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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

१७० ] [ षष्ठ अध्याय

१७० ] [ षष्ठ अध्याय
है। जैसे ताँवे की कालौंच अथवा धान का छिलका प्रयत्न द्वारा पृथक
किया जाता है, वैसे ही मनुष्य का मल-दोष क्रिया द्वारा ही नष्ट होना
सम्भव है ॥१७६--१८६॥
॥ पंचम अध्याय समाप्त ॥
षष्ठ अध्याय
अन्तरास्थां परित्यज्य भावश्रीं भावनामयीम् ।
योऽसि सोऽसि जगत्यस्मिन् लीलया विहरानघ ॥१
सर्वत्राहमकर्तेति दृढभावनयाऽनया ।
परमामृतनाम्नी सा समतैवाशिष्यते ॥२
खेदोल्लासविलासेषु स्वात्मकर्तृतयैकया ।
स्वसंकल्पे क्षयं याते समतैवावशिष्यते ॥३
समताः सर्वभावेषु याऽसौ सत्यपरा स्थितिः ।
तस्यामवस्थितं चित्तं न भूयो जन्मभागभवेत् ॥४
अथवा सर्वकर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने ।
सर्वं त्यक्त्वा मनः पीत्वा योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ॥५
शेषस्थिरसमाधानो येन त्यजसि तत्त्यज ।
चिन्मनः कलनाऽऽकारं प्रकाशतिमिरादिकम् ॥६
वासनां वासितारं च प्राणस्पन्दनपूर्वकम् ।
समूलमखिलं त्यक्त्वा व्योमसाम्यः प्रशान्तधीः ॥७
हृदयात् संपरित्यज्य सर्वां वासनापङ्क्तिकाम् ।
यस्तिष्ठति गतव्यग्रः स मुक्तः परमेश्वरः ॥८
दृष्टं द्रष्टव्यमखिलं भ्रान्तं भ्रान्त्या दिशो दश ।
युक्त्या वै चरतोऽज्ञस्य संसारो गोष्पदाकृतिः ॥६

महोपनिषत् ] [ १७१
सबाह्याभ्यान्तरे देहे ह्यध ऊर्ध्वं च दिक्षु च ।
इत आत्मा ततोऽप्यात्मा नास्त्यनात्ममय जगत ॥१०॥
हे पाप-रहित ! अन्तर की आस्था और भाव रूप सम्पत्ति का
त्याग करके, अपने यथार्थ रूप में इस संसार में विचरण करो और
स्वयं की सर्वत्र अकर्त्ता मानो, ऐसा करने से अमृता नाम वाली समता
ही अवशिष्ट रहती है। खेद और उल्लास यह दोनों हो मनुष्य द्वारा
स्वयं उत्पन्न किये हुये हैं। ऐसा समझ लेने पर समता ही शेष रहेगी ।
समता की यथार्थ स्थिति के भले प्रकार धारण कर लेने पर फिर
आवागमन का कारण समाप्त हो जाता है। अथवा कर्त्तव्याकर्त्तव्य
का त्याग कर डालो और मन का पान कर अपने यथार्थ रूप में स्थित
हो जाओ । अन्त में सबका त्याग कर समाधिस्थ हो जाओ । चेतन ही
प्रकाशरूप है और वही अन्धकार बन जाता है, क्योंकि वही मानसिक
संकल्प का रूप धारण कर लेता है, इसलिए वासना के कारण का
मूल सहित त्याग करके आकाश के समान स्वच्छ और शान्त मन वाले
बनो। मुक्त वही जो हार्दिक रूप से सब वासनाओं को त्याग देता है
और किसी प्रकार की आकुलता को मन में नहीं टिकने देता । वह
भ्रान्ति के वश में पड़ कर दसों दिशाओं में चक्कर काटते हुये द्रष्टव्य
पदार्थों को देखने में समर्थ है। देह के बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे सर्वत्र
आत्मा है, उसके लिए यह विश्व अनात्ममय कभी नहीं होता । अपितु
जो लोग प्रयत्नपूर्वक सदाचार में रत रहते हैं वे ज्ञानी पुरुष इस
संसार सागर को सहज में ही तरने योग्य बना लेते हैं ॥१-१०॥
न तदस्ति न यत्राहं य तदस्ति न तन्मयम् ।
किमन्यदभिवाञ्छामि सर्वं सच्चिन्मयं ततम् ॥११॥
समस्तं खल्विदं ब्रह्म सर्वमात्मेदमाततम् ।
अहमन्य इदं चान्यदिति भ्रान्तिं त्यजनघ ॥१२॥