१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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"जिस प्रकार रसायन विधि से साधारण धातु स्वर्ण बन
जाती है, उसी प्रकार दीक्षा विधान से साधारण आत्मा भी
शिवत्व को प्राप्त करती है।"
अनीश्वरस्य मर्त्यस्य नास्तित्राता यथा भुवि ।
तथा दीक्षा विहीनस्य नेहस्वामी परत्र च ॥
—दत्तात्रेय यामल
"दीक्षा विहीन मनुष्य का इस लोक और परलोक में
कहीं कल्याण नहीं।
यथा कूर्मः स्वतन्यान्ध्यान मात्रेण पोषयेत् ।
वेध दीक्षोपदेशस्तु मानसः स्यात्तथाविधः ॥
—कुलार्णव
"जिस प्रकार कछुआ अपने बच्चों का ध्यान मात्र से
पोषण करता है, उसी प्रकार गुरु भी अपनी मनः स्थिति से
शिष्य की मनःस्थिति का पोषण करता है, इसे वेध-दीक्षा
कहते हैं।"
अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये मार्ग-दर्शक
का चुनाव एवं वरण करना आवश्यक है। यह कार्य विधि-
विधान के साथ सम्पन्न किया जाय तो ही उसका समुचित लाभ
भी मिलता है। गुरुदीक्षा का यही तत्वज्ञान है।
उपनिषदों में देव-उपासना
उपनिषदों में वर्णित साधना विधान में देव-उपासना का
भी महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ आत्म चिन्तन, ब्रह्मध्यान,
मनोनिग्रह, विवेक वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ है