विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विवाह का उद्देश्य ३३
ने बनाया है। मनुसंहिता के अनुसार पति पत्नी का सम्बन्ध जीवन
भर का संग है। पति से पत्नी किसी दशा मे अलग नहीं हो सकती
न त्याग देने से, न बेच देने से, न दान मे देने से। इसलिये विवाह का
नियम हमारे शास्त्रकारो ने बडे विचार के साथ रक्खा है परन्तु इस
समय इतना विचार किया नहीं जाता। नाई बारी और पुरोहितो
की रायपर विवाह होता है, वे इधर की उधर मिलाकर मेल मिला
देते हैं परन्तु वह मेल शास्त्रोक्त नहीं होता।
शास्त्रकारो ने बतलाया है:—
सम्यग्धर्म्मार्थकामेषु दम्पतिभ्यामहर्निशम् ।
एकचित्ततया भाव्यं समानव्रतवृत्तितः॥ मनु०
धर्म, अर्थ और काम विषय मे पति को पत्नी सर्वदा एक
मन होना चाहिये। एक मन होने से ही गृहस्थी रूपी गाड़ी
ठीक चलती है क्योकि पति पत्नी उस गाड़ी के दो समान
पहिया हैं।
अनृतावृतुकाले च मंत्र संस्कार कृत्पतिः।
सुखस्य नित्यं दातेह परकाले च योषितः॥
मन्त्रादि द्वारा विवाह कर्त्ता स्वामी सब समय मे स्त्री को
सुखदाता, आनन्द देने वाला होता है केवल इसी काल मे नहीं
परकाल मे भी वह पत्नी को सुखदेने वाला होता है। पढिये
विवाह सम्बन्ध मे:—
३
३४ भूमिका
वेद शास्त्रों की आज्ञा
ओं गृभ्णामि ते सौभगत्वाय,
हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं,
त्वादुर्गाहपत्याय देवाः ॥
अर्थात् विवाह के समय वर दुलहिन से कहता है—हे वरानने !
जैसे मैं ऐश्वर्य सुसन्तानादि सौभाग्य की बढ़ती के लिये तेरे हाथ
को ग्रहण करता हू वैसे तू मुझ पति के साथ जरा अवस्था
( वृद्धावस्था ) को सुख पूर्वक प्राप्त हो। पत्नी कहती है—हे वीर ! मैं
वृद्धि के लिये आपका हाथ ग्रहण करती हूं, आप मुझ पत्नी के
सौभाग्य के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये ।
आपको मै और मुझको आप आज से पति पत्नी भाव करके
प्राप्त हुए हैं। पति कहता है, सकल ऐश्वर्य युक्त न्यायकारी सब
जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता, बहुत प्रकार के जगत् का धर्त्ता
परमात्मा और ये सब सभा मण्डप में बैठे हुए विद्वान लोग
गृहस्थाश्रम कर्म के अनुष्ठान के लिये तुमको मुझे देते हैं। आज
से मैं तुम्हारे हाथ और तुम मेरे हाथ बिक चुके। अब कभी एक
दूसरे के प्रति अप्रियाचरण न करेंगे।
ओं भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् ।
पत्नी त्वमसि धर्मणाहं गृहपतिस्तव ॥
वेद शास्त्रों की आज्ञा ३५
हे प्रिये । ऐश्वर्य युक्त मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूं तथा
धर्म्म युक्त मार्ग में प्रेरक मै, तेरे हाथ को ग्रहण कर चुका हूं । तू
धर्म से मेरी पत्नी भार्या है और मैं धर्म्म से तेरा गृहपति हूं । हम
तुम दोनों मिलकर घरके कामो की सिद्धि करे और जो दोनो का
अप्रियाचरण व्यभिचार है उसको कभी न करें जिससे घरके
सब काम सिद्ध हों, उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की सदा वृद्धि
