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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 24

मुनि जिनविजय का वक्तव्य ५
इससे २५ वर्षों के जितने काल का सूचन तो, स्वयं ग्रन्थ के इन
दो उल्लेखों से ज्ञात हो जाता है, लेकिन वैभारगिरि-कल्प के
पहले भी कुछ कल्पो की रचना हो गई थी और संवत् १३८९ के
बाद भी कुछ और कल्प या कृति अवश्य बनी थी, जिसका कुछ
स्पष्ट सूचन ग्रन्थगत अन्यान्य उल्लेखो से होता है। इसी कारण
से, ग्रन्थ-समाप्ति-सूचक जो कथन है वह किसी प्रति मे तो कही
मिलता है और किसी में कही। और यही कारण, प्रतियो में
कल्पो की सँख्या का न्यूनाधिकत्व होने मे भी है।
४. ग्रन्थगत विषय-विभाग
इस ग्रन्थ मे भिन्न-भिन्न विषय या स्थानो के साथ सम्बन्ध
रखने वाले सब मिलाकर ६०-६१ कल्प या प्रकरण है। इनमें से,
कोई ११-१२ तो स्तुति-स्तवन के रूप में हैं, ६-७ चरित्र या कथा
के रूप मे है और शेष ४०-४१ न्यूनाधिक वस्तु स्थानवर्णनात्मक
है। पुनः इन स्थानवर्णनात्मक कल्पों मे से, चतुरशीतिमहातीर्थ-
नामसग्रह जो कल्प [क्रमांक ४५] है उसमे तो प्रायः सभी प्रसिद्ध
और ज्ञात तीर्थस्थानों के नाम का निर्देश मात्र, किया गया है।
पार्श्वनाथ कल्प [क० ६] मे पार्श्वनाथ के नाम से सम्बद्ध ऐसे
कई स्थानो का उल्लेख है। उज्ज्यन्त अर्थात् रैवतगिरि का वर्णन
करने वाले भिन्न-भिन्न ४ कल्प [क० २-३-४-५] है। स्तम्भनक
तीर्थ और कन्यानयनमहावीर तीर्थ के सम्बन्ध मे दो-दो कल्प हैं।
इस प्रकार, अन्य विषय वाले तथा पुनरावृत्ति वाले जितने कल्प
हैं उनको छोड़ कर, केवल स्थानो की दृष्टि से विचार किया जाय
तो, इस ग्रन्थ मे कुल कोई ३७-३८ तीर्थभूत स्थानो का, कुछ
इतिहास या स्थान-परिचयगर्भित वर्णन दिया हुआ मिलता हैं।
५ स्थानो का प्रान्तीय-विभाग
यदि इन सब स्थानो को प्रान्त या प्रदेश की दृष्टि से विभक्त
किया जाय तो इनका पृथक्करण कुछ इस प्रकार होगा—