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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

४ विविध तीर्थ-कल्प
गुजरात, राजपूताना, मालवा, मध्यप्रदेश, वराड, दक्षिण,
कर्णाटक, तेलग, विहार, कोशल, अवध, युक्तप्रांत, और पजाव
आदि के कई पुरातन और प्रसिद्ध स्थानो की उन्होने यात्रा की
थी। इस यात्रा के समय, उस-उस स्थान के वारे मे जो-जो
साहित्यगत और परपराश्रुत बाते उन्हे ज्ञात हुई उनको उन्होने
सक्षेप मे लिपिबद्ध कर लिया और इस तरह उस स्थान या तीर्थ
का एक कल्प बना दिया। और साथ-ही मे ग्रन्थकार को सस्कृत
और प्राकृत दोनो भाषाओ, गद्य और पद्य दोनो ही प्रकार से, ग्रन्थ-
रचना करने का एकसा अभ्यास होने के कारण, कभी कोई कल्प
उन्होने सस्कृत भाषा मे लिख लिया तो कोई प्राकृत मे, और इसी
कभी किसी कल्प की रचना गद्य मे कर ली तो किसी की पद्य मे।
किसी एक स्थान के बारे मे पहले एक छोटी सी रचना कर ली
और फिर पीछे से कुछ अधिक वृत्त ज्ञात हुआ और वह लिपिबद्ध
करने जैसा प्रतीत हुआ, तो उसके लिये परिशिष्ट के तौर पर
एक कल्प या प्रकरण और लिख लिया गया। इस प्रकार भिन्न-
भिन्न समय मे और भिन्न-भिन्न स्थानो मे, इन कल्पो की रचना
होने से, इनमे किसी प्रकार का कोई क्रम नही रह सका।
३ ग्रन्थ की रचना की कालावधि
ग्रन्थ की इस प्रकार खण्डशः रचना होते रहने के कारण सारे
ही सग्रह के सम्पूर्ण होने मे बहुत दीर्घ समय व्यतीत हुआ मालूम
देता है। कम से कम ३० से अधिक वर्ष जितना काल लगा हुआ
होगा। क्योकि, जिन कल्पो मे रचना का समय-सूचन करने वाला
सवत् आदि का उल्लेख है, उनमे सबसे पुराना सवत् १३६४
मिलता है, जो वैभारगिरि-कल्प [क० ११, पृ० २३] के अन्त मे
दिया हुआ है। ग्रन्थकार का किया हुआ ग्रन्थ की समाप्ति का
सूचक जो अन्तिमोल्लेख है, उसमें सवत् १३८९ का निर्देश है।