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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

श्री पद्मप्रभु जिनालय, प्रतिमाएँ, कौशाम्बी तीर्थ (उ० प्र०)
आयागपट्ट, मथुरा स्तूप

श्री महावीर स्वामी
(पिरोजे की प्रतिमा)
६
• ऋषभ देव (माणिक्य स्वामी)
कुल्पाक जी तीर्थ (आन्ध्रप्रदेश)

पद्मप्रभु जिनालय, कौशाम्बी तीर्थ (उ० प्र०)
कौशाम्बी के भग्नावशेष व प्राचीन स्तम्भ

भ० महावीर स्वामी, वैभारगिरि गजगृह (बिहार)
(जैन भवन, कलकत्ता के मौजन्य से)

विविध तीर्थ-कल्प के सम्बन्ध में
मुनि जिनविजय का वक्तव्य
१ श्री जिनप्रभसूरिरचित कल्प-प्रदीप
कल्प-प्रदीप अथवा विशेषतया प्रसिद्ध विविध तीर्थ-कल्प नामक
यह ग्रंथ जैन साहित्य की एक विशिष्ट वस्तु है। ऐतिहासिक और
भौगोलिक दोनों प्रकार के विषयों की दृष्टि से इस ग्रंथ का बहुत कुछ
महत्त्व है। जैन साहित्य ही मे नही, समग्र भारतीय साहित्य मे भी इस
प्रकार का कोई दूसरा ग्रन्थ अभी तक ज्ञात नही हुआ। यह ग्रन्थ,
विक्रम १४वी गताब्दी मे, जैनधर्म के जितने पुरातन और विद्यमान
प्रसिद्ध-प्रसिद्ध तीर्थ स्थान थे उनके संबंध की प्राय एक प्रकार
की 'गाईड-वुक' है। इसमे वर्णित उन उन तीर्थों का संक्षिप्त रूप
से स्थान-वर्णन भी है और यथाज्ञात इतिहास भी है।
२ ग्रंथकार आचार्य
ग्रन्थकार अपने समय के एक वडे भारी विद्वान् और प्रभाव-
शाली जैन आचार्य थे। जिस तरह, विक्रम की १७वी गताब्दी मे,
मुगलसम्राट अकवर वादशाह के दरवार मे जैन जगद्गुरु हीर-
विजय सूरि ने गाही सम्मान प्राप्त किया था, उसी तरह जिनप्रभ
सूरि ने भी १४वी गताब्दी मे तुघलक सुलतान महम्मद शाह के
दरवार मे बड़ा गौरव प्राप्त किया था। भारत के मुसलमान
वादगाहो के दरवार मे, जैन धर्म का महत्व बतलाने वाले और
उसका गौरव वढाने वाले, गायद, सबसे पहले ये ही आचार्य हुए।
इनको प्रस्तुत रचना के अवलोकन से ज्ञात होता है, कि
इतिहास और स्थल-भ्रमण से इनको बडा प्रेम था। इन्होंने अपने
जीवन में भारत के बहुत से भागो मे परिभ्रमण किया था।

४ विविध तीर्थ-कल्प
गुजरात, राजपूताना, मालवा, मध्यप्रदेश, वराड, दक्षिण,
कर्णाटक, तेलग, विहार, कोशल, अवध, युक्तप्रांत, और पजाव
आदि के कई पुरातन और प्रसिद्ध स्थानो की उन्होने यात्रा की
थी। इस यात्रा के समय, उस-उस स्थान के वारे मे जो-जो
साहित्यगत और परपराश्रुत बाते उन्हे ज्ञात हुई उनको उन्होने
सक्षेप मे लिपिबद्ध कर लिया और इस तरह उस स्थान या तीर्थ
का एक कल्प बना दिया। और साथ-ही मे ग्रन्थकार को सस्कृत
और प्राकृत दोनो भाषाओ, गद्य और पद्य दोनो ही प्रकार से, ग्रन्थ-
रचना करने का एकसा अभ्यास होने के कारण, कभी कोई कल्प
उन्होने सस्कृत भाषा मे लिख लिया तो कोई प्राकृत मे, और इसी
कभी किसी कल्प की रचना गद्य मे कर ली तो किसी की पद्य मे।
किसी एक स्थान के बारे मे पहले एक छोटी सी रचना कर ली
और फिर पीछे से कुछ अधिक वृत्त ज्ञात हुआ और वह लिपिबद्ध
करने जैसा प्रतीत हुआ, तो उसके लिये परिशिष्ट के तौर पर
एक कल्प या प्रकरण और लिख लिया गया। इस प्रकार भिन्न-
भिन्न समय मे और भिन्न-भिन्न स्थानो मे, इन कल्पो की रचना
होने से, इनमे किसी प्रकार का कोई क्रम नही रह सका।
३ ग्रन्थ की रचना की कालावधि
ग्रन्थ की इस प्रकार खण्डशः रचना होते रहने के कारण सारे
ही सग्रह के सम्पूर्ण होने मे बहुत दीर्घ समय व्यतीत हुआ मालूम
देता है। कम से कम ३० से अधिक वर्ष जितना काल लगा हुआ
होगा। क्योकि, जिन कल्पो मे रचना का समय-सूचन करने वाला
सवत् आदि का उल्लेख है, उनमे सबसे पुराना सवत् १३६४
मिलता है, जो वैभारगिरि-कल्प [क० ११, पृ० २३] के अन्त मे
दिया हुआ है। ग्रन्थकार का किया हुआ ग्रन्थ की समाप्ति का
सूचक जो अन्तिमोल्लेख है, उसमें सवत् १३८९ का निर्देश है।

मुनि जिनविजय का वक्तव्य ५
इससे २५ वर्षों के जितने काल का सूचन तो, स्वयं ग्रन्थ के इन
दो उल्लेखों से ज्ञात हो जाता है, लेकिन वैभारगिरि-कल्प के
पहले भी कुछ कल्पो की रचना हो गई थी और संवत् १३८९ के
बाद भी कुछ और कल्प या कृति अवश्य बनी थी, जिसका कुछ
स्पष्ट सूचन ग्रन्थगत अन्यान्य उल्लेखो से होता है। इसी कारण
से, ग्रन्थ-समाप्ति-सूचक जो कथन है वह किसी प्रति मे तो कही
मिलता है और किसी में कही। और यही कारण, प्रतियो में
कल्पो की सँख्या का न्यूनाधिकत्व होने मे भी है।
४. ग्रन्थगत विषय-विभाग
इस ग्रन्थ मे भिन्न-भिन्न विषय या स्थानो के साथ सम्बन्ध
रखने वाले सब मिलाकर ६०-६१ कल्प या प्रकरण है। इनमें से,
कोई ११-१२ तो स्तुति-स्तवन के रूप में हैं, ६-७ चरित्र या कथा
के रूप मे है और शेष ४०-४१ न्यूनाधिक वस्तु स्थानवर्णनात्मक
है। पुनः इन स्थानवर्णनात्मक कल्पों मे से, चतुरशीतिमहातीर्थ-
नामसग्रह जो कल्प [क्रमांक ४५] है उसमे तो प्रायः सभी प्रसिद्ध
और ज्ञात तीर्थस्थानों के नाम का निर्देश मात्र, किया गया है।
पार्श्वनाथ कल्प [क० ६] मे पार्श्वनाथ के नाम से सम्बद्ध ऐसे
कई स्थानो का उल्लेख है। उज्ज्यन्त अर्थात् रैवतगिरि का वर्णन
करने वाले भिन्न-भिन्न ४ कल्प [क० २-३-४-५] है। स्तम्भनक
तीर्थ और कन्यानयनमहावीर तीर्थ के सम्बन्ध मे दो-दो कल्प हैं।
इस प्रकार, अन्य विषय वाले तथा पुनरावृत्ति वाले जितने कल्प
हैं उनको छोड़ कर, केवल स्थानो की दृष्टि से विचार किया जाय
तो, इस ग्रन्थ मे कुल कोई ३७-३८ तीर्थभूत स्थानो का, कुछ
इतिहास या स्थान-परिचयगर्भित वर्णन दिया हुआ मिलता हैं।
५ स्थानो का प्रान्तीय-विभाग
यदि इन सब स्थानो को प्रान्त या प्रदेश की दृष्टि से विभक्त
किया जाय तो इनका पृथक्करण कुछ इस प्रकार होगा—

६ विविध तीर्थ-कल्प
गुजरात और काठियावाड़ राजपूताना और मालवा
शत्रुंजयमहातीर्थ [क० १] अर्बुदाचलतीर्थ [क० ८]
उज्जयन्त (रैवतगिरि) तीर्थ सत्यपुर तीर्थ [क० १७]
[क० २-३-४-५] शुद्धदन्तीगिरि [क०३१]
अश्वाववोधतीर्थ [क० १०] फलवृद्धि तीर्थ [क० ६०]
स्तम्भनकपुर [क० ५, ५९] ढिपुरी तीर्थ [क० ४३-४४]
अणहिलपुरस्थित अरिष्टनेमि कुडुङ्ङ्गेश्वर तीर्थ [क० ४७]
[क० २६] अभिनन्दनदेव तीर्थ [क० ३२]
अणहिलपुरस्थित कोकवसति वैभारगिरि [क० ११]
[क० ४०] अवध और बिहार
शंखपुर तीर्थ [क० २७] पावा या अपापांपुरी [क०२१,१४]
हरिकङ्खीनगर [क० २९] पाटलिपुत्र [क० ३६]
युक्तप्रान्त और पंजाब चंपापुरी [क० ३५]
अहिच्छत्रपुर [क० ७] कोटिशिला [क० ४१]
हस्तिनापुर [क० १६, ५] - कलिकुडकुर्कुटेश्वर [क० १५]
ढिल्ली या दिल्ली [क० ५१] मिथिला [क० १९]
मथुरा [क० ९] रत्नपुर [क० ७]
वाराणसी [क० ३८] कांपिल्यपुर [क० २५]
कौशावी [क० १२] अयोध्यापुरी [क० १३]
श्रावस्तीनगरी [क० ३७]
दक्षिण और वराड कर्नाटक और तेलंगण
नासिक्यपुर [क० २८] कुल्पाक माणिक्यदेव
प्रतिष्ठानपत्तन [क० २३] [क० ५२-५७]
अन्तरिक्षपार्श्वतीर्थ [क ० ५८] आमरकुड पद्मावती [क० ५३]
कल्यानयमहावीर [क० २२-५१]