होती रहे ।
ममेयमस्तु पोष्यामह्यं त्वादाद् बृहस्पतिः ।
मया पत्या प्रजावति शं जीव शरदः शतम् ॥
हे अनघे ! सब जगत् के पालन करने वाले परमात्मा ने जिस
तुमको मुझे दिया है वही तू जगत भर में मेरी पोषण करने योग्य
पत्नी हो । तू मुझ पति के साथ सौ शरद ऋतु अर्थात् सौ वर्ष
पर्यन्त सुख पूर्वक जीवन धारण कर ।
इसी प्रकार वधू भी वर से प्रतिज्ञा कराती है ।
हे भद्र वीर ! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए ।
मेरे लिये आपके विना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी
पालन करने वाला और सेव्य इष्टदेव कोई नहीं है, न मैं आपसे
अन्य दूसरे किसी को मानूंगी । जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी
किसी स्त्री से प्रीति न करेंगे वैसे मै भी किसी दूसरे पुरुष के साथ
(कुटिल ) प्रीति भाव से बर्त्ताव न करूंगी । आप मेरे साथ सौ
वर्ष पर्यन्त आनन्द से जीवन व्यतीत कीजिये ।
३६ भूमिका
त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं,
बृहस्पतेः प्रशिषा कवीनाम्।
तेनेमां नारीं सविता भगश्च,
सूर्यामिव परिधत्तां प्रजया ॥
हे शुभानने ! जैसे इस परमात्मा की सृष्टि में उसकी तथा
आप्त विद्वानों की शिक्षा से दम्पती होते हैं, जैसे बिजली सबको
व्याप्त हो रही है वैसे तू मेरी प्रसन्नता के लिये सुन्दर वस्त्र और
आभूषण तथा मुझसे सुख को प्राप्त हो। इस मेरी और तेरी इच्छा
को परमात्मा सिद्ध करे। जैसे सकल जगत् की उत्पत्ति करने वाला
परमात्मा, पूर्ण ऐश्वर्य युक्त उत्तम प्रजा (सन्तान) से इस
तुच्छ मुझ नर की स्त्री को आच्छादित शोभा युक्त करे वैसे मैं
इन सबसे सूर्य की किरण के समान तुझको वस्त्र और भूषणादि
से सदा सुशोभित रक्खूंगा ।
इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा,
मित्रावरुणौ भगो अश्विनोभा ।
बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम,
इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ॥
हे मेरे सम्बन्धी लोगो ! जैसे बिजली और प्रसिद्ध अग्नि सूर्य
और भूमि अन्तरिक्षस्थ वायु प्राण और उदान तथा ऐश्वर्य, सद्वैद्य
वेद शास्त्रों की आज्ञा ३७
और मनोरञ्जन दोनों श्रेष्ठ, न्यायकारी यती प्रजा का पालन
करने वाला राजा, सभ्य मनुष्य, सर्वेश्वर परमात्मा और चन्द्रमा
तथा सोमलतादि औषधि गण सब प्रजा की वृद्धि और पालन
करते हैं वैसे ही इस मेरी स्त्री को तुम भी बढ़ाया करो। जैसे मैं इस
स्त्री को प्रजा आदि अर्थात् सन्तान से सदा बढ़ाया करूंगा। इसी
प्रकार स्त्री भी प्रतिज्ञा करती है कि मैं भी अपने पति को सदा
आनन्द ऐश्वर्य और सन्तान से बढ़ाया करूंगी। जैसे ये दोनों
मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं वैसे हम दोनों मिलके गृहस्था-
श्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें।
अहं विष्यामि मयि रूपमस्या,
वेददित्पश्यन्मनसा कुलायम् ।
न स्तेयमद्म्यभि मनसोदमुच्ये.
स्वयं श्रन्थानो वरुणस्य पाशान् ॥
हे कल्याणी ! जैसे मनसे कुलकी वृद्धि को देखता हुआ मैं
इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और उसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूं
वैसे ही तू मेरी पत्नी मुझ में प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल
व्यवहार को प्राप्त हो। जैसे मैं मन से भी तुझ भार्या के साथ
चोरी को छोड़ देता हूं अर्थात् तुझसे छिपाकर और तेरी इच्छा
के विरुद्ध किसी उत्तम पदार्थ का चोरी से भोग न करूंगा,
कोई कार्य न करूंगा। मैं पुरुषार्थ से शिथिल होकर भी उत्कृष्ट
व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुषो के बन्धनों को दूर करता
३६ भूमिका
रहूंगा वैसे ही तू मेरी भार्या भी करती रहे। इसी प्रकार वधू भी
कहती है कि मैं भी आपको इच्छा के विरुद्ध आपका कोई अप्रिय
कार्य न करूंगी।
पाठक पाठिकाओ ! हमारे देश मे विवाह का लक्ष्य स्त्री
पुरुष का प्रेम से रहकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करने का है। यही
वेद और शास्त्रो में बतलाया है क्योंकि स्त्री पुरुष को परमात्मा
ने सृष्टि की उन्नति के ही लिये उत्पन्न किया है।
भारतवर्ष मे विवाह बन्धन पति पत्नी का एक बड़ा भारी
बन्धन समझा जाता है और इस बन्धन मे बधे रहकर पति
पत्नी प्रेम पूर्वक उत्तम सन्तान उत्पन्न कर मनुष्य जीवन का
आनन्द भोगे यही विवाह का लक्ष्य है। जिन देशो मे विवाह
बन्धन नही समझा जाता वहा विवाह केवल मन बहलाव के
लिये ही किया जाता है और जब पति पत्नी मे कुछ भी अनबन
हो जाती है तो पत्नी पति से अपना सम्बन्ध तोड़ देती है। पति का
कुछ अधिकार नही रहता। पाश्चात्य देशो मे इस प्रकार की अनेक
घटनाये नित्यप्रति हुआ करती हैं।
हमारे देश में पति पत्नी का सम्बन्ध किसी समय किसी
प्रकार टूट नही सकता क्योकि वेद की आज्ञानुसार विवाह के
समय पति पत्नी दोनो परस्पर प्रतिज्ञा करते हैं।
ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि।
मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु ॥
वेद शास्त्रों की आज्ञा ३६
मम वाचमेकमना जुषस्व ।
प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् ॥
अर्थात् पति पत्नी से कहता है—हे वधू ! तेरे अन्तःकरण
और आत्मा को मैं अपने कर्म के अनुकूल धारण करता हूँ, मेरे चित्त
के अनुकूल तेरा चित्त सदा रहे। मेरी वाणी को तू एकाग्र चित्त
से सेवन किया कर। प्रजा का पालन करने वाला परमात्मा तुझको
मेरे लिये नियुक्त करे ।
इसी प्रकार पत्नी कहती है—हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपका
हृदय और आत्मा अपने प्रियाचरण कर्म के अनुकूल धारण
करती हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे । आप
एकाग्र चित्त होकर मेरी वाणी का, जो कुछ मै आपसे कहूँ
उसका सेवन सदा किया करे क्योकि आज से प्रजापति परमात्मा
ने आपको मेरे आधीन किया है जैसे मुझको आपके आधीन
किया है अर्थात् इस परमात्मा की बताई हुई प्रतिज्ञा के अनुसार
दोनो व्यवहार करे जिससे सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान
होके सब प्रकार के व्यभिचार अप्रियभाषणादि को छोड़कर
परस्पर प्रीतियुक्त रहे ।
वेद में परमात्मा की इस आज्ञानुसार प्राचीन समय मे
सभी भारतवासी चलते रहे हैं तभी आरोग्य और दीर्घजीवी होते
थे । सन्तान भी आरोग्य और दीर्घजीवी होती थी । जबसे इन
आज्ञाओं का उल्लंघन किया गया तब से दाम्पत्य प्रेम का अभाव
४० भूमिका
हो गया और पति पत्नी दोनों रोगी हो रोगी और अल्पायु
सन्तान उत्पन्न करने लगे। वेद मे आज्ञा हैः—
ओं इमां त्वमिन्द्रमीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु ।
दशास्यां पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि ॥
ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे ( मीढ्व )
वीर्य संचय करने वाले परमऐश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन् ! तू
इस वधू को उत्तम पुत्र युक्त सुन्दर सौभाग्य भोगवाली कर । इस
वधू मे दश पुत्रों को उत्पन्न कर अधिक नहीं । और हे स्त्री !
तू भी अधिक कामना मत कर किन्तु दश पुत्र और ग्यारहवां
पति को प्राप्त होकर सन्तोष कर । यदि इससे आगे सन्तान की
इच्छा करोगे तो तुम्हारे दुष्ट अल्पायु निर्बुद्धि सन्तान होगी
और तुम भी अल्पायु और नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित हो
जाओगे इसलिये अधिक सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा न
करना इत्यादि ।
इससे तात्पर्य यही है कि सन्तान के ही लिये संभोग किया
जाना चाहिये और अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाले माता
पिता और सन्तान दोनों निर्बल दुर्बल और रोगी कम आयु
वाले होंगे । इस नियम के अनुसार स्त्री पुरुष तथा सन्तान की
भी आयु सौ वर्ष से कम न होगी । इसके विषय में भी वेद में
परमात्मा की आज्ञा है ।
आरोग्यता और दीर्घ जीवन ( १०० वर्ष आयु ) प्राप्त कर,
शास्त्रकार और स्त्रिया ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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वेद शास्त्रों की आज्ञा ४१
उत्तम, आरोग्य और दीर्घ जीवी सन्तान उत्पन्न होने के विषय
में वेद की आज्ञा है.—
सोमो वधूरभवदश्विनास्तामुभा वरा ।
सूर्या यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविता ददात् ॥
अर्थात्—सुकुमार शुभ गुण युक्त वधू ( पत्नी ) की इच्छा
करनेवाला पति तथा पति की कामना करने वाली भार्या, दोनो
ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करे और दोनो श्रेष्ठ समान गुण कर्म स्व-
भाव वाले हो ऐसी जो सूर्य की किरणवत सौन्दर्य गुण युक्त
पति के लिये मन से गुणकीर्तन करने वाली पत्नी है उसको पुरुष
और इसी प्रकार के पुरुष को स्त्री सकल जगत का उत्पन्न करने
वाला परमात्मा देता है अर्थात् बड़े भाग्य से दोनो स्त्री पुरुष
का, जोकि बराबर गुण कर्म स्वभाव वाला हो, जोड़ा मिलता है ।
परमात्मा कहता है.—
इहैव स्तं मा वियौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् ।
क्रीडन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वस्तकौ ॥
अर्थात्-हे स्त्री और पुरुष ! मै परमेश्वर आज्ञा देता
४२ भूमिका
ऋतुगामी होके वीर्य का अधिक शासन करके सम्पूर्ण
आयु जो १०० सौ वर्ष से कम नहीं है उसको प्राप्त होओ। पूर्वोक्त
धर्म रीति से पुत्रो और नातियों के साथ क्रीड़ा करते हुये उत्तम
गृहवाले आनन्दित होकर गृहस्थाश्रम मे प्रीति पूर्वक वास करो।
यजुर्वेद अध्याय ४० मंत्र २ मे ईश्वर की आज्ञा है:-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
अर्थात्—मैं परमात्मा सब मनुष्यो के लिये आज्ञा देता हूं कि
प्रत्येक मनुष्य इस ससार मे शरीर से समर्थ होके सत्कर्मो को
करता ही करता १०० एक सौ वर्ष पर्यन्त जीने की इच्छा करे ।
आलसी और प्रमादी कभी न होवे । इस प्रकार उत्तम कर्म करते
हुये तुम (मनुष्य) मे इस हेतु से उलटा पन रूप दुःखद् कर्म लिप्य-
मान कभी नही होगा और तुम पापरूप कर्म मे लिप्त कभी मत
होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख नही होता इसलिये तुम
स्त्री पुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मो से अपनी और दूसरो
की सदा उन्नति किया करो ।
इन वेद मंत्रो से स्पष्ट है कि यदि मनुष्य नियम पूर्वक रहे
अच्छे कर्म करता हुआ रहे तो एक सौ वर्ष से कम आयु न हो
बल्कि इससे भी अधिक हो सकती है ।
प्राय. लोग कहा करते हैं कि कलियुग मे मनुष्य की अवस्था
एक सौ वर्ष की होती है। इसी वेद मन्त्र के अनुसार नियम
पर चलने वाले, अपनी आरोग्यता का ध्यान रखने वाले प्रायः
वेद शास्त्रों की आज्ञा ४३
अब भी एक सौ वर्ष से अधिक की आयुवाले देखने मे आते हैं।
एक सौ वर्ष के लगभग आयु वाले तो अनेको देखे जाते हैं और
उनकी सन्तान भी हृष्ट पुष्ट और आरोग्य देखी जाती है ।
वेद आयुर्वेद और धर्म्मशास्त्र सभी से यह बात साबित
होती है कि विवाह का लक्ष्य उत्तम सन्तान उत्पन्न कर दीर्घ-
जीवी हो मनुष्य जीवन का सच्चा आनन्द और सुख भोगना
है परन्तु अज्ञानता और भूल से विवाह होते ही पुरुष विषय-
वासना की तृप्ति की इच्छा से, आनन्द की इच्छा से सन्तान की
इच्छा से नहीं, स्त्री संभोग मे लिप्त होकर शक्तिहीन निर्बल दुर्बल
और अल्पायु होते हैं। इससे यह भी मालूम होता है कि पुरुषों ने
विवाह का लक्ष्य केवल विषय भोग ही समझ रक्खा है दाम्पत्य
प्रेम या सन्तान उत्पत्ति नही ।
भारत वर्ष मे इस समय अधिकांश मनुष्य प्रायः ऐसे हैं जो
स्त्री संभोग केवल विषयानन्द के लिये ही करते है। एक सन्तान
उत्पन्न होने के वाद तो विरले ही पुरुष दूसरी सन्तान की इच्छा से
स्त्री संभोग करते है । उनका संभोग केवल क्षणिक आनन्द का
कारण होता है। कितने ही पुरुष ऐसे देखे जाते हैं जिन को
अपनी स्त्री में गर्भ रह जाने से आन्तरिक कष्ट होता है क्योंकि
गर्भावस्था में उन्हे मजबूरन यदि पूरे नौमास के लिये नहीं तो
एकाध मास के लिये तो संभोग छोडना ही पड़ता है। परन्तु शास्त्रा-
नुकूल विवाह का यह सच्चा लक्ष्य नही है और न इससे मनुष्य
जीवन की सफलता ही है।
४४ भूमिका
दाम्पत्य प्रेम का अभाव
दाम्पत्य प्रेम का भी यही हाल है कि पुरुष ने स्त्री को केवल
विषय भोग के ही लिये समझ रक्खा है इसलिये जैसा चाहिये स्त्री
पुरुष को वैसे दाम्पत्य प्रेम का आनन्द नहीं मिलता । इसी कारण
सन्तान भी रोगी निर्बल दुर्बल और कम आयुवाली होती है ।
दाम्पत्य प्रेम के विषय मे भी यहां वेद और शास्त्रो का मत
बतलाया जाता है । वेद मे परमात्मा आज्ञा देता हैः—
देवा अग्रे न्यपद्यन्त पत्नीः,
समस्पृशन्त तन्वस्तनूभिः ॥
सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा,
प्रजावती पत्या संभवेह ॥
हे सौभाग्यवती स्त्री ! तू इस गृहाश्रम मे, प्रथम जैसे
विद्वान् लोग उत्तम स्त्रियों को प्राप्त होते है और शरीरों से शरीरो
को स्पर्श करते है वैसे विविध सुन्दर रूप को धारण करने वाली
सत्कार को प्राप्त होकर सूर्य की कान्ति के समान अपने स्वामी
के साथ मिलके उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाली हो ।
संपितरावृत्विये सृजेथां,
माता पिता च रेतसो भवाथः ।
दाम्पत्य प्रेम का अभाव ४५
मर्य इव योषमधिरोहयैनां,
प्रजां कृण्वाथामिह पुष्यतं रयिम् ॥
अर्थात्—हे स्त्री पुरुषो ! तुम बालकों के उत्पन्न करने वाले ऋतु
समय में सन्तानो को अच्छे प्रकार उत्पन्न करो। माता और पिता
दोनो वीर्य को मिलाकर गर्भाधान करने वाले हों। हे पुरुष !
