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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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के अंग के रूप में वीक्षण (अभिवीक्षण) परिगणित है। उसी को १ऊह भी कहा गया है और
उसका प्रयोजन भी बताया गया है। बौद्ध पालि-वाङ्मय तथा तन्त्रों में वर्णित अनुस्मृति और
अभिवीक्षण में पर्याप्त समानता है। वृत्तिकार नारायण कण्ठ ने यहाँ ऊह की पुष्टि में
स्वायम्भुवागम को भी उद्धृत किया है। भगवद्गीता (१५।१५) के भाष्य में रामानुजाचार्य
ने २अपोहन शब्द को ऊह का पर्यायवाची भी माना है और इसकी परिभाषा यह की है—
ऊह का कार्य यह देखना है कि किसी भी प्रमाण की प्रवृत्ति सही ढंग से हो रही है या नहीं ?
प्रमाण-प्रवर्तक सामग्री की परीक्षा करना भी इसी का कार्य है। इस तरह से ऊह प्रमाणों का
अनुग्राहक ज्ञान है। स्पष्ट है कि आगम और तन्त्रशास्त्र में ही नहीं, पूरे भारतीय वाङ्मय
में तर्क या ऊह की प्राचीन काल से प्रतिष्ठा चली आ रही है। विज्ञानभैरव में ‘सम्बन्धे
सावधानता’ (श्लोक १०४) कह कर इस स्थिति की ओर इंगित किया गया है। योगवासिष्ठ
(नि० पू० ४३।८) में भी यह स्थिति चर्चित है।
अतः हम विज्ञानभैरव की अनुपाय प्रक्रिया (सहज समाधि) से पूर्णतः प्रभावित ग्रन्थ
योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में कुछ कहना चाहते हैं।
योगवासिष्ठ
भारतीय वाङ्मय में योगवासिष्ठ का विशिष्ट स्थान है। इस ग्रन्थ पर डॉ० भीखन-
लाल आत्रेय ने प्रशंसनीय परिश्रम किया है। उसका कहना है कि ई० सप्तम शताब्दी के
आरम्भ से पूर्व योगवासिष्ठ अवश्य ही वर्तमान रहा होगा। डॉ० एस० एन० दास-गुप्त ने
भी अपने भारतीय दर्शन के इतिहास के द्वितीय खण्ड में योगवासिष्ठ के सम्बन्ध में अपने
विचार प्रकट किये हैं। उनका लिखना है कि योगवासिष्ठ के लेखक सम्भवतः गौडपाद अथवा
शंकर के समकालीन, सम्भवतः ८०० ई० के आस-पास अथवा उनके एक शतक पूर्व विद्यमान
थे। प्रायः सभी आधुनिक और प्राचीन विद्वानों ने योगवासिष्ठ को वेदान्त का ग्रन्थ माना
है। डॉ० दासगुप्त इस पर बौद्ध विज्ञानवाद का प्रभाव तो मानते हैं, किन्तु शैव दर्शन की
स्पन्द या प्रत्यभिज्ञा शाखा से इसके सम्बन्ध की कोई चर्चा नहीं करते। प्राण के प्रसंग में
शिवसूत्रविमर्शिनी और विज्ञानभैरवविवृति को अवश्य उन्होंने उद्धृत किया है।
योगवासिष्ठ का दूसरा नाम मोक्षोपाय है। विज्ञानभैरव के समान ही योगवासिष्ठ में
भी बन्ध और मोक्ष की परमार्थ सत्ता नहीं मानी गई है। वस्तुतः इस ग्रन्थ पर मालिनीविजय
(जो कि अभिनवगुप्त के अनुसार त्रिक या प्रत्यभिज्ञा दर्शन का आधार ग्रन्थ है), विज्ञानभैरव,
स्पन्दकारिका प्रभृति ग्रन्थों का स्पष्ट प्रभाव है। स्पन्दकारिका के प्रथम श्लोक की प्रथम पंक्ति
१. ऊहोऽभिवीक्षणं वस्तुविकल्पानन्तरोदितः ॥८॥
यदा वेत्ति पदं हेयमुपादेयं च तत्स्थितः ।
तत्पोषकं विपक्षं च यच्च तत्पोषकं वरम् ॥९॥
२. अपोहनम् ऊहनं वा। ऊहनमूहः। ऊहो नामेदं प्रमाणमित्थं प्रवर्तितुमर्हतीति प्रमाण-
प्रवृत्त्यर्हताविषयं सामग्र्यादिनिरूपणजन्यं प्रमाणानुग्राहकं ज्ञानम्।

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( ३६ )
की इस ग्रन्थ में अनेक बार आवृत्ति हुई है । इस ग्रन्थ के उपशम१ प्रकरण पर विज्ञानभैरव का
सर्वाधिक प्रभाव है। स्पन्द, समता, पौरुष प्रयत्न (ज्ञान या शक्ति), बन्ध-मोक्ष, प्रबुद्ध, संप्रबुद्ध,
अप्रतिबुद्ध, कलङ्काङ्क, सत्तासामान्य, उच्छून, चिदग्नि, महासत्ता, चिदर्क, भरितात्मता, शक्ति-
पात, ब्रह्मसत्ता, जीवन्मुक्ति, पुर्यष्टक प्रभृति शब्दों की व्याख्या पूरी तरह से उक्त शास्त्रों की
परिभाषाओं का ही अनुसरण करती है । इस तरह से इस पूरे ग्रन्थ का विनियोग २अनुपाय
प्रक्रिया (सहज योग) के प्रतिपादन में ही है । तन्त्रशास्त्र में३ शास्त्र, गुरु और स्वयं अपनी
प्रतिभा से ज्ञान की प्राप्ति की बात कही गई है । किन्तु योगवासिष्ठ का कहना है कि ४शास्त्र
या गुरु के वचन से आत्मा का बोध (ज्ञान) नहीं होता, इसका ज्ञान तो स्वयं अपने बोध से ही
होता है । इस तरह से सत्तर्क को ही यहाँ सर्वोपरि स्थान दिया गया है ।
योगवासिष्ठ के विषय में एक बात और ध्यान देने योग्य है । अभिनन्द पण्डित ने अपने
लघुयोगवासिष्ठ में निर्वाण प्रकरण के पूर्वार्ध पर्यन्त ग्रन्थ का ही संक्षेप प्रस्तुत किया है । मूल
ग्रन्थ में भी पूर्वार्ध प्रकरण के अन्त में ग्रन्थ समाप्ति के सभी चिह्न उपलब्ध हैं । अतः ऐसा
प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ में निर्वाण प्रकरण का उत्तरार्ध बाद में जोड़ा गया है ।
विज्ञानभैरव का मुख्य तात्पर्य
हमने बताया है कि विज्ञानभैरव में पूर्ववर्ती सभी तान्त्रिक योगविधियों का संग्रह किया
गया है, किन्तु अन्ततः इसका विनियोग अनुपाय प्रक्रिया (सहज समाधि) के प्रतिपादन में है ।
१. “न बहिर्नान्तरे नाधो नोर्ध्वमर्थे न शून्यके” (५।५।१६), “सावस्था भरिताकारा” (६।४।४७),
“न सक्तमिह चेष्टासु न चिन्तासु न वस्तुषु । नाकाशे नाप्यधो नोर्ध्वं न दिक्षु वित-
तासु च ॥ न बहिर्विपुलाभागे न चैवेन्द्रियवृत्तिषु । नाभ्यन्तरे न च प्राणे न मूर्धनि न
तालुनि ॥ न भ्रूमध्ये न नासान्ते न मुखे न च तारके । नान्धकारे न चाभासे न चास्मिन्
हृदयान्तरे ॥ न जाग्रति न च स्वप्ने न सुप्ते न च निर्मले । नासिते न च वा पीतरक्तादौ
शबले न च ॥ न चले न स्थिरे नादौ न मध्ये नेतरत्र च । न दूरे नान्तिके नाग्ने न पदार्थे
न चात्मनि ॥ न शब्दस्पर्शरूपेषु न मोहमदवृत्तिषु । न गमागमचेष्टासु न कालकलनासु
च ॥” (६।९।२-७) । इन वचनों में से द्वितीय विज्ञानभैरव के १५ वें श्लोक का तृतीय
चरण है। इसकी यहाँ अनेक स्थलों पर आवृत्ति हुई है । अन्य दो उद्धरणों में विज्ञानभैरव
में वर्णित अनेक धारणाओं का उल्लेख है ।
२. “वर्णधर्माश्रमाचारशास्त्रयन्त्रणयोज्झितः । निर्गच्छति गतज्जालात् पञ्जरादिव केसरी ॥”
(नि० पू० १२२।२), “तनुं त्यजतु वा तीर्थे श्वपचस्य गृहेऽथवा” (नि० पू० १२२।११)
इत्यादि वचनों में सिद्धों की सहज प्रक्रिया के स्पष्ट दर्शन होते हैं ।
३. “त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानम्”, “गुरुतः शास्त्रतः स्वतः” इत्यादि वचन ग्रन्थ की पृ० २ की
३री टिप्पणी में उद्धृत हैं ।
४. शास्त्राथैर्बुध्यते नात्मा गुरोर्वचनतो न च ।
बुध्यते स्वयमेवैष स्वबोधवशतः स्वतः ॥ (नि० पू० ४१।१५)

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उपक्रम, उपसंहार आदि षड्विध लिंग से ग्रन्थ के तात्पर्य का निर्णय किया जाता है। इस
ग्रन्थ के उपक्रम में "एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति" ऐसा कह कर इस सहज
समाधि की ओर इंगित किया गया है और बाद की ११२ धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक
श्लोक के चतुर्थ चरण में इसी सर्वात्मक स्थिति को प्रकाशित किया गया है। अन्त में पूजा,
जप आदि की आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इस ग्रन्थ का उपसंहार सहज समाधि
स्थिति की स्थापना में ही किया गया है। इस प्रकार योगवासिष्ठ के समान यह ग्रन्थ भी
मुख्यतः अनुपाय प्रक्रिया या सहज योग का प्रतिपादक है। सहज समाधि या अनुपाय प्रक्रिया
का संक्षिप्ततम अर्थ यह है कि मन की स्वाभाविक प्रवृत्तियों पर बिना जोर-जबरदस्ती के सहज
रूप में नियन्त्रण स्थापित कर स्वरूप-साक्षात्कार का प्रयत्न किया जाय। रागात्मिका वृत्ति
का परिष्कार इसका उद्देश्य था। यह दुःख की बात है कि इस उत्कृष्ट प्रक्रिया की भी परि-
णति उच्छृंखलता में हो गयी थी।

