विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेद शास्त्रों की आज्ञा ३६
मम वाचमेकमना जुषस्व ।
प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम् ॥
अर्थात् पति पत्नी से कहता है—हे वधू ! तेरे अन्तःकरण
और आत्मा को मैं अपने कर्म के अनुकूल धारण करता हूँ, मेरे चित्त
के अनुकूल तेरा चित्त सदा रहे। मेरी वाणी को तू एकाग्र चित्त
से सेवन किया कर। प्रजा का पालन करने वाला परमात्मा तुझको
मेरे लिये नियुक्त करे ।
इसी प्रकार पत्नी कहती है—हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपका
हृदय और आत्मा अपने प्रियाचरण कर्म के अनुकूल धारण
करती हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका चित्त सदा रहे । आप
एकाग्र चित्त होकर मेरी वाणी का, जो कुछ मै आपसे कहूँ
उसका सेवन सदा किया करे क्योकि आज से प्रजापति परमात्मा
ने आपको मेरे आधीन किया है जैसे मुझको आपके आधीन
किया है अर्थात् इस परमात्मा की बताई हुई प्रतिज्ञा के अनुसार
दोनो व्यवहार करे जिससे सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान
होके सब प्रकार के व्यभिचार अप्रियभाषणादि को छोड़कर
परस्पर प्रीतियुक्त रहे ।
वेद में परमात्मा की इस आज्ञानुसार प्राचीन समय मे
सभी भारतवासी चलते रहे हैं तभी आरोग्य और दीर्घजीवी होते
थे । सन्तान भी आरोग्य और दीर्घजीवी होती थी । जबसे इन
आज्ञाओं का उल्लंघन किया गया तब से दाम्पत्य प्रेम का अभाव