इस अपनी स्त्री को प्राप्त होने वाले पति के समान सन्तानो मे
बढ़ो और दोनों इस गृहाश्रम मे प्रेम पूर्वक मिलकर सन्तान को
उत्पन्न करो और पालन पोषण करो तथा पुरुषार्थ से धन को
प्राप्त करो।
तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व,
यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति ।
या न ऊरू उशती विश्रयाति,
यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेपः ॥
अर्थात्—हे वृद्धिकारक पुरुष ! जिसमे मनुष्य लोग वीर्य को
बोते हैं। जो हमारी कामना करती हुई ऊरु को विशेष सुन्दरता से
आश्रित करती है। जिसमे सन्तानो की कामना करते हुए हम
उपस्थेन्द्रिय का प्रहरण करते हैं उस अतिशय कल्याण करने
हारी स्त्री को सन्तान उत्पत्ति के लिये प्रेम से प्रेरणा कर।
हे स्त्री और पुरुष ! जैसे सूर्य सुन्दर प्रकाशयुक्त प्रभात वेला
मे प्राप्त होता है वैसे ही सुख से घरके मध्य मे सन्तान उत्पत्ति
४६ भूमिका
की क्रिया को अच्छे प्रकार जानने वाले, सदा हास्य और आनन्द
युक्त बड़े प्रेम से अत्यन्त प्रसन्न हुए उत्तम चाल चलनवाले, धर्मयुक्त
व्यवहार में अच्छे प्रकार चलने वाले, उत्तम पुत्र वाले, श्रेष्ठ
गृहादि सामग्री युक्त उत्तम प्रकार जीवों को धारण करते हुए गृह-
स्थाश्रम के व्यवहारों को पूर्ण करो।
इहेमाविन्द्र संनुद चक्रवाकेव दम्पती ।
प्रजयै नौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्यश्नुताम् ॥
अर्थात्—हे इन्द्र ! परमैश्वर्य युक्तविद्वान् ! आप संसार मे इन
स्त्री पुरुषो को समय पर विवाह करने की आज्ञा दीजिये और ऐसी
व्यवस्था दीजिये कि जिससे ब्रह्मचर्य पूर्वक शिक्षा को पाकर दम्पति
(पति और पत्नी) चकवा चकवी के समान एक दूसरे से प्रेमवृद्ध
रहें अर्थात् प्रेम मे वधे रहे (एक दूसरे के विरुद्ध आचरण न करे)
और गर्भाधान विधि से उत्पन्न हुई सन्तान से ये दोनों सुखी
होकर सम्पूर्ण १०० वर्ष पर्यन्त आयु को पावे।
प्रबुध्यस्व सुबुधाबुध्यमाना,
दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ।
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो,
दीर्घ त आयुः सविता कृणोतु ॥
हे पत्नी ! तू (शतशारदाय) सौ वर्ष पर्यन्त दीर्घ काल जीने
के लिये उत्तम बुद्धि युक्त संज्ञान हो मेरे घर को प्राप्त हो और
दाम्पत्य प्रेम का अभाव ४७
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मुझ घर के स्वामी की स्त्री, जैसे तेरा दीर्घकाल पर्यन्त जीवन हो। वैसे
ही उत्तम ज्ञान और उत्तम व्यवहार को यथावत जान, अपनी
आशा को सब जगत् की उत्पत्ति और सम्पूर्ण ऐश्वर्य का देनेवाला
परमात्मा कृपा से सदा सिद्ध करे जिससे तू और मै सदा उन्नतिशील
होकर आनन्द में रहें।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।
अन्यो अन्यमभिहर्यतवत्सं जातमिवाघ्न्या ॥
ईश्वर आज्ञा देता है—
हे गृहस्थो ! मै ईश्वर तुमको जैसी आज्ञा देता हूँ वैसा
ही करो जिससे तुमको अक्षय सुख हो अर्थात् जैसी अपने
लिये सुख की इच्छा करते और दुःख नहीं चाहते हो वैसे ही
पिता माता सन्तान स्त्री पुरुष दास मित्र पड़ोसी और अन्य सबसे
समान हृदय से रहो। मनसे सम्यक प्रसन्नता और वैर विरोधादि
रहित व्यवहार को तुम्हारे लिये स्थिर करता हूं।
जैसे उत्पन्न हुये बछड़े पर गाय प्रेम से वर्त्तती है वात्सल्य-
भाव रखती है तुम भी एक दूसरे से प्रेम पूर्वक कामना से वैसा
ही वर्त्ताव करो।
सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैवच।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
हे गृहस्थो ! जिस कुल मे पत्नी से पति और पति से पत्नी
४८ भूमिका
सदा प्रसन्न रहते हैं उसी कुल मे निश्चित कल्याण होता है और
जिसमे दोनो परस्पर अप्रसन्न रहते हैं उस कुल मे नित्य कलह
वास करता है जैसा कि आजकल प्राय पति पत्नी मे कलह
रहा करती है।
यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत् ।
अप्रमोदात् पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्त्तते ॥
यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रक्खे या पुरुष को प्रसन्न न करे
तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर मे कामोत्पत्ति भली भांति न
हो के सन्तान नही होती और यदि होवे तो दुष्ट होती है ।
इसी प्रकार गर्भाधान क्रिया के समय पुरुष स्त्री को प्रसन्न
न करे तो स्त्री को उत्तेजना नही होती इसलिये गर्भ रहता ही
नही है ।
स्त्रियान्तु रोचमानायां सर्वतद्रोचते कुलम् ।
तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ मनु०
जो पुरुष स्त्री को प्रसन्न नही करता उस स्त्री के अप्रसन्न
रहने से सब कुल भर अप्रसन्न और शोकातुर रहता है और जब
पुरुष से स्त्री प्रसन्न रहती है तब सब कुल आनन्द रूप प्रसन्न
दिखलाई देता है ।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाक्रियाः ॥
वेद शास्त्रों की आज्ञा ४६
जिस घर मे नारियों की पूजा अर्थात् सत्कार होता है उस
कुल मे दिव्य गुण, दिव्य भोग और उत्तम सन्तान उत्पन्न होती
है और जिस कुल मे स्त्रियों की पूजा अर्थात् आदर सत्कार नहीं
होता उस कुल की सब क्रियाएं निष्फल होती है।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशुतत्कुलम् ।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्द्धते तद्धिसर्वदा ॥
जिस कुल मे स्त्रियां अपने अपने पुरुषो के दुष्टाचरणों से वा
व्यभिचारादि दोषो से शोकातुर रहती है वह कुल शीघ्रही नाश
को प्राप्त होजाता है और जिस कुल मे स्त्रीजन पुरुषो के उत्तमा-
चरणों से प्रसन्न रहती हैं वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है।
यदि पुरुष श्रेष्ठ हो तो दुष्टा स्त्रियां भी सभल जाती हैं। शास्त्र
बतलाता है, ऋषियों का कहना है।
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्ट प्रसूतयः ।
उत्कर्ष योषितः प्राप्ताः स्वैःस्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥
अर्थात्-इस संसार में दुष्टाचरण युक्त बहुत स्त्रियां अपने
अपने पतियों के शुभ गुणों से सुधर गई और सुधर जाती हैं तथा
सुधर जायंगी इसलिये यदि पुरुष श्रेष्ठ हो तो स्त्रियां श्रेष्ठ और पुरुष
दुष्ट हों तो स्त्रियां दुष्ट होजाती हैं। इससे प्रथम पुरुषो को उत्तम
होकर स्त्रियों को उत्तम बनाना चाहिये ।
४
५० भूमिका
प्रजनार्थं महाभागा पूजार्हा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥
हे पुरुषो ! संतानोत्पत्ति के लिये महा भाग्योदय करने वाली
पूजा के योग्य गृहस्थाश्रम को प्रकाश मय करती हुई सतानोत्पत्ति
करने कराने वाली घरों मे स्त्रियां ही हैं। वे श्री अर्थात् लक्ष्मी स्वरूप
होती हैं । लक्ष्मी और स्त्रियों मे कुछ भी भेद नहीं है । क्योंकि
दोनो से ही घर की समान शोभा है ।
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्ग पितॄणामात्मनश्चहि ॥
इसका अर्थ यह है कि संतानोत्पत्ति, धर्म कार्य, उत्तम सेवा
और रति सुख आदि तथा अपना और पितरो का जितना सुख
है वह सब स्त्री ही के आधीन होता है ।
इसलिये अपनी शुभ कामना चाहने वाले तथा आरोग्य
दीर्घजीवी होकर उत्तम संतति की इच्छा रखने वाले और मनुष्य
जीवन का आनन्द तथा सुख चाहने वाले पुरुषो को हर प्रकार
से स्त्रियों को प्रेम पूर्वक रखकर प्रसन्न रखना चाहिये। केवल उन्हे
विषय भोग की सामिग्री समझ कर रतिक्रिया की ही मशीन न
समझनी चाहिये । अपनी आरोग्यता तथा स्त्री की आरोग्यता के
लिये, दोनो के दीर्घजीवन के लिये नियम पूर्वक रतिक्रिया कर
उत्तम संतान उत्पन्न करनी चाहिये । तभी जीवन का सच्चा सुख
और आनन्द प्राप्त होता है ।