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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 442 में से

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पृष्ठ 22

विविध तीर्थ-कल्प के सम्बन्ध में
मुनि जिनविजय का वक्तव्य
१ श्री जिनप्रभसूरिरचित कल्प-प्रदीप
कल्प-प्रदीप अथवा विशेषतया प्रसिद्ध विविध तीर्थ-कल्प नामक
यह ग्रंथ जैन साहित्य की एक विशिष्ट वस्तु है। ऐतिहासिक और
भौगोलिक दोनों प्रकार के विषयों की दृष्टि से इस ग्रंथ का बहुत कुछ
महत्त्व है। जैन साहित्य ही मे नही, समग्र भारतीय साहित्य मे भी इस
प्रकार का कोई दूसरा ग्रन्थ अभी तक ज्ञात नही हुआ। यह ग्रन्थ,
विक्रम १४वी गताब्दी मे, जैनधर्म के जितने पुरातन और विद्यमान
प्रसिद्ध-प्रसिद्ध तीर्थ स्थान थे उनके संबंध की प्राय एक प्रकार
की 'गाईड-वुक' है। इसमे वर्णित उन उन तीर्थों का संक्षिप्त रूप
से स्थान-वर्णन भी है और यथाज्ञात इतिहास भी है।
२ ग्रंथकार आचार्य
ग्रन्थकार अपने समय के एक वडे भारी विद्वान् और प्रभाव-
शाली जैन आचार्य थे। जिस तरह, विक्रम की १७वी गताब्दी मे,
मुगलसम्राट अकवर वादशाह के दरवार मे जैन जगद्गुरु हीर-
विजय सूरि ने गाही सम्मान प्राप्त किया था, उसी तरह जिनप्रभ
सूरि ने भी १४वी गताब्दी मे तुघलक सुलतान महम्मद शाह के
दरवार मे बड़ा गौरव प्राप्त किया था। भारत के मुसलमान
वादगाहो के दरवार मे, जैन धर्म का महत्व बतलाने वाले और
उसका गौरव वढाने वाले, गायद, सबसे पहले ये ही आचार्य हुए।
इनको प्रस्तुत रचना के अवलोकन से ज्ञात होता है, कि
इतिहास और स्थल-भ्रमण से इनको बडा प्रेम था। इन्होंने अपने
जीवन में भारत के बहुत से भागो मे परिभ्रमण किया था।