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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

वेद शास्त्रों की आज्ञा ३५
हे प्रिये । ऐश्वर्य युक्त मैं तेरे हाथ को ग्रहण करता हूं तथा
धर्म्म युक्त मार्ग में प्रेरक मै, तेरे हाथ को ग्रहण कर चुका हूं । तू
धर्म से मेरी पत्नी भार्या है और मैं धर्म्म से तेरा गृहपति हूं । हम
तुम दोनों मिलकर घरके कामो की सिद्धि करे और जो दोनो का
अप्रियाचरण व्यभिचार है उसको कभी न करें जिससे घरके
सब काम सिद्ध हों, उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की सदा वृद्धि
होती रहे ।
ममेयमस्तु पोष्यामह्यं त्वादाद् बृहस्पतिः ।
मया पत्या प्रजावति शं जीव शरदः शतम् ॥
हे अनघे ! सब जगत् के पालन करने वाले परमात्मा ने जिस
तुमको मुझे दिया है वही तू जगत भर में मेरी पोषण करने योग्य
पत्नी हो । तू मुझ पति के साथ सौ शरद ऋतु अर्थात् सौ वर्ष
पर्यन्त सुख पूर्वक जीवन धारण कर ।
इसी प्रकार वधू भी वर से प्रतिज्ञा कराती है ।
हे भद्र वीर ! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए ।
मेरे लिये आपके विना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी
पालन करने वाला और सेव्य इष्टदेव कोई नहीं है, न मैं आपसे
अन्य दूसरे किसी को मानूंगी । जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी
किसी स्त्री से प्रीति न करेंगे वैसे मै भी किसी दूसरे पुरुष के साथ
(कुटिल ) प्रीति भाव से बर्त्ताव न करूंगी । आप मेरे साथ सौ
वर्ष पर्यन्त आनन्द से जीवन व्यतीत कीजिये ।