प्रस्तावना
भारतवर्ष की धार्मिक सस्कृति मे 'तीर्थ' शब्द का अत्यधिक
महत्त्व रहता आया है । वैयाकरणियो ने इस शब्द की व्युत्पत्ति
'तृ' धातु के साथ 'थक्' प्रत्यय लगाकर की है—'तीर्यते, अनेन
वा, तृ प्लवन-तरणयो , पातु तुदि-ङति थक्'—अर्थात्, जिसके द्वारा
अथवा जिसके आधार से तिरा जाय वह 'तीर्थ' है । कोषकारो ने
'निपान-आगमयोस्तीर्थम्-ऋषिजुष्टे जले गुरौ' सूत्र द्वारा इस शब्द
के अनेक अर्थ दिये हैं, किन्तु भाव वही है, अर्थात् जो तिरा दे या
पार करा दे, अथवा तिरने या पार हो जाने मे जो सहायक हो,
साधक हो, वही 'तीर्थ' है । इसी आशय को व्यक्त करते हुए
आदिपुराणकार भगवज्जिनसेनाचार्य ने कहा है—
"ससारान्वेरपारस्य तरणे तीर्थमिष्यते ।"
जो (दुःखरूप) ससार सागर (जन्म-मरण रूप सतत् ससरंण)
से पार कर दे वह तोर्थ कहलाता है ।'
स्थावर, जगम और भाव के भेद रूप तीर्थ तीन प्रकार के
होते हैं—ऐसी पुण्यभूमियाँ या स्थल जो किसी पुण्य पुरुष, पवित्र
घटना अथवा पुनीत स्मारक आदि के साथ सम्बन्धित है, स्थावर
तीर्थ कहलाती हैं । अहंत तीर्थंकर आदि इष्टदेव और सद्गुरु जगम
तीर्थ होते हैं । और तीर्थंकरो का प्रेरणाप्रद चरित्र, उनका उपदेश
या जिनवाणी, भगवान अर्हत् का धर्मशासन, रत्नत्रय, अहिंसा
अथवा क्षमादि आत्मधर्म तथा शुद्ध आत्म तत्त्व भावतीर्थ हैं ।
वैसे सामान्यतया धर्मतीर्थ, तीर्थक्षेत्र या तीर्थ शब्दो से स्थावर
तीर्थों का ही वोध होता है । कहा भी है—

८ विविध तीर्थ-कल्प
इक्षोर्विकाररसपृक्तगुणेन लोके,
पिष्टोऽधिकं मधुरतामुपयाति [यद्वत् ।
तद्वच्च पुण्यपुरुषैरुषितानि नित्यं,
स्थानानि तानि जगतामिह पावनानि ॥
'जिस प्रकार लोक मे इक्षुरस से बने गुड मे गूंधा गया आटा
मीठा हो जाता है, उसी प्रकार पुण्यपुरुषो द्वारा सेवन किये गये
स्थान जगत के प्राणियो के लिए पावन स्थल बन जाते हैं।'
वस्तुत, वर्तमान कल्पकाल के ऋषभादि महावीर पर्यन्त
चौबीसो तीर्थंकरों के गर्भ-जन्म-दीक्षा-ज्ञान-निर्वाण नामक पाँच
कल्याणको से धन्य हुए स्थान, उनके जीवन की अन्य महत्त्वपूर्ण
घटनाओ से सम्बन्धित स्थान, पुरातन मुनिपुगवो की तपोभूमियाँ
एव सिद्धत्व-प्राप्ति के स्थान, विशिष्ट प्राचीन धार्मिक स्मारक,
चैत्य, स्तूप, लयण, स्तम्भ, मदिर आदि, किसी धार्मिक महत्त्व की
ऐतिहासिक घटना का स्थल, किसी सातिशय जिनप्रतिमा के
चमत्कारो के कारण प्रसिद्ध हुआ स्थान, तथा ऐसे स्थान जहाँ
पर्याप्त मात्रा मे ऐसे धार्मिक कलावशेष या पुरातत्वावशेष
उपलब्ध हैं जो उक्त स्थान के एक प्राचीन धार्मिक एव सास्कृतिक
केन्द्र रहने के प्राय सूचक होते हैं—ये सब जैन परम्परा के पवित्र
एव पूजनीय स्थावर तीर्थ हैं। उनकी एकाकी व ससघ यात्रा करके
श्रावक-श्राविकाएँ अपना जन्म सफल करते हैं। इन पवित्र स्थानो
के पुनीत वातावरण मे भक्तजनो के परिणाम निर्मल होते हैं। वहाँ
उनका अधिकाश समय भी दान, पूजा, स्मरण, कीर्त्तन, स्वाध्याय,
सामायिक, उपदेश श्रवण, व्रत, संयम, उपवास आदि धार्मिक
क्रियाओ मे व्यतीत होता है।
ऐसे जैन तीर्थ सैकडो हैं और उत्तर मे कैलाश पर्वत अपरनाम
अष्टापद (जो तिब्बत मे स्थित है) से लेकर दक्षिण मे कन्या-

कुमारी पर्यन्त उत्तर-पश्चिम मे तक्षशिला से लेकर पूर्वीतटवर्ती
भुवनेश्वर पर्यन्त, और उत्तर-पूर्व मे असम एवं बागला देश से
लेकर पश्चिमी समुद्रतट पर्यन्त इस महादेश भारतवर्ष मे बिखरे
पड़े हैं। देश का कोई राज्य, प्रान्त या प्रदेश ऐसा नही है जिसमे
एक या एक से अधिक जैन तीर्थ विद्यमान न हो। अनेक प्राचीन
तीर्थ विच्छिन्न अथवा विस्मृत भी हो गये और उनके स्थिति-स्थल
को खोजना या चीन्हना दुष्कर हो गया है। कई की स्थिति या
पहचान के विषय मे मतभेद उत्पन्न हो गये और एकाधिक स्थानो
से उनकी चीन्ह की जाने लगी। ऐसे भी अनेक तीर्थ हैं जो गत
साधिक एक सहस्र वर्ष के बीच ही—पूर्व मध्यकाल एव मध्यकाल
मे ही उदय में आये अथवा प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
जिन तीर्थों की यात्रा का क्रम अविच्छिन्न बना रहा, उनकी
स्थिति निर्भ्रान्त बनी रही, उनका अल्पाधिक विकास भी होता
रहा और संरक्षण भी हुआ। किन्तु काल-दोष से—अनेक राज-
नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक आदि कारणो से कई
तीर्थों की यात्रा विच्छिन्न हो गई और वे विस्मृति के गर्भ मे
विलीन होते गये। ऐसी दशा मे तीर्थविषयक साहित्य ही ऐसा
आधार रह गया जिसके द्वारा अधुना अज्ञात या विस्मृत तीर्थो का
नाम जीवित रहा और ज्ञात तीर्थों के सम्बन्ध मे भी अनेक ऐसे
तथ्य एवं वृत्त सुरक्षित रह सके जिन्हे लोकमानस ने विस्मृत
कर दिया था और जिनके सत्यापन का भी अब प्राय कोई उपाय
नही रह गया है।
मूल प्रतिक्रमण पाठ के विसीहदण्डक मे, कुन्दकुन्द कृत प्राकृत
भक्तियो एवं निर्वाणकांड मे, पूज्यपादीय सस्कृत भक्तियो मे यति-
वृषभकृत तिलोयपण्णत्ति मे, आगमसूत्रो और उनकी निर्युक्तियो,
चूर्णियो, भाष्यो, टीकाओ मे, पुराण एवं कथा साहित्य मे, पट्टा-

विविध तीर्थ-कल्प
वलियो-गुर्वावलियो मे, तथा शिलालेखो मे परम्परागत तीर्थों के
विषय में अनेक फुटकर ज्ञातव्य प्राप्त होते हैं । परन्तु, तीर्थों के
विषय में स्वतन्त्र रचनाएँ, यथा चैत्यवन्दन स्तोत्र, तीर्थविशेषों
के माहात्म्य, तीर्थकल्प, तीर्थमालाएँ आदि मध्यकाल में ही रची
गयीं । मदनकीर्त्ति ( लगभग १२४० ई० ) कृत शासनचतुस्त्रि-
शिका, उदयकीर्त्तिकृत निर्वाणभक्ति, प्रभाचन्द्रसूरि कृत प्रभावक-
चरित्र ( १२७७ ई० ) मेरुतुंग की प्रबन्धचिन्तामणि (१३०५ ई०)
जिनप्रभसूरिका कल्प-प्रदीप ( १३३२ ई० ), राजशेखरसूरिकृत
प्रबन्धकोश ( १३४८ ई० ), हंससोम की पूर्वदेशीय चैत्य-परिपाटी
( १५०८ ई० ), वर्धमानकृत दशभक्त्यादि संग्रह ( १५४२ ई० ),
ब्र० ज्ञानसागर की तीर्थावली ( १५५० ई० लगभग ), विजय-
सागर की तीर्थमाला ( १६०७ ई० ), भ विश्वभूषणकृत सर्वत्रै-
लोक्य जिनालय-जयमाला . ( १६६५ ई० ), शीलविजयगणी की
तीर्थमाला १ ( १६८९ ई० ), महेश्वरसूरि का शत्रुञ्जय-माहात्म्य
( १७०० ई० ), गुणभद्रकृत तीर्थार्चनचन्द्रिका ( ल १७५० ई० ),
देवदत्त दीक्षित के सम्मेदाचल माहात्म्य एवं स्वर्णाचल माहात्म्य
( १७८८ ई० ), प्रभृति इस प्रकार की प्रमुख ज्ञात रचनाएँ हैं ।
कई अन्य ( गिरनार आदि ) तीर्थों के माहात्म्य, कई एक तीर्थों के
पूजापाठ, जयमाला, स्तवन आदि, पं० भगवतीदास कृत अर्गलपुर-
जिनदेवता ( १५९४ ई० ) जैसे स्थानीय विवरण भी प्राप्त होते
हैं । वर्तमान शताब्दी में जैन तीर्थक्षेत्रों के जो अनेक विवरण-विवे-
चन प्रकाशित हुए हैं, वे ज्ञात एवं मान्य तीर्थों के वर्तमान रूप,
१ मुनि विजयधर्म सूरि ने स्वसम्पादित 'प्राचीन तीर्थमाला संग्रह'
( १९२१ ई० ) में ऐसी २५ तीर्थमालाओं का संग्रह प्रकाशित किया
था । चैत्य-वन्दन स्तोत्रों के लिए देखिए शोधांक नं० २४
पृ १३९-१४१ पर हमारा लेख ।

तत्संबंधी अनुश्रुतियों एवं किंवदंतियों और उपरोक्त मध्यकालीन
तीर्थ-साहित्य के आधार पर ही लिखे गये हैं। १ इस विषय में
सन्देह नहीं है कि उक्त मध्यकालीन रचनाओं में आचार्य जिन-
प्रभसूरि कृत कल्पप्रदीप (विविध तीर्थ-कल्प) अनेक दृष्टियो से
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है।
आचार्य जिनप्रभसूरि अपने युग के महान शासन प्रभावक
आचार्य थे। गुजरात के मोहिलवाड़ी ग्राम निवासी, श्रीमाल
ज्ञातीय, ताम्बीगोत्रीय श्रावक महाधर के पौत्र और रत्नपाल एवं
सेतलदेवी के कनिष्ठ सुपुत्र सुभटपाल के रूप में १२६१ ई० के
लगभग उनका जन्म हुआ था। ग्यारहवीं शती ई० के प्रथम पाद
मे आचार्य जिनेश्वरसूरि (प्रथम) द्वारा संस्थापित खरतरगच्छ के
अष्टम आचार्य जिनेश्वरसूरि द्वितीय (१२२१-१२७४ ई०) थे।
उनके समय मे खरतरगच्छ दो शाखाओं मे विभक्त हो गया—
वृहत्शाखा के आचार्य उनके पट्टशिष्य जिनप्रबोध सूरि हुए, और
दूसरे शिष्य, जिनसिंह सूरि, लघुशाखा के प्रथम आचार्य हुए।
इन्ही जिनसिंह सूरि (१२२३-१२८४ ई०) के निकट सुभटपाल ने
मात्र आठ वर्ष की बालवय मे जिनदीक्षा ली और धर्मतिलक नाम
प्राप्त किया। गुरु के सान्निध्य मे मनोयोग से विद्याभ्यास करके
कुछ ही वर्षों मे वह इतने बहुविज्ञ विद्वान हो गये कि उपाध्याय
पद प्राप्त कर लिया और मात्र २३ वर्ष की आयु मे, १२८४ ई०
मे जिनप्रभसूरि नाम से आचार्य पद पर आसीन होकर गुरु के
पट्टधर हुए। इस प्रकार लघु खरतर शाखा के वह द्वितीय और

१ स्व प नाथूराम प्रेमी ने अपने 'जैन साहित्य और इतिहास'
(द्वि स, १९५६) में पृ ४२२ से ४७७ पर्यन्त 'हमारे तीर्थक्षेत्र,'
'दक्षिण के तीर्थक्षेत्र' और 'तीर्थों के विवाद' शीर्षको से जैन तीर्थों
के विषय में अत्युत्तम ऊहापोह एवं विवेचन किया हैं।

करने मे इस ग्रन्थ का उपयोग हुआ है । लगभग एक सौ वर्ष पूर्व
पीटरसन ने सस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्थो की अपनी चतुर्थ रिपोर्ट
मे विविध तीर्थ कल्प का उल्लेख किया था; एस पी पडित ने
वाक्पतिकृत प्राकृत काव्य 'गउडवहो' के स्वसम्पादित सस्करण
की भूमिका मे विविध तीर्थ-कल्प के मथुरापुरी कल्प मे वर्णित
बप्पभट्टिसूरि एव आमराज के प्रसग का उल्लेख किया था, डा०
वुहलर ने मथुरा के स्वसपादित शिलालेखो की प्रस्तावना मे तथा
'ए लीजेन्ड आफ दी जैना स्तूप एव मथुरा' ( १८९७ ई० ) मे
उसका उपयोग किया है । कालान्तर मे प नाथूराम प्रेमी, डा०
वासुदेवशरण अग्रवाल, प्रो० कृष्णदत्त वाजपेयी, नाहटा जी,
स्वयं हमने, तथा अन्य अनेक विद्वानो ने जिनप्रभसूरि के विविध
तीर्थ-कल्प का उपयोग किया है ।
अन्त्य प्रशस्ति के अनुसार यह ग्रन्थ 'भूमडल के इन्द्र (अधिपति
या स्वामी) श्री हम्मीर महम्मद ( अमीर अर्थात् सुलतान, मुहम्मद
विन तुगलुक ) के राज्य मे, योगिनीपत्तन ( योगिनीपुर, दिल्ली )
मे भाद्रपद कृष्ण दशमी बुधवार, विक्रम सवत् १३८९
( सन् १३३२ ई० ) मे पूर्ण हुआ था । अनुष्टुप्मान से इसका श्लोक
परिमाण ३५६० था । ग्रन्थ मे कुल ६२ कल्प या प्रकरण सकलित
है, जिनमे से केवल ६ के अन्त मे उनकी रचना-तिथि दी गयी है—
वैभारगिरि-कल्प—क्रमांक ११ (१३०७ ई०), शत्रुजय तीर्थ-कल्प—
क्रमांक १ ( १३२८ ई० ), ढिपुरीस्तव-क्रमांक ४४ ( १३२९ ई० )
अपापा वृहत्कल्प—क्रमांक २१ ( १३३० ई० ), हस्तिनापुर तीर्थ
स्तवन—क्रमांक ५० (१३३१ ई०), और श्री महावीरगणधर-कल्प—
क्रमांक ३९ ( १३३२ ई० ) । शेष कल्पो मे उनकी रचना की
तिथि सूचित नही की गई है । किन्तु कुछ कल्पो की रचना-तिथि
अनुमान की जा सकती है, उनमे दिये गये संदर्भों के आधार पर,

