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सर्वकोश
विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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३४ भूमिका

वेद शास्त्रों की आज्ञा
ओं गृभ्णामि ते सौभगत्वाय,
हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं,
त्वादुर्गाहपत्याय देवाः ॥
अर्थात् विवाह के समय वर दुलहिन से कहता है—हे वरानने !
जैसे मैं ऐश्वर्य सुसन्तानादि सौभाग्य की बढ़ती के लिये तेरे हाथ
को ग्रहण करता हू वैसे तू मुझ पति के साथ जरा अवस्था
( वृद्धावस्था ) को सुख पूर्वक प्राप्त हो। पत्नी कहती है—हे वीर ! मैं
वृद्धि के लिये आपका हाथ ग्रहण करती हूं, आप मुझ पत्नी के
सौभाग्य के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये ।
आपको मै और मुझको आप आज से पति पत्नी भाव करके
प्राप्त हुए हैं। पति कहता है, सकल ऐश्वर्य युक्त न्यायकारी सब
जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता, बहुत प्रकार के जगत् का धर्त्ता
परमात्मा और ये सब सभा मण्डप में बैठे हुए विद्वान लोग
गृहस्थाश्रम कर्म के अनुष्ठान के लिये तुमको मुझे देते हैं। आज
से मैं तुम्हारे हाथ और तुम मेरे हाथ बिक चुके। अब कभी एक
दूसरे के प्रति अप्रियाचरण न करेंगे।
ओं भगस्ते हस्तमग्रभीत् सविता हस्तमग्रभीत् ।
पत्नी त्वमसि धर्मणाहं गृहपतिस्तव ॥