विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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ऋतुगामी होके वीर्य का अधिक शासन करके सम्पूर्ण
आयु जो १०० सौ वर्ष से कम नहीं है उसको प्राप्त होओ। पूर्वोक्त
धर्म रीति से पुत्रो और नातियों के साथ क्रीड़ा करते हुये उत्तम
गृहवाले आनन्दित होकर गृहस्थाश्रम मे प्रीति पूर्वक वास करो।
यजुर्वेद अध्याय ४० मंत्र २ मे ईश्वर की आज्ञा है:-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥
अर्थात्—मैं परमात्मा सब मनुष्यो के लिये आज्ञा देता हूं कि
प्रत्येक मनुष्य इस ससार मे शरीर से समर्थ होके सत्कर्मो को
करता ही करता १०० एक सौ वर्ष पर्यन्त जीने की इच्छा करे ।
आलसी और प्रमादी कभी न होवे । इस प्रकार उत्तम कर्म करते
हुये तुम (मनुष्य) मे इस हेतु से उलटा पन रूप दुःखद् कर्म लिप्य-
मान कभी नही होगा और तुम पापरूप कर्म मे लिप्त कभी मत
होओ। इस उत्तम कर्म से कुछ भी दुःख नही होता इसलिये तुम
स्त्री पुरुष सदा पुरुषार्थी होकर उत्तम कर्मो से अपनी और दूसरो
की सदा उन्नति किया करो ।
इन वेद मंत्रो से स्पष्ट है कि यदि मनुष्य नियम पूर्वक रहे
अच्छे कर्म करता हुआ रहे तो एक सौ वर्ष से कम आयु न हो
बल्कि इससे भी अधिक हो सकती है ।
प्राय. लोग कहा करते हैं कि कलियुग मे मनुष्य की अवस्था
एक सौ वर्ष की होती है। इसी वेद मन्त्र के अनुसार नियम
पर चलने वाले, अपनी आरोग्यता का ध्यान रखने वाले प्रायः