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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१३२ [ चतुर्थ अध्याय

१३२ [ चतुर्थ अध्याय

मनोव्याधेश्चिकित्साऽर्थमुपायं कथयामि ते ।
यद्यत् स्वाभिमतं वस्तु तत्त्यजन् मोक्षमश्नुते ॥८८
स्वायत्तमेकान्तहितं स्वेप्सितत्यागवेदनम् ।
यस्य दुष्करतां यातं धिक् तं पुरुषकीटकम् ॥८९
स्वपौरुषैकसाध्येन स्वेप्सितत्यागरूपिणा ।
मनः प्रशममात्रेण विना नास्ति शुभा गतिः ॥९०
असंकल्पनशस्त्रेण छिन्नं चित्तमिदं यदा ।
सर्वं सर्वगतं शान्तं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥९१
भवभावनया मुक्तो युक्तः परमया धिया ।
धारयात्मानमव्यग्रो ग्रस्तचित्तं चितः पदम् ॥९२
परं पौरुषमाश्रित्य नीत्वा चित्तमचित्तताम् ।
ध्यानतो हृदयाकाशे चिति चिच्चक्रधारया ।
मनो मारय निःशङ्कं त्वां प्रबध्नन्ति नारयः ॥९३
अयं सोऽहमिदं तन्मे एतावन्मात्रकं मनः ॥
तदभावनमात्रेण दात्रेणेव विल्रूयते ॥९४
छिन्नाभ्रमण्डलं व्योम्नि तथा शरदि धूयते ।
वातेनाकल्पकेनैव तथाऽन्तर्धूर्यते मनः ॥९५
कल्पान्तपवना वान्तु वान्तु चैकत्वमर्णवाः ।
तपन्तु द्वादशादित्या नास्ति निर्मनसः क्षतिः ॥९६
असंकल्पनमात्रैकसाध्ये संकल्पासद्धिते ।
असंकल्पातिसाम्राज्ये तिष्ठावष्टब्धतत्पदः ॥९७
न हि चञ्चलताहीनं मनः क्वचन दृश्यते ।
चंचलत्वं मनोधर्मो वह्नेर्धर्मो यथोष्णता ॥९८
एषा हि चंचला स्पन्दशक्तिश्चित्तत्वसस्थिता ।
तां विद्धि मानसीं शक्तिं जगदाडम्बरात्मिकाम् ॥९९
यत्तु चंचलताहीनं तन्मनोऽमृतमुच्यते ।

महोपनिषत् ] [ १३३
तदेव च तपः शास्त्रसिद्धान्ते मोक्ष उच्यते ॥१००
तस्य चंचलता यैषा त्वविद्या वासनात्मिका ।
वासनाऽपरनाम्नीं तां विचारेण विनाशय ॥१०१
मन में उत्पन्न हुए विकार का उपाय मैं तुम्हारे प्रति कहता हूँ।
जिन-जिन वस्तुओं की प्राप्ति के लिये यह मन चञ्चल हो उन-उन
वस्तुओं का त्याग कर देना मोक्ष का एक सरल साधन है। जिसके लिए
इच्छित वस्तु के त्याग की भावना, एकान्त प्रियता और आत्मा की
आधीनता दुष्कर है, वह पुरुष रूप कीड़ा धिक्कार का ही पात्र है ।
अपनी इच्छित वस्तु का अपने प्रयत्न से त्याग करना ही मन की शान्ति
का श्रेष्ठ उपाय है। इसके सिवा अन्य गति नहीं है। संकल्प शून्यता
रूपी अस्त्र जब इस चित्त को काट डालता है, तब सर्वरूप, सर्व अन्त-
र्यामी परब्रह्म प्राप्त होते हैं। इसलिए प्रपंच की भावना का त्याग कर
श्रेष्ठ बुद्धि वाले होओ और मन को नियन्त्रित कर चिन्मात्र में स्थित
हो जाओ। वैराग्य के आश्रम और अभ्यास के सहारे चित्त को अचित्ता-
वस्था में स्थित कर हृदयाकाश में ध्यान करे और चेतन में निरत चित्त
रूपी चक्र की तीक्षण धार से मन का दमन कर डाले। ऐसा करने से
शंका नष्ट हो जायेगी और काम आदि शत्रु बन्धन में न डाल सकेंगे।
तेरा मेरा की भावना ही मन है और जब इनका त्याग कर दिया जाता
है तब मन का स्वतः नाश हो जाता है। जैसे शरद् ऋतु में छिन्न भिन्न
हुए बादल वायु की ठोकरें खाकर आकाश में ही लय हो जाते हैं, वैसे
ही सद्विचारों के द्वारा मन भी लीन हो जाता है। मन से रहित पुरुष
को कोई हानि नहीं हो सकती, चाहे सम्पूर्ण समुद्र एक होकर सर्वत्र
जलमयी सृष्टि ही क्यों न कर दें, चाहे प्रलयकालीन उपन्चासों पवन वेग
पूर्वक क्यों न बहने लगें, चाहे बारहों आदित्य मिलकर घोर उष्णता क्यों
न उत्पन्न कर डालें। केवल संकल्पहीनता ही सम्पूर्ण सिद्धियों का
साधन है। अतः संकल्पहीनता में मग्न होकर रहो । जैसे अग्नि का

धर्म उष्णता है, वैसे ही मन का धर्म चंचलता है, इसलिये सर्वत्र चञ्चल
मन ही दृष्टिगोचर होता है। यही चञ्चल स्वभाव वाली स्पन्दन शक्ति
चित्त का धर्म है। इस शक्ति को विश्व प्रपञ्च का ही रूप जाने।
चञ्चलता रहित मन ही तप है, वह अमृत स्वरूप है, शास्त्र उसे मोक्ष
कहते हैं। मन की चञ्चलता ही अविद्या है, वासना उसका लक्षण है।
वह वासना ही शत्रु के समान है। विचार वान् पुरुषों का कर्तव्य है कि
वे उस वासना को ही नष्ट करने का प्रयत्न करे ॥८८-१०१॥
पौरुषेण प्रयत्नेन यस्मिन्नेव पदे मनः।
योज्यते तत् पदं प्राप्य निर्विकल्पो भवानघ ॥१०२
अतः पौरुषमाश्रित्य चित्तमाक्रम्य चेतसा।
विशोकं पदमालम्ब्य निरातङ्कः स्थिरो भव ॥१०३
मन एव समर्थं हि मनसो दृढनिग्रहे।
अराज्ञा कः समर्थः स्याद्राज्ञो निग्रहकर्मणि ॥१०४
तृष्णाग्राहगृहीतानां संसारावर्णवपातिनाम् ।
आवर्तेरूह्यमानानां दूरं स्वमन एव नौः ॥१०५
मनसैव मनश्छित्त्वा पाशं परमबन्धनम् ।
भवादुत्तारयात्मानं नासावन्येन तार्यते ॥१०६
या यादेति मनोनाम्नी वासना वासितान्तरा ।
तां तां परिहरेत् प्राज्ञस्ततोऽविद्याक्षयो भवेत् ॥१०७
भोगैकवासनां त्यक्त्वा त्यज त्वं भेदवासनाम्।
भावाभावौ ततस्त्यक्त्वा निर्विकल्पः सुखी भव ॥१०८
एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश एव च।
तत्तत् संवेद्यते किंचित् तत्रास्थापरिवर्जनम् ।
अनास्थैव हि निर्वाणं दुःखमास्थापरिग्रहः ॥१०६
अविद्या विद्यमानैव नष्टप्रज्ञेषु दृश्यते।
नाम्नैवांगीकृताकाशे सम्यग्वेत्रास्य सा कुतः ॥११०

महोपनिषद् [०. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ १३५
तावत् संसारभृगुषु स्वात्मना सह देहिनम् ।
आन्दोलयति नीरन्ध्रदुःखकण्टकथालिषु ॥१११
अविद्या यावदस्यास्तु नोत्पन्ना क्षयकारिणी ।
स्वयमात्मावलोकेच्छा मोहसं क्षयकारिणी ॥११२
अस्याः परं प्रपश्यन्त्याः रुवात्मनाशः प्रजायते ।
दृष्टे सर्वगते बोधे स्वयं ह्येषा विलीयते ॥११३
इच्छामात्रमविद्येयं तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
स चांसंकल्पमात्रेण सिद्धो भवति वै मुने ॥११४
हे मुने ! जिस उद्देश्य में [अपने मन को लगाओ उसे प्राप्त करने
के लिए निर्विकल्प समाधि को पावो । चित्त को चित्त से वशीभूत करो
और शोक रहित रहते हुए आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो ।
विषयों से रहित मन ही मन का पूर्ण विरोध कर सकता है । जो राजा
राज्य पर आसीन है, वही किसी राजा को पराजित करने में सफलता
प्राप्त करता है । जो तृष्णारूपी [ग्राह द्वारा ग्रहण किए हुए हैं, जो
संसार सागर में गिरकर किनारे पर आने से असमर्थ हो चुके हैं तथा
भँवर जाल में पड़ गये हैं, उनकी रक्षा के कार्य में विषय-विकारों से शून्य
मन ही समर्थ है । वही नौका रूप होकर उन्हें पार लगा सकता है । हे
मुने ! ऐसे अत्यन्त सामर्थ्य वाले मन के द्वारा इस घोर बन्धन रूप मान-
सिक पाश को खण्ड-खण्ड कर डालो और स्वयं ही इस संसार समुद्र से
पार हो जाओ क्योंकि दूसरा कोई इस समुद्र से पार नहीं कर सकता ।
जब जब अन्तःकरण को अच्छादित करने वाली मन रूपी वासना का
प्रादुर्भाव हो, तब तब उसका त्याग करना बुद्धिमान पुरुष का कर्त्तव्य
है। ऐसा करने से अविद्या रूप अन्धकार नष्ट हो जाता है। प्रथम
भोग रूप वासना त्यागनी चाहिए, फिर भेद रूप वासना और उसके
पश्चात् भाव अभाव दोनों का ही त्याग कर देना उचित है, इससे हे पुत्र !
तुम विकल्प रहित और सुखी होओ । मन का नाश ही अविद्या का
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi