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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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८ विविध तीर्थ-कल्प
इक्षोर्विकाररसपृक्तगुणेन लोके,
पिष्टोऽधिकं मधुरतामुपयाति [यद्वत् ।
तद्वच्च पुण्यपुरुषैरुषितानि नित्यं,
स्थानानि तानि जगतामिह पावनानि ॥
'जिस प्रकार लोक मे इक्षुरस से बने गुड मे गूंधा गया आटा
मीठा हो जाता है, उसी प्रकार पुण्यपुरुषो द्वारा सेवन किये गये
स्थान जगत के प्राणियो के लिए पावन स्थल बन जाते हैं।'
वस्तुत, वर्तमान कल्पकाल के ऋषभादि महावीर पर्यन्त
चौबीसो तीर्थंकरों के गर्भ-जन्म-दीक्षा-ज्ञान-निर्वाण नामक पाँच
कल्याणको से धन्य हुए स्थान, उनके जीवन की अन्य महत्त्वपूर्ण
घटनाओ से सम्बन्धित स्थान, पुरातन मुनिपुगवो की तपोभूमियाँ
एव सिद्धत्व-प्राप्ति के स्थान, विशिष्ट प्राचीन धार्मिक स्मारक,
चैत्य, स्तूप, लयण, स्तम्भ, मदिर आदि, किसी धार्मिक महत्त्व की
ऐतिहासिक घटना का स्थल, किसी सातिशय जिनप्रतिमा के
चमत्कारो के कारण प्रसिद्ध हुआ स्थान, तथा ऐसे स्थान जहाँ
पर्याप्त मात्रा मे ऐसे धार्मिक कलावशेष या पुरातत्वावशेष
उपलब्ध हैं जो उक्त स्थान के एक प्राचीन धार्मिक एव सास्कृतिक
केन्द्र रहने के प्राय सूचक होते हैं—ये सब जैन परम्परा के पवित्र
एव पूजनीय स्थावर तीर्थ हैं। उनकी एकाकी व ससघ यात्रा करके
श्रावक-श्राविकाएँ अपना जन्म सफल करते हैं। इन पवित्र स्थानो
के पुनीत वातावरण मे भक्तजनो के परिणाम निर्मल होते हैं। वहाँ
उनका अधिकाश समय भी दान, पूजा, स्मरण, कीर्त्तन, स्वाध्याय,
सामायिक, उपदेश श्रवण, व्रत, संयम, उपवास आदि धार्मिक
क्रियाओ मे व्यतीत होता है।
ऐसे जैन तीर्थ सैकडो हैं और उत्तर मे कैलाश पर्वत अपरनाम
अष्टापद (जो तिब्बत मे स्थित है) से लेकर दक्षिण मे कन्या-