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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१४४ ] [ पंचम अध्याय

१४४ ] [ पंचम अध्याय
परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनावबोधनम् ।
पदार्थभावना नाम षष्टी भवति भूमिका ॥३३
भूमिषट्कचिराभ्यासाद्भेदस्यानुपलम्भनात् ।
यत् स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥३४
एषा हि जीवन्मुक्तेषु तुर्यावस्थेति विद्यते ।
विदेहमुक्तविषयं तुर्यातीतमतः परम् ॥३५
ये निदाघ महाभागाः सप्तमी भूमिमाश्रिताः ।
श्चात्माऽऽरामा महात्मानस्ते महापद्मागताः ॥३६
जीवन्मुक्ता न मज्जन्ति सुखदुःखरसस्थिते ।
प्रकृतेनाथ कार्येण किंचित् कुर्वन्ति वा न वा ॥३७
पार्श्वस्थबोधिताः सन्तः पूर्वाचारक्रमागतम् ।
आचारमाचरन्त्येव सुप्तबुद्धवदुत्थिताः ॥३८
भूमिकासप्तकं चैतद्धीमतामेव गोचरम् ।
प्राप्य ज्ञानदशामेतां पशुम्लेच्छाऽऽदयोऽपिये ॥३९
सदेहा वाप्यदेहा वा ते मुक्ता नात्र संशयः ।
ज्ञप्तिर्हि ग्रन्थिविच्छेदस्तस्मिन् सति विमुक्तता ॥४०
योग-भूमिकाओं के अनेकानेक भेद ज्ञानियों ने कहे हैं, परन्तु
मैं तो इन सात भूमिकाओं को ही अत्यन्त कल्याणमयी मानता हूँ।
इन सात भूमिकाओं द्वारा प्रकट होने वाला अवबोध ही ज्ञान कहा जाता
है। इन भूमिकाओं के अनन्तर होने वाली मुक्ति को ज्ञेय कहा गया
है। प्रथम ज्ञान-भूमिका का नाम शुभेच्छा है। दूसरी विचारणा, तीसरी
तनुमानसी, चौथी सत्त्वापत्ति और पांचवीं असंसक्ति कही जाती है।
छठवीं को पदार्थभावना और सातवीं को तुर्यगा कहते हैं। इन भूमि-
काओं में पुनः शोक उत्पन्न न होने देने वाली मुक्ति विद्यमान है। मैं
इनका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। वैराग्य धारण से पूर्व सांसारिक
भ्रमजाल के प्रति ग्लानि उत्पन्न होना और शास्त्रादि के प्रति जिज्ञासा

महोपनिषत् ] [ १४५

का उदय होना, श्रेष्ठ कर्मों की इच्छा आदि को ही ज्ञानियों ने शुभेच्छा
कहा है । इसके पश्चात् साधु-सङ्ग और शास्त्रों के अध्ययन आदि के
द्वारा अभ्यास वैराग्य से युक्त सदाचरण की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, उसे
ही विचारणा कहा गया है । जब यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तब
विषयों के प्रति अनुराग क्षीण हो जाता है, वह अवस्था तनुमानसी कही
जाती है । जब इन तीनों भूमिकाओं का पूर्ण अभ्यास हो जाता है तब
वैराग्य के प्राबल्य से चित्त शुद्ध सत्व स्वरूप में अवस्थित होता है । उस
अवस्था को ही सत्वापत्ति कहा गया है । इन सब भूमियों का अभ्यास
होने पर जो संसर्गहीन कला सत्वारूढ़ होती है, वही 'असक्ति' है । इन
पाँचों भूमियों का अभ्यास होने पर अपने आत्मा में रमते रहने से और
बाह्याभ्यांतरिक पदार्थों की भावना का नाश होने पर पदार्थ-भावना
होती है। इन छः भूमिकाओं के पूर्ण अभ्यास के अनन्तर भेद-बुद्धि मिट
जाती है और आत्मभाव में ही साधक एकनिष्ठ हो जाता है । उसकी
यह अवस्था तुर्यगा कही गई है । इस अवस्था को जीवन्मुक्त पुरुष ही
प्राप्त होते हैं। इसके पश्चात् विदेह मुक्ति वाली तुर्यातीत अवस्था प्राप्त
होती है । जो अत्यन्त भाग्यशाली तुर्यगा भूमिका को ग्रहण कर लेते हैं,
वे आत्मा में ही रमण करते हैं । ऐसे सन्त महान् पद को प्राप्त हो चुके
हैं, जो जीवन्मुक्त हो गये हैं वे सुख दुःख के अनुभव से नितान्त दूर
रहते हैं । वे कर्तव्य कर्मों में लगकर भी उनमें दूर रहते हैं, उनमें लिप्त
नहीं होते । जैसे अपने साथियों द्वारा जगाये जाने पर मनुष्य सोकर उठ
पड़ता है, वैसे ही वह श्रेष्ठ कर्मों में रत रहकर सनातन आचरण करते
हैं । इन सात भूमिकाओं को मेधावीजन ही जानते हैं । यदि पशु और
म्लेच्छ आदि भी ज्ञान की इन भूमिकाओं को प्राप्त कर लें तो वे भी
देह त्याग के पश्चात् मुक्त हो जाते हैं । हृदयग्रन्थियों का उद्घाटन ही
ज्ञान है, जब इसकी प्राप्ति हो जाती है, तभी मुक्ति प्राप्त हो सकती है
॥२२-४०॥
मृगतृष्णास्बुदद्यादिशान्तिमात्रात्मकसवसौ ।