विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेद शास्त्रों की आज्ञा ३७
और मनोरञ्जन दोनों श्रेष्ठ, न्यायकारी यती प्रजा का पालन
करने वाला राजा, सभ्य मनुष्य, सर्वेश्वर परमात्मा और चन्द्रमा
तथा सोमलतादि औषधि गण सब प्रजा की वृद्धि और पालन
करते हैं वैसे ही इस मेरी स्त्री को तुम भी बढ़ाया करो। जैसे मैं इस
स्त्री को प्रजा आदि अर्थात् सन्तान से सदा बढ़ाया करूंगा। इसी
प्रकार स्त्री भी प्रतिज्ञा करती है कि मैं भी अपने पति को सदा
आनन्द ऐश्वर्य और सन्तान से बढ़ाया करूंगी। जैसे ये दोनों
मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं वैसे हम दोनों मिलके गृहस्था-
श्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें।
अहं विष्यामि मयि रूपमस्या,
वेददित्पश्यन्मनसा कुलायम् ।
न स्तेयमद्म्यभि मनसोदमुच्ये.
स्वयं श्रन्थानो वरुणस्य पाशान् ॥
हे कल्याणी ! जैसे मनसे कुलकी वृद्धि को देखता हुआ मैं
इस तेरे रूप को प्रीति से प्राप्त और उसमें प्रेम द्वारा व्याप्त होता हूं
वैसे ही तू मेरी पत्नी मुझ में प्रेम से व्याप्त होकर अनुकूल
व्यवहार को प्राप्त हो। जैसे मैं मन से भी तुझ भार्या के साथ
चोरी को छोड़ देता हूं अर्थात् तुझसे छिपाकर और तेरी इच्छा
के विरुद्ध किसी उत्तम पदार्थ का चोरी से भोग न करूंगा,
कोई कार्य न करूंगा। मैं पुरुषार्थ से शिथिल होकर भी उत्कृष्ट
व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुषो के बन्धनों को दूर करता