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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

४० भूमिका
हो गया और पति पत्नी दोनों रोगी हो रोगी और अल्पायु
सन्तान उत्पन्न करने लगे। वेद मे आज्ञा हैः—
ओं इमां त्वमिन्द्रमीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु ।
दशास्यां पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि ॥
ईश्वर पुरुष और स्त्री को आज्ञा देता है कि हे ( मीढ्व )
वीर्य संचय करने वाले परमऐश्वर्ययुक्त इस वधू के स्वामिन् ! तू
इस वधू को उत्तम पुत्र युक्त सुन्दर सौभाग्य भोगवाली कर । इस
वधू मे दश पुत्रों को उत्पन्न कर अधिक नहीं । और हे स्त्री !
तू भी अधिक कामना मत कर किन्तु दश पुत्र और ग्यारहवां
पति को प्राप्त होकर सन्तोष कर । यदि इससे आगे सन्तान की
इच्छा करोगे तो तुम्हारे दुष्ट अल्पायु निर्बुद्धि सन्तान होगी
और तुम भी अल्पायु और नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित हो
जाओगे इसलिये अधिक सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा न
करना इत्यादि ।
इससे तात्पर्य यही है कि सन्तान के ही लिये संभोग किया
जाना चाहिये और अधिक सन्तान उत्पन्न करने वाले माता
पिता और सन्तान दोनों निर्बल दुर्बल और रोगी कम आयु
वाले होंगे । इस नियम के अनुसार स्त्री पुरुष तथा सन्तान की
भी आयु सौ वर्ष से कम न होगी । इसके विषय में भी वेद में
परमात्मा की आज्ञा है ।
आरोग्यता और दीर्घ जीवन ( १०० वर्ष आयु ) प्राप्त कर,