१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
तृतीय अध्याय ] [ २७३
तृतीय अध्याय ] [ २७३
अभ्यासवासनाशक्त्या तरन्ति भवसागरम् ।
परायामंकुरी भूय पश्यन्त्यां द्विदलीकृता ॥१८
मध्यमायां मुकुलिता वैखर्यां विकसीकृता ।
पूर्वं यथोदिता या वाग्विलोमेनास्तगा भवेत् ॥१९
तस्या वाचः परो देवः कटस्थो वाक्प्रबोधकः ।
सोऽहमस्मीति निश्चित्य यः सदा वर्तते पुमान् ॥२०
शब्दंरुच्चावचैर्नीचैर्भाषितोऽपि न लिप्यते ।
विश्वश्च तैजसश्चैव प्राज्ञश्चेति च ते त्रयः ॥२१
विराड्ढिरण्यगर्भश्च ईश्वरश्चेति ते त्रयः ।
ब्रह्माण्डं चैव पिण्डाण्डं लोका भूरादयः क्रमात् ॥२२
स्वस्वोपाधिलयादेव लीयन्ते प्रत्यगात्मनि ।
अण्डं ज्ञानाग्निना तप्तं लीयये कारणैः सह ॥२३
अभ्यास और श्रेष्ठ वासना की शक्ति द्वारा ही वे इस भव
सागर को तैर कर पार करने में समर्थ होते हैं। वाणी परा में
अंकुरित होती है, पश्यन्ती में उसके दो भाग होते हैं, मध्यमा में
पुष्पित होती है और बैखरी में विकास को प्राप्त हो जाती है। इस
विधि से जिस प्रकार वाणी का आविर्भाव होता है, उसके विलोम-क्रम
से ही वह लय हो जाती है ॥ १८-१९ ॥ इस वाणी का बोध कराने
वाला अथवा परमदेव मैं ही हूँ, इस प्रकार निश्चय करके जो व्यक्ति
तदनुसार व्यवहार करता है ॥ २० ॥ उससे कोई उच्च या नीच कैसा
भी शब्द कहे, पर वह उसमें लिप्त नहीं होता । विश्व, तैजस
और प्राज्ञ—ये तीन पिण्डक तथा विराट्, हिरण्यगर्भ और ईश्वर—ये
तीन ब्रह्माण्ड के और भूः, भुवः स्वः—ये तीन लोक के भेद हैं, जो
अपनी उपाधि के लय होने पर प्रत्यगात्मा में लीन हो जाते हैं ।
ज्ञानाग्नि से तप्त होने पर ब्रह्माण्ड भी अपने मूल रूप में विलीन हो
जाता है ॥ २१-२३ ॥
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परमात्मनि लीनं तत्परं ब्रह्मव जायते ।
ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् ॥२४
अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किंचिदवशिष्यते ।
ध्यात्वा मध्यस्थमात्मानं कलशान्तरदीपवत् ॥२५
अङ्गुष्ठमात्रमात्मानमधूमज्योतिरूपकम् ।
प्रकाशयन्तमन्तस्स्थं ध्यायेत्कूटस्थमव्ययम् ॥२६
विज्ञानात्मा तथा देहे जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिः ।
मायया मोहितः पश्चाद्बहुजन्मन्तरे पुनः ॥२७
सत्कर्मपरिपाकात्तु स्वविकारं चिकीर्षति ।
कोऽहं कथमयं दोष संसाराख्य उपागतः ॥२८
जाग्रत्स्वप्ने व्यवहरन्त्सुषुप्तौ क्व गतिर्मम ।
इति चिन्तापरो भूत्वा स्वभासा च विशेषतः ॥२९
अज्ञानात्तु चिदाभासो बहिस्तापेन तापितः ।
दग्धं भवत्येव तदा तूलपिण्डमिवाग्निना ॥३०
परमात्मा में मिल जाने से वह ब्रह्मरूप हो जाता है । उस
समय एक ऐसा अगाध और गम्भीर रूप हो जाता है जो न प्रकाश
कहा जा सकता है न अन्धकार । तब केवल सत्स्वरूप एक
अव्यक्त तत्व ही शेष रहता है। जैसे घट के भीतर दीपक की ज्योति
रहती है ऐसी ही एक निर्धूम ज्योति अपने अन्तःकरण में प्रकाशित
होती रहती है । इसी स्वरूप में उस कूटस्थ अव्यय रूप का ध्यान
करना चाहिए ॥ २४-२६ ॥ आत्मा अपने मूल रूप में विज्ञानमय होता
है, पर देह में आकर वह मायावश, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं
को प्राप्त होकर विमोहित हो जाता है । कितने ही जन्मों के
पश्चात् जब शुभ कर्म उदय होते हैं तब उसके भीतर अपने विकारों
को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है कि मैं वास्तव में कौन हूँ और
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तृतीय अध्याय २७५
यह दोषमय संसार कहाँ से आ गया है ? ॥ २७-२८ ॥ जाग्रत और
स्वप्न अवस्था में तो मैं अपने को कर्ता समझ कर व्यवहार करता हूँ, पर
सुषुप्ति में मेरी क्या अवस्था होती है ? इस प्रकार चिन्ता करता
हुआ वह अपने आभास रूप पर विचार करता है ॥ २९ ॥ रुई का
ढेर जैसे आग से जलने लगता है, वैसे ही चिदाभास अज्ञान में पड़
कर सांसारिक ताप से नष्ट हो जाता है ॥ ३० ॥
दहरस्थः प्रत्यगात्मा नष्टे ज्ञाने ततः परम् ।
विततो व्याप्य विज्ञानं दहत्येव क्षणेन तु ॥३१॥
मनोमयज्ञानमयान् सम्यग्दग्ध्वा क्रमेण तु ।
घटस्थदीपवच्छश्वदन्तरेव प्रकाशते ॥३२॥
ध्यायन्नास्ते मुनिश्चैवमा सुप्तेरा मृतेस्तु यः ।
जीवन्मुक्तः स विज्ञेयः स धन्यः कृतकृत्यवान् ॥३३॥
जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते ।
विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥३४॥
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
तदेव शिष्यत्यमलं निरामयम् ॥३५॥
इत्युपनिषत् ॥
इस प्रकार सांसारिक ज्ञान के मिटाने पर प्रत्यगात्मा विस्तार
को प्राप्त होकर विज्ञान का भी नाश कर देता है। इस प्रकार मनो-
मय और विज्ञानमय के पूर्णतः मिल जाने पर शाश्वत प्रकाश के समान
आत्मा ही अन्तर में प्रकाशित होता रहता है ॥ ३१-३२ ॥ जो आत्म-
ज्ञानी ऐसी आत्मा का नित्य प्रति ध्यान करता रहता है और मृत्यु के
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समय भी उस ध्यान को स्थिर रखता है, वह जीवन्मुक्त ही है, वह
धन्य है और कृतकृत्य है ॥ ३३ ॥ जब उसका अन्तिम समय आ
जाता है तब वह जीवन्मुक्त से विदेहमुक्त पद को प्राप्त हो जाता है,
उसका अन्त ऐसा ही होता है जैसे हवा का चलना बन्द हो जाता है
॥ ३४ ॥ जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, से रहित अर्थात् पञ्चभूतों
से परे, नित्य और अव्यय है, जो आदि और अन्त से रहित है,
जो महान और ध्रुव (अटल) है, वही शुद्ध और अविकारी ब्रह्म अन्त में
शेष रहता है ॥ ३५ ॥
॥ योगकुण्डली उपनिषद् समाप्त ॥
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ध्यानबिन्दूपनिषत्
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः
शान्तिः।
ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करे, वह हम दोनों का पालन करे,
हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो,
हम परस्पर द्वेष न करे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम्।
भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥१॥
बीजाक्षरं परं बिन्दु नादं तस्योपरि स्थितम्।
सशब्दचाक्षरे क्षीणे निशब्दं परमं पदम् ॥२॥
अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्।
तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः ॥३॥
वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः।
तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥४॥
पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्।
तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम् ॥५॥
एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि।
स्थिरबुद्धिरसमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥६॥
यदि पर्वत के समान अनेक योजन विस्तार वाले पाप भी हों,
तो भी वे ध्यान योग से नष्ट हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त और किसी
तरह उनका नाश नहीं होता ॥ १॥ बीजाक्षर परम बिन्दु है और
उसके ऊपर नाद की स्थिति है। जब वह नाद (शब्द) अक्षर में
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लय हो जाता है तब शब्द रहित परमपद का रूप होता है ॥ २ ॥
अनाहत शब्द से भी परे जो शब्द है, उसके पाने से ही योगी के संशय
की निवृत्ति होती है ॥ ३ ॥ केशाग्र के सौवें भाग का हजारवां भाग
और उसका आधे का भाग, उसका भी क्षय हो जाने पर
निरंजन होता है ॥ ४ ॥ जिस प्रकार फूलों में गन्ध रहती है, दूध में घी
रहता है, तिल में तेल और पाषाण में सोना होता है, जिस प्रकार
माला के दाने सूत में पिरोये रहते हैं, उसी प्रकार सब भूत निरंजन में
व्याप्त हैं। स्थिर बुद्धि वाला ज्ञानी मोह रहित होकर ऐसे ब्रह्म क ा
ज्ञान प्राप्त करके उसमें स्थिर रहता है ॥ ५-६ ॥
तिलानां तु यथा तैल पुष्पे गन्ध इवाश्रितः ।
पुरुषस्य शरीरे तु सबाह्याभ्यान्तरे स्थितः ॥७
वृक्षं तु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला ।
सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥८
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वं मुमुक्षुभिः ।
पृथिव्याग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः ॥९
अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके ।
अन्तरिक्ष यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥१०
उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके ।
द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः ॥११
मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्राणवांशके ।
अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः ॥१२
उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः ।
अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पञ्चदैवतम् ॥१३
जिस प्रकार तैल का आश्रय तिल : का आश्रय
पुष्प है इसी प्रकार ब्रह्म पुरुष शरीर के भीतर और बाहर स्थित
रहता है ॥ ७ ॥ वृक्ष को सम्पूर्ण जान लेने पर उसकी छाया निष्कल
होती है, इसी प्रकार आत्मा सब कला रहित स्थान में स्थित रहता
है ॥ ८ ॥ सब मोक्षाभिलाषी व्यक्ति ॐकार रूप एकाक्षर ब्रह्म का ही
ध्यान करते हैं। इस प्रणव के प्रथम अंश ‘अ’कार में पृथिवी, अग्नि,
ऋग्वेद, भूः तथा पितामह का लय होता है। दूसरे अंश ‘उ’कार में
अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः और विष्णु का लय होता है। तीसरे अंश
‘म’कार में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वर्लोक और महेश्वर का लय होता है।
‘अ’कार पीले रङ्ग और रजोगुण वाला कहा जाता है, ‘उ’कार श्वेत
वर्ण और सतोगुण वाला और ‘म’कार कृष्णवर्ण तथा तामस गुण वाला
है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पद, तीन नेत्र और पाँच दैवत
वाला होता है ॥ ९-१३ ॥
ओंकारं यो न जानाति ब्राह्मणो न भवेत्तु सः ।
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते ॥१४
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ।
निवर्तन्ते क्रियाः सर्वास्तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥१५
ओंकारप्रभवा देवा ओंकारप्रभवाः स्वराः ।
ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥१६
ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः संपत्प्रदोऽव्ययः ।
अर्धमात्रासमायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः ॥१७
तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् ।
अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित् ॥१८
हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् ।
अंगुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम् ॥१९
इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम् ।
ओंकारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्यालावलीवृतम् ॥२०