प्रस्तावना · १५
यथा सत्यपुर-साचौर तीर्थ कल्प ( न० १७ ) १३१० ई० के वाद
कभी रचा गया है, अर्बुदगिरि कल्प ( न० ८ ) १३२१ ई० के
उपरान्त रचा गया, और कन्यानयननीय महावीर प्रतिमा कल्प
( न० २२ ) १३२८ ई० के उपरान्त, सम्भवतया १३३१-३२ ई० मे
रचा गया। इस कल्प का पूरक ( न० ५१ ) तो आचार्य के देहान्त
के पर्याप्त समय बाद रचा गया प्रतीत होता है—उसे उनके विद्या-
शिष्य संघतिलक सूरि के पट्टधर विद्यातिलक अपर नाम सोम-
तिलक सूरि ने रचा था, जिनके कुमारपालप्रबन्ध का रचनाकाल
१३६७ ई० है। अस्तु, कल्प-प्रदीप के विभिन्न कल्पो की रचना
आचार्य ने १३०७ से १३३२ ई० पर्यन्त लगभग २५ वर्षा के बीच
की थी। दो-चार की रचना १३०७ के पूर्व भी की गयी हो सकती
है। रचना-स्थलो मे न० १ और २२ दिल्ली मे रचे गये प्रतीत
होते हैं, न० २१ देवगिरि मे रचा गया और न० ५० हस्तिनापुर
में। शेष मे से कुछ विवक्षित तीर्थ स्थानो पर भी रचे गये हो
सकते हैं और अन्यत्र भी। भाषा की दृष्टि से २२ कल्प सस्कृत मे
और शेष प्राकृत मे रचित हैं।
पुस्तकगत कुल ६३ कल्पो मे एक तो अन्त्य प्रशस्ति के रूप
मे है, एक ( न० ४५ ) मे ८४ तीर्थो की सूची है, कई कल्प
स्तवन-स्तोत्र आदि के रूप मे हैं, नन्दीश्वर द्वीप जैसे मिथिक
स्थलो के तथा अष्टापदⁿ जैसे अनिश्चित आकार-प्रकार व स्थिति
के तीर्थों के भी कल्प है। कई तीर्थों पर एकाधिक कल्प रचे हैं,
यथा उज्ज्यन्त ( रैवतगिरि या गिरनार ) पर चार, प्रतिष्ठान पर
तीन और पावापुरी, ढीपुरी, हस्तिनापुर, अष्टापद, एव स्तभनक

ⁿ इस पर्वत की ऊँचाई ८ योजन (लगभग १०० किलोमीटर) और
स्थिति अयोध्या से १२ योजन (लगभग १५० कि० मी०) उत्तर में
[···]—इन दोनो ही बातो का प्राचीन परम्परा से सम्बन्ध है।

१२ विविध तीर्थ-कल्प
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आचार्य हुए। वह एक बहुभाषाविज्ञ, विविध
विषयनिष्णात, अनेक दीक्षाशिष्यो एव विद्याशिष्यो के गुरु, विपुल
साहित्य-प्रणेता, तीर्थोद्धारकर्त्ता, महान प्रभावक एव राज्य मान्य
जैनाचार्य थे। उनके द्वारा रचित साहित्य मे व्याकरण, कोष,
अलकार, मन्त्रशास्त्र, तीर्थपरिचय, खण्डन-मडन, वैधानिक
रचनाएँ, चरित्र काव्य, स्तोत्र-स्तवन, आगमिक एव अन्य टीकाएँ
आदि, सस्कृत और प्राकृत, गद्य एव पद्य की सैकडो कृतियाँ है।
अकेले स्तोत्र ही उन्होने ७०० रचे थे, ऐसी अनुश्रुति है। उनमे से
लगभग ८५ तो अद्यावधि उपलब्ध है। संकीर्ण साम्प्रदायिक
मनोवृत्ति से वह ऊपर थे। यही कारण है कि श्वेताम्बर सम्प्रदाय
के एक ( खरतर-लघु ) शाखागच्छ के प्रधान आचार्य होते हुए भी
कई अन्य गच्छो के साधु उनके प्रिय विद्याशिष्य थे। दिगम्बरो के
साथ भी उनका अच्छा सद्भाव था, और जैनेतरो मे हिन्दुओ के
प्रति ही नही, मुसलमानो के साथ भी उनका समुचित सद्भाव
रहा। अतएव जनता के प्राय सभी वर्गो से उन्होने आदर प्राप्त
किया। वह ऐसे युगचेता, समयानुसारी प्रवृत्ति के पारखी और
अवसर का लाभ उठाने मे पटु थे कि दिल्ली के तुर्क सुलतान
मुहम्मद बिन तुगलुक की उदार मनस्विता, विद्यारसिकता एव
दार्शनिक रुझान का लाभ उठाकर उन्होने उससे सम्पर्क साधा,
अपने चरित्र एवं प्रतिभा से उसे प्रभावित किया और उससे प्रभूत
सम्मान प्राप्त किया। इतना ही नही, सुलतान की प्रसन्नता का
का उपयोग उन्होने जिन-शासन की प्रभावना, जिन-मन्दिरो,
मूर्त्तियो और तीर्थों के सरक्षण तथा तीर्थों की ससघ यात्राओ के
लिए कई शाही फर्मान प्राप्त करने मे किया। धर्म-प्रभावना के
अपूर्व उत्साह मे उन्होने अपनी वृद्धावस्था, अस्वास्थ्य तथा जैन-
मुनि के वर्षावास आदि नियमो की भी परवाह नही की। इस
सुलतान के साथ उनका सम्पर्क चार-पाँच वर्ष ही रह पाया।

प्रस्तावना १३
१३२८ मे वह सर्वप्रथम उसके सम्पर्क मे आये और संभवतया
१३३३ ई० मे, लगभग ७२ वर्ष की आयु मे दिल्ली मे ही दिवंगत
हो गये थे ।१
विविध तीर्थ-कल्प, जिसका अपर, वल्कि मूल, नाम 'कल्प-
प्रदीप' है,२ आचार्य जिनप्रभसूरि की छोटी-बड़ी शताधिक रचनाओ
मे अनेक दृष्टियो से सर्वोपरि महत्त्व रखता है। लोक मे उनकी
प्रसिद्धि मुख्यतया इसी ग्रन्थ के कर्त्ता के रूप मे है। जैन विद्वानो
के अतिरिक्त अनेक जैनेतर प्राच्यविद एवं इतिहासकार भी उससे
परिचित हुए हैं, और इसमे चर्चित तीर्थों के विवेचन मे तथा उसमे
उल्लिखित कतिपय अनुश्रुतियो की ऐतिहासिकता पर ऊहापोह
१ आचार्य जिनप्रभसूरि का संक्षिप्त-जीवन परिचय मुनि जिनविजय जी
द्वारा सम्पादित एव सिंधी जैन ग्रन्थमाला, कलकत्ता से १९३४ ई०
में प्रकाशित 'विविध तीर्थ-कल्प' (मूल) की भूमिका में, श्री अगरचन्द
नाहटा द्वारा 'विविध मार्ग-प्रपा' के प्रारम्भ में, तथा श्री लालचन्द-
भगवान गांधी की गुजराती पुस्तक 'जिनप्रभसूरि अने सुलतान
मुहम्मद' में प्राप्त होता है। श्री अगरचन्द नाहटा द्वारा १९७५ में
प्रकाशित एव महोपाध्याय विनयसागर जी द्वारा लिखित पुस्तक
'शासन प्रभावक आचार्य जिनप्रभ और उनका साहित्य' में तो
आचार्य के जीवनवृत्त, गुरु-शिष्यपरम्परा, व्यक्तित्व, सुलतान
मुहम्मद तुगलक के साथ उनके सम्बन्धो, उनके चमत्कारो और
प्रभावक कार्यों तथा उनकी साहित्यिक कृतियो पर विस्तारपूर्वक
विचार किया गया है।
२. ग्रन्थ की अन्त्य प्रशस्ति में 'कल्पप्रदीपनामायं ग्रन्थो विजयतां
चिरम्', तथा उसके उपरान्त दी हुई पुष्पिका में 'इति श्रीकल्प-
प्रदीप ग्रन्थ समाप्त' रूप से स्वयं ग्रन्थकार ने अपनी कृति का
नाम 'कल्पप्रदीप' ही सूचित किया है।

१६ | विविध तीर्थ-कल्प


मे से प्रत्येक पर दो-दो। कन्यानयन-महावीर पर दूसरा कल्प
( न० ५१ ) तथा पंचकल्याणक स्तवन ( न० ५६ ) अन्यकर्तृक
हैं। इस प्रकार कुल केवल ३६ विभिन्न तीर्थ स्थानो के कल्प इस
ग्रन्थ मे प्राप्त हैं। आचार्य ने कर्त्तारूप मे अपना नाम अथवा
सकेत १९-२० कल्पो मे ही किया है। सभावना यही है कि शेष
भी उन्होने ही रचे होगे, किन्तु यह निश्चयपूर्वक कहना कठिन है
कि उनमे से कोई भी भिन्नकर्तृक नही है। कल्प न० ४५ मे
तन्त्र के जानकारो से प्राप्त सूचना के आधार पर जिन प्रसिद्ध
८४ तीर्थों की सूची दी हैं, उसके विषय में स्वयं स्वीकार किया है
कि 'इनमे से कुछ ही देखे हैं, शेष के विषय में सुना है।' इस सूची
मे एक-एक तीर्थ का कई बार उल्लेख हुआ है, एक स्थान से
सम्बधित कई तीर्थों का भी पृथक्-पृथक् उल्लेख किया है, और
कई तीर्थ, यथा क्रौंचद्वीप, हंसद्वीप, लका, पाताल लका, त्रिकूट
गिरि, कैलाश, अष्टापद आदि भारतवर्ष के बाहर हैं। जैन परम्परा
मे मान्य सभी तीर्थ इस सूची मे समाविष्ट नही हैं, और अधिकांश
तीर्थ अतिशय क्षेत्र हैं।

जिन विभिन्न वास्तविक ३६-३७ तीर्थ स्थानो का परिचय
आचार्य ने इस कल्प-प्रदीप मे दिया है वे गुजरात, राजस्थान,
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब-हरियाणा, विहार, महाराष्ट्र,
आन्ध्र और कर्नाटक जैसे विभिन्न प्रदेशो मे अवस्थित है। उनमे
से अधिकतर ऐसे है जिनको आचार्य ने स्वयं यात्रा की लगती है,
और कई ऐसे हैं जिनकी यात्रा तो वे नही कर पाये किन्तु उनके
विषय मे जैसा जाना-सुना, लिख दिया है। जिन तीर्थों को
उन्होने स्वयं देखा उनके विषय मे तो बहुत कुछ जैसा देखा
वैसा लिखा, साथ ही स्थानीय किवदंतियो अथवा पूर्ववर्ती
साहित्यिक या मौखिक अनुश्रुतियो से जो जाना, वह भी लिख

दिया। ऐसी स्थिति मे कल्प के अन्त मे बहुधा यह भी स्पष्ट
सकेत कर दिया कि 'जैसा सुना या जाना है, वैसा लिखा है !'
अनेक बार तत्कालीन वस्तुस्थिति, ऐतिहासिक तथ्य, दंतकथाओ
आदि पर आधारित सूचनाएं, विशेषकर स्थान या प्रतिमा विशेष
से सम्बन्धित अतिशयो, चमत्कारो आदि के कथन, कुछ इस प्रकार
मिश्रित हो गये है कि आधुनिक अन्वेषक के लिए उनमे से
तथ्यातथ्य को पृथक्-पृथक् करना दुष्कर हो सकता है। तथापि,
आचार्य की मनोवृत्ति, व्यक्तित्व, शैली और सकेतो की पकड़
पा लेने से यह कार्य बहुत कुछ सुगम हो जाता है।
पूरे ग्रन्थ के विश्लेषण से अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
उपलब्ध होते है, अनेक ऐसी ऐतिहासिक अनुश्रुतियाँ भी प्राप्त
होती है जिनका सत्यापन असंभव नही है, और जितने अगों मे
वे सत्यापित हो जाती है, इतिहास-निर्माण मे अतीव उपयोगी
होगी। तीर्थों के परिचय मे अनेक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक सूचनाएँ
भी प्राप्त होती हैं। उस युग की लोकदशा, जैन संस्कृति, कतिपय
धार्मिक एव सामाजिक प्रथाओ, आर्थिक एव राजनैतिक परिस्थिति
पर साथ ही श्वेताम्बरो एव दिगम्बरो के, तथा जैनो और अजैनों
के पारस्परिक सम्बन्धो पर भी अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस ग्रन्थ
से ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल मे ये सम्बंध अपेक्षाकृत
अधिक सौहार्द एव प्रीतिपूर्ण थे। दिगम्बर-श्वेताम्बर सम्प्रदाय का
भेद चिरकालीन एव रूढ हो चुका था, परन्तु अभी तक मन्दिर,
मूर्त्तियाँ एव तीर्थस्थान प्राय अभिन्न थे। उभय सम्प्रदायो के
श्रावक-श्राविकाएँ ही नही, साधु भी बहुधा साथ-साथ उनका
धर्मलाभ उठाते थे। यदि गुजरात, राजस्थान आदि के कतिपय
तीर्थों के प्रति श्वेताम्बरो का विशेष आकर्षण था तो महाराष्ट्र,
आन्ध्र, कर्णाटक आदि के तीर्थों पर दिगम्बरो का विशेष यातायात
था, किन्तु ऐसा कोई भेद उस समय तक उदय मे आया नही
२

१८ विविध तीर्थ-कल्प

लगता कि अमुक तीर्थक्षेत्र श्वेताम्बर है, अमुक दिगम्बर है।
जिन मदिरो एव जिन-प्रतिमाओ के विषय मे भी यही स्थिति
थी । जैनेतरो के लिए तो दिगम्बरो और श्वेताम्बरो मे कोई
भेद ही नही था—दोनो समान रूप से 'सरावगान' ( श्रावक )
कहलाते थे, क्योकि जैन गृहस्थो के लिए उस काल मे यही गव्द
बहुप्रचलित था ।
आचार्य जिनप्रभ गास्त्रज्ञ विद्वान थे, साथ ही जिनभक्त,
तीर्थभक्त श्रद्धालु साधु थे । मन्त्र-तन्त्र, चमत्कारो और अतिगयो
मे उनका सहज विश्वास था । वह युग भी तान्त्रिक युग था, नाथ-
सम्प्रदायी जोगियो का यत्र-तत्र बाहुल्य था, मुसलमान सूफी
फकीर भी चमत्कारो का आश्रय लेते थे । इस प्रकार के विश्वास
उस काल मे लोकप्रचलित थे । विविध तीर्थकल्प मे वर्णित अनेक
चमत्कार ऐसे हैं, जिनकी विभिन्न जिन प्रतिमाओं के प्रसग मे
पुनरावृत्ति हुई लगती है, और कई एक अन्यत्र भी हुए सुने गये
हैं । आज के वैज्ञानिक दृष्टि से प्रभावित तार्किक मानस को वे
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