विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना
भारतवर्ष की धार्मिक सस्कृति मे 'तीर्थ' शब्द का अत्यधिक
महत्त्व रहता आया है । वैयाकरणियो ने इस शब्द की व्युत्पत्ति
'तृ' धातु के साथ 'थक्' प्रत्यय लगाकर की है—'तीर्यते, अनेन
वा, तृ प्लवन-तरणयो , पातु तुदि-ङति थक्'—अर्थात्, जिसके द्वारा
अथवा जिसके आधार से तिरा जाय वह 'तीर्थ' है । कोषकारो ने
'निपान-आगमयोस्तीर्थम्-ऋषिजुष्टे जले गुरौ' सूत्र द्वारा इस शब्द
के अनेक अर्थ दिये हैं, किन्तु भाव वही है, अर्थात् जो तिरा दे या
पार करा दे, अथवा तिरने या पार हो जाने मे जो सहायक हो,
साधक हो, वही 'तीर्थ' है । इसी आशय को व्यक्त करते हुए
आदिपुराणकार भगवज्जिनसेनाचार्य ने कहा है—
"ससारान्वेरपारस्य तरणे तीर्थमिष्यते ।"
जो (दुःखरूप) ससार सागर (जन्म-मरण रूप सतत् ससरंण)
से पार कर दे वह तोर्थ कहलाता है ।'
स्थावर, जगम और भाव के भेद रूप तीर्थ तीन प्रकार के
होते हैं—ऐसी पुण्यभूमियाँ या स्थल जो किसी पुण्य पुरुष, पवित्र
घटना अथवा पुनीत स्मारक आदि के साथ सम्बन्धित है, स्थावर
तीर्थ कहलाती हैं । अहंत तीर्थंकर आदि इष्टदेव और सद्गुरु जगम
तीर्थ होते हैं । और तीर्थंकरो का प्रेरणाप्रद चरित्र, उनका उपदेश
या जिनवाणी, भगवान अर्हत् का धर्मशासन, रत्नत्रय, अहिंसा
अथवा क्षमादि आत्मधर्म तथा शुद्ध आत्म तत्त्व भावतीर्थ हैं ।
वैसे सामान्यतया धर्मतीर्थ, तीर्थक्षेत्र या तीर्थ शब्दो से स्थावर
तीर्थों का ही वोध होता है । कहा भी है—