस्थ भी नहीं होती । उसमें अहम्भाव अथवा परभाव भी नहीं होता ।
विदेहमुक्त अवस्था में गंभीरता और स्तब्धता होती है तथा उसमें तेज
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi