१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१५६ ] [ पंचम अध्याय
१५६ ] [ पंचम अध्याय
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सर्वसंकल्परहिता सर्व संज्ञाविवर्जिता ।
सैषा चिदविनाशात्मा स्वात्मेत्यादिकृताभिधा ॥१००
आकाशशतभागाच्छा ज्ञेषु निष्कलरूपिणी ।
सकलाऽमलसंसारस्वरूपैकात्मदर्शिनी ॥१०१
नास्तमेति न चोदेति नोत्तिष्ठति न तिष्ठति ।
न च याति न चायाति न च नेह न चेह चित् ॥१०२
सैषा चिदमलाकारा निर्विकल्पा निरास्पदा ॥१०३
आदौ शमदमप्रायैर्गुणैः शिष्यं विशोधयेत् ।
पश्चात् सर्वमिदं ब्रह्म शुद्धस्त्वमिति बोधयेत् ॥१०४
अज्ञस्यार्ध प्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत् ।
महानरकजालेषु स तेन विनियोजितः ॥१०५
प्रबुद्धबुद्धेः प्रक्षीणभोगेच्छस्य निराशिषः ।
नास्त्यविद्या मलमिति प्राज्ञस्तूपदिशेद्गुरुः ॥१०६
सति दीप इवालोकः सत्यर्क इव वासरः ।
सति पुष्प इवामोदश्चिति सत्यां जगत्तथा ॥१०७
किसी प्रकार की भी भोगेच्छा हो, वह बन्धन स्वरूप ही है और
भोगेच्छा का त्याग ही मुक्ति है। मन का नाश ही मनोन्नति का कारण
है। मन का नाश भाग्यवान पुरुषों का ही होता है। ज्ञानी पुरुषों का
मन नष्ट हो जाता है। ज्ञानी जन मन को न तो आनन्द मानते हैं
और न आनन्दरहित । वे उसे चल, अचल, स्थिर, सत्, असत् अथवा
उसके मध्य की अवस्था वाला भी नहीं मानते, परन्तु अज्ञानी जन मन
के बन्धन में पड़े रहते हैं। सभी संकल्पों से परे और सब संज्ञाओं से
रहित इस चिदात्मा को अविनाशी एवं स्वात्मा आदि कहा गया है।
यह अखण्ड चेतन सत्ता सर्वव्याप्त होते हुए भी उसी प्रकार दिखाई नहीं
देती जिस प्रकार चित् में स्थित आकाश सूक्ष्मता के कारण परिलक्षित
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
महोपनिषत् ] [ १५७
नहीं होता। ज्ञानी जन जिस चित्, चेतन सत्ता को आकाश से भी
शतशः स्वच्छ और अवयवरहित देखते हैं, वह सम्पूर्ण निर्मल विश्व
के रूप में केवल स्वयं को ही दिखाती है। वह सत्ता कभी उदय या
अस्त को प्राप्त नहीं, वह गमनागमन से रहित है, न स्थिर रहती
है और न उठती-बैठती है। वह वहां है न यहाँ है। वह तो अवलम्ब-
रहित और विकल्परहित है। उसका स्वरूप निर्मल है। शम-दम आदि
गुणों के द्वारा शिष्य के अन्तःकरण को शुद्ध करना गुरु का कर्तव्य है।
फिर उसे ब्रह्मस्वरूप का बोध कराना चाहिए कि 'यह सब कुछ और
तुम भी ब्रह्म रूप हो।' जो ज्ञान रहित तथा अर्द्ध विकसित बुद्धि वाला
है उसके समक्ष 'सब कुछ ब्रह्म है' ऐसा कहना उसे नरक रूप में ही
धक्का देने के समान है। वेदान्त का उपदेश तो उसे ही देना चाहिए
जिसकी भोगेच्छा नष्ट होकर बुद्धि जाग्रत हो गई है। जैसे दीपक से
प्रकाश सम्भव है, सूर्योदय होने पर ही दिन की स्थिति है और पुष्प
से ही सुगन्ध निकल सकती है वैसे चित्-चेतन से संसार स्थित है।
यथार्थ में तो इस संसार का अस्तित्व है ही नहीं, यह तो केवल आभास
मात्र है। जब तुम्हारी दृष्टि आवरण रहित हो जायेगी और उसमें ज्ञान
का प्रकाश भर जायगा, तब तुम स्वयं ही अपने रूप में स्थित हो
जाओगे। उसी समय तुम्हें मेरे उपदेश की सार-असारता का भले प्रकार
ज्ञान हो सकेगा ॥६७-१०७॥
प्रतिभासत एवेदं न जगत् परमार्थतः ।
ज्ञानदृष्टौ प्रसन्नायां प्रबोधे विततोदये ॥१०८
यथावज्ज्ञास्यसि स्वस्थो मद्वाग्वृष्टिबलाबलम् ।
अविद्ययैवोत्तमया स्वार्थनाशोद्यमार्थया ॥१०६
विद्या संप्राप्यते ब्रह्मन् सर्वदोषापहारिणी ।
शाम्यति ह्यस्त्रमस्त्रेण मलेन क्षाल्यते मलम् ॥११०
शमं विषं विषेणैति रिपुणा हन्यते रिपुः ।
१५८ ] [महोपनिषत्
ईदृशी भूतसायेयं या स्वनाशेन हर्षदा ॥१११
न लक्ष्यते स्वभावोऽस्या वीक्ष्यमाणैव नश्यति ।
नास्त्येषा परमार्थेनेत्येवं भावनयेद्धया ॥११२
सर्वं ब्रह्मेति यस्यान्तर्भाविना सा हि मुक्तिदा ।
भेदद्रष्टिरविद्येयं सर्वथा तां विसर्जयेत् ॥११३
श्रेष्ठ अविद्या स्वार्थ को नष्ट करने के लिये ही उद्यत है,
उसी के द्वारा सर्वदोषनाशिनी विद्या प्राप्त होती है । अस्त्र ही अस्त्र
को काटता है और मल से ही मल घुलता है । विष ही विष को नष्ट
करने वाला है, शत्रु ही शत्रु का संहार करता है । इसी प्रकार यह भूत
माया अपने ही नाश द्वारा प्रसन्न होती है । इसका स्वरूप दृष्टिगोचर
नहीं होता । जब यह दिखाई देती है, तभी नाश को प्राप्त होती है ।
परन्तु इसे माया न मानकर सब कुछ ब्रह्म मानना ही मोक्ष प्राप्ति का
साधन है । भेद का दिखाई देना ही अविद्या है, इसलिए भेद-दृष्टि का
त्याग करना ही श्रेयस्कर है ॥१०८-११३॥
मुने नासाद्यते तद्धि पदमक्षयमुच्यते ।
कुतो जातेयमिति ते द्विज माऽस्तु विचारणा ॥११४
इमां कथ महं हन्मीत्येषा तेऽस्तु विचारणा ।
अस्तं गतायां क्षीणायामस्यां ज्ञास्यसि तत् पदम् ॥११५
यत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् ।
तदस्या रोगशालाया तत्नं कुरु चिकित्सने ॥११६
यथैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति ।
स्वात्मनि स्वपरिस्पन्दैः स्फुरत्यच्छेश्चिदर्णवः ॥११७
एकात्मकमखण्डं तदित्यन्तर्भाव्यतां दृढम् ।
किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्महार्णवे ॥११८
तन्मयैव स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे ।
आत्मन्येवात्मना ऽम्भोरित्न यथा सरति मारुतः ॥११९॥
महोपनिषत् ] [ १५६
तथैवात्माऽऽत्मशक्त्यैव स्वात्मन्येवेति लोलताम् ।
क्षणं स्फुरित सा देवी सर्वशक्तितया तथा ॥१२०
देशकालक्रियाशक्तिं यस्याः संप्रकर्षति ।
स्वस्वभावं विदित्वोच्चैरप्यनन्तपदे स्थिता ॥१२१
रूपं परिमितेनासौ भावयत्यविभाविता ।
यदैवं भावितं रूपं तया परमकान्तया ॥१२२
तदैवैनामनुगता नामसंख्यादिका दृशः ।
विकल्पकलिताकारं देशकालक्रियाऽऽस्पदम् ॥१२३
चितो रूपमिदं ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कथ्यते ।
वासनाः कल्पयन् सोऽपि यात्यहंकारतां पुनः ॥१२४
अहङ्कारो विनिर्णॆता कलङ्की बुद्धिरुच्यते ।
बुद्धिः सङ्कल्पितकारा प्रयाति मननास्पदम् ॥१२५
मनो घनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शनैः ।
पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधाः ॥१२६
एवं जीवो हि संकल्पवासनारज्जुवेष्टितः ।
दुःखजालपरीतात्मा क्रमादायाति नोचताम् ॥१२७
इति शक्तिमयं चेतो घनाहंकारतां गतम् ।
कोशकारक्रमिरिव स्वेच्छया याति बन्धनम् ॥१२८
स्वसंकल्पिततन्मात्रजालाभ्यन्तरवर्ति च ।
परां विवशतामेति शृंखलाबद्धसिंहवत् ॥१२९
क्वचिन्मनः क्वचिद्बुद्धिः क्वचिज्ज्ञानं क्वचित् क्रिया ।
क्वचिदेतहंकारः क्वचिच्चित्तमिति स्मृतम् ॥१३०
क्वचित् प्रकृतिरित्युक्तं क्वचिन्मायेति कल्पितम् ।
क्वचिन्मलमिति प्रोक्तं क्वचित् कर्मेति स स्मृतम् ॥१३१॥
क्वचित्बन्ध इति ख्यातं क्वचित् पुर्यष्टकं स्मृतम् ।
प्रोक्तं क्वचिदविद्येति क्वचिदिच्छेति संमतम् ॥१३२