१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥
२३० ] [ पाशुपतब्रह्मोपनिषत्
“हँस विषयक ज्ञान का उदय हो गया ।” यह सुन कर स्वयंभू
तिरोधान हो गये । उपनिषद् में जिस हंस ज्योति को कहा गया है, वही
रुद्र है और संसार से उद्धार करने वाला प्रणव ही पशुपति है ॥३२॥
॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥
उत्तर काण्डः
हंसात्ममालिका वर्णब्रह्मकालप्रचोदिता ।
परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी ॥१॥
अध्यात्मब्रह्मकल्पस्य आकुतिः कीदृशी कथा ।
ब्रह्मज्ञानप्रभा सन्ध्या कालो गच्छति धीमताम् ।
हंसाख्यो देवमात्माख्यमात्मतत्त्वप्रजा कथम् ॥२
अन्तःप्रणवनादाख्यो हंसः प्रत्ययबोधकः ।
अन्तर्गतप्रमागूढं ज्ञाननालं विराजितम् ॥३
शिवशक्त्यात्मकं रूपं चिन्मयानन्दवेदितम् ।
नादबिन्दुकला त्रीणि नेत्र विश्वविचेष्टितम् ॥४
त्रियङ्गानि शिखा त्रीणि द्वित्रीणि संख्यमाकृतिः ।
अन्तर्गूढप्रमा हंसः प्रमाणान्निर्गतं बहिः ॥५
'हंस' का जप ही वर्ण ब्रह्म है, इसी से ब्रह्म की प्राप्ति होती
है । परमात्मा और पुरुष भी यही है ॥ १ ॥ जो आत्मज्ञान से ब्रह्म
सदृश्य हो गया हो उसके विषय में कहने को क्या रह जाता है ?
ज्ञानी जन अपना समय ब्रह्म की चर्चा और उपासना में ही व्यतीत
करते हैं । जब हंस और आत्मा में एकता स्थापित हो जाती है, तो
प्रजा कहाँ हो सकती है ॥ २ ॥ भीतर में होने वाले प्रणव
रूपी नाद से जो हंस विदित होता है, वही सब ज्ञान कराने वाला
है । अन्तरानुभव द्वारा बाह्य ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ शिव