१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
१४८ ] [ पंचम अध्याय
१४८ ] [ पंचम अध्याय
निरिच्छं प्रतिबिम्बन्ति जगन्ति मुकुरे यथा ॥५५
एकं ब्रह्म चिदाकाशं सर्वात्मकमखण्डितम् ।
इति भावय यत्नेन चेतश्चाञ्चल्यशान्तये ॥५६
रेखोपरेखावलिता यथैका पीवरी शिला ।
यथा त्रैलोक्यवलितं ब्रह्मैकमिह दृश्यताम् ॥५७
द्वितीयकारणाभावादनुत्पन्नमिदं जगत् ।
ज्ञातं ज्ञातव्यमधुना दृष्टं द्रष्टव्यमद्भुतम् ॥५८
विश्रान्तोऽस्मि चिरं श्रान्तश्चिन्मात्रान्नास्ति किंचन ।
पश्य विश्रान्तिसंदेहं विगताशेषकौतुकम् ॥५९
दृष्टा और दृश्य से सम्बन्धित मध्य में जो दृष्टि का स्वरूप होता
है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से पृथक साक्षात्कार रूप से ही
अवस्थित होता है। एक देश से दूसरी ओर जाने वाले चित्त के मध्य
में जो स्थिति होती है, उसी में सतत तन्मय रहना चाहिये तुम्हारा
सनातन स्वरूप जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़ चेतन से शून्य में
स्थित है, उसी में लीन रहो। जड़ता ही पाषाणरूपता है, उसके त्यागने
पर जो अमनस्क स्थिति प्राप्त है, उसी में अवस्थित रहो। चित्त
के दूरस्थ त्याग पर जो अवस्था हो वह ग्रहणीय है। परमात्मतत्व से
मन का ही पहले आविर्भाव हुआ है। उसी मन के विकल्प रूप यह
संसार प्रकट हुआ। शून्य भी शून्य को उत्पन्न करने वाला है। शून्य
आकाश से ही सुन्दर दिखाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है। जब
संकल्प का नाश हो जाता है तब चित्त की वृत्तियाँ गल जाती हैं और
उसके परिणाम स्वरूप जगत का मोह रूप कुहरा भी गल जाता है। तब
शरदागमन पर निर्मल आकाश के समान वह जन्मरहित, सभी प्राणी-
पदार्थों का आदि और अनन्त एक चिन्मात्र रूप ही भासित होता है।
महोपनिषत् ] [ १४१
बिना रङ्ग आदि के और कर्त्ता के आकाश चित्रित हो रहा है। दृष्टा
बिना, निद्रारहित स्वप्न दिखाई देता है। यह चिदात्मा समान रूप से
स्वच्छ, निर्विकल्प, साक्षिरूप तथा दर्पण के समान निर्मल है, उसमें इच्छा
के बिना ही तीनों लोक प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। ब्रह्म सर्व स्वरूप, चिदा-
काश स्वरूप, अखण्डित तथा एक है। ऐसी भावना करने से ही चित्त
की चञ्चलता शान्त होती है। जैसे एक मोटी पाषाण शिला पर रेखा
उपरेखाएँ खिंची होती है, वैसे ही तीनों लोकों से युक्त ब्रह्म के दर्शन
करने चाहिये। किसी अन्य कारण के अभाव में इस विश्व की उत्पत्ति
ही नहीं हुई। चिन्मात्र के सिवा और कुछ नहीं है। ऐसा जानकर इस
सम्पूर्ण सांसारिक माया से विरक्त होकर तथा संशय-रहित होकर केवल
चिन्मात्र के दर्शन करो। अब जो जानना था, वह मैंने जान लिया, जो
देखना था, उसे देख लिया और चिरकाल का थका मांदा मैं अब विश्राम
को प्राप्त हुआ हूँ ॥ ४८—५६॥
निरस्तकल्पनाजालमचित्तत्वं परं पदम् ।
त एव भूमतां प्राप्ताः संशान्ताशेषकिल्विषा ॥६०
महाधियः शान्तधियो ये याता विमनस्कताम् ।
जन्तोः कृतविचारस्य विगलद्वृत्तिचेतसः ॥६१
मननं त्यजतो नित्यं किंचित् परिणतं मनः ।
दृश्यं संत्यजतो हेयमुपादेयमुपेयुषः ॥६२
द्रष्टारं पश्यतो नित्यमद्रष्टारमपश्यतः ।
विज्ञातव्ये परे तत्त्वे जागरुकस्य जीवतः ॥६३
सुप्तस्य घनसंमोहमये संसारवर्त्मनि ।
अत्यन्तपक्ववैराग्यादरसेषु रसेष्वपि ॥६४
संसारवासनाजाले खगजाल इवाखुना ।