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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished572 pages

१६८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्

Page 206Permalink

१६८ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत्
यम, नियम और आसन द्वारा भली प्रकार नाड़ी-शोधन करके
प्राणायाम करे ॥५३॥ मानव-देह का प्रमाण अपनी अँगुलियों से
छियानवे अँगुल का है। शरीर से प्राण बाहर अँगुल अधिक प्रमाण
वाला होता है ॥५४॥ देह में स्थित वायु को देहस्थ अग्नि के योग
द्वारा न्यून और सम करने से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जाता है ॥५५॥
मानव देह के मध्य में तप्त सुवर्ण की प्रभा वाला तीन कोणयुक्त
अग्नि का स्थान होता है। चार पैर वाले पशुओं में यह अग्नि स्थान
चार कोने का होता है। पक्षियों का गोल, सर्प जाति वालों का छः
कोने और स्वेदजों का आठ कोने वाला होता है। मानव-देह में उस
स्थान पर नौ अँगुल प्रमाण का एक कन्द रहता है जो दीपक के
समान प्रकाशित होता है। वह चार अँगुल ऊँचा और चार अँगुल
चौड़ा होता है ॥५६-५६॥ तिर्यक, पक्षी और चौपायों में यह कन्द
आण्डाकार होता है और उसका मध्यस्थान नाभि कहा जाता है
इसमें बारह आरे वाला चक्र है जिसमें विष्णु आदि देवों की मूर्तियां
हैं। इस चक्र को मैं (ब्रह्म) अपनी माया से फिराता रहता हूँ ॥५६॥
इन बारह आरों में जीव इस प्रकार घूमता रहता है जैसे मकड़ी अपने
जाले में फिरती है ॥६०॥
प्राणाधिरूढश्चरति जीवस्तेन विना नहि।
तस्योर्ध्वे कुण्डलीस्थानं नाभेस्तिर्यगथोर्ध्वतः ॥६१
अष्टप्रकृतिरूपा सा चाष्टधा कुण्डलीकृता।
यथावद्वायु संचारं जलान्नादि च नित्यशः ॥६२
परितः कन्दपार्श्वे तु निरुद्ध्येव सदा स्थिता।
मुखेनैव समावेष्ट्य ब्रह्मरन्ध्रमुखं यथा ॥६३
योग कालेनेन मरुता साग्निना बोधिता सती