योगशास्त्र का भविष्य

तन्त्रशास्त्र और योगशास्त्र की आजकल पूरे विश्व में बड़ी चर्चा है। किन्तु इससे
आने वाले खतरे की ओर हमें अभी से सावधान हो जाना चाहिये। ब्रह्मचारी योगियों और
तान्त्रिकों की पहुँच देश के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों तक है। इसको उलट कर भी कह सकते हैं कि
ये राजनीतिज्ञ इनको बड़ी श्रद्धा और आदर की दृष्टि से देखते हैं। विदेशों में भारतीय योग-
शास्त्र का डंका बजाने वाले योगियों की भी कोई कमी नहीं है। यह बात सही है कि तन्त्र-
शास्त्र ने और उससे अनुप्राणित योगशास्त्र ने वर्ण, लिंग, जाति, संप्रदाय, देश आदि की सीमा
को लांघकर मानव मात्र को इसका अधिकारी बताया है, किन्तु ऐसा करते समय उसमें कुछ
दोष भी आ गये हैं। प्राचीन भारत में गृहस्थ ऋषि को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी, किन्तु
बाद में स्थिति बदल गई। गृहस्थ ऋषि का स्थान भिक्षु, मुनि और संन्यासी ने ले लिया। ऋषि
गृहस्थ रहते हुए भी सभी एषणाओं से मुक्त था, किन्तु भिक्षुओं, मुनियों और संन्यासियों के
इर्द-गिर्द मठों और मन्दिरों के रूप में सभी एषणाओं का एक रहस्यात्मक ताना-बाना बुने जाने
लगा और इसी पृष्ठभूमि में रहस्यात्मक शास्त्रों का भी आविर्भाव हो गया। उपनिषदों को
रहस्य शास्त्र कहा जाता था, किन्तु औपनिषदिक रहस्य एक अलौकिक तत्त्व था। तान्त्रिक
योगियों ने इस अलौकिक तत्त्व को तो सततर्क और स्वात्मप्रत्यभिज्ञा द्वारा रहस्य के आवरण से
मुक्त कर स्वात्मस्वरूप अथवा जीवन्मुक्त अवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया, लेकिन उसके
स्थान पर उन्होंने लौकिक जीवन को ही रहस्यों में ढक दिया। मनुष्य की रागात्मिका वृत्ति का
प्रशमन तान्त्रिक अवधारणाओं का एक लक्ष्य माना जा सकता है, किन्तु विगत सहस्राधिक
वर्षों से तन्त्रशास्त्र का रहस्यवाद महज अपनी कुंठाओं को छिपाने का एक बीभत्स प्रयास रहा
है। तन्त्रशास्त्र के रहस्यवाद को औपनिषदिक रहस्यवाद से भी ऊँचा दर्जा दिलाने का प्रयास
किया जाता रहा है और आज भी यह प्रयास रुका नहीं है।

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( ३८ )
इस अनोखे रहस्यवाद ने 'ब्रह्मचारी'१ शब्द का अर्थ ही बदल दिया । मारविजयी
बुद्ध और कामदेव को भस्म कर देने वाले योगिराज शिव के द्वारा प्रवर्तित धर्मों में काम के
इस अनोखे प्रवेश ने कृष्णभक्ति धारा में ही नहीं, रामभक्ति धारा में भी रसिक संप्रदाय को
जन्म दे दिया । मर्यादापुरुषोत्तम राम के लोकमंगलकारी स्वरूप की रक्षा का श्रेय गोस्वामी
तुलसीदास को दिया जाना चाहिये । अन्यथा राम का यह चरित्र भी उसी तरह से पीछे
ढकेल दिया गया होता, जैसा कि भगवान् श्रीकृष्ण का महाभारत और भगवद्गीता में वर्णित
स्वरूप हमारी आँखों से ओझल सा हो गया है । विश्व के उत्कृष्टतम ग्रन्थ महाभारत को
घर में रखना अथवा पढ़ना आज महान् अमंगलकारी कार्य मान लिया गया है और गीता का
अध्ययन गृहस्थ के लिये निषिद्ध है । इसके स्थान पर भागवत की, भागवत के दशम स्कन्ध
की और रासलीला की उत्तरोत्तर प्रतिष्ठा बढ़ गई है और रासलीला के रहस्य को औपनिष-
दिक रहस्यवाद से भी ऊँचा स्थान दिया गया है । हम कहाँ पहुँच गये हैं ।
स्वर्ग देखने के लोभ में नाक कटा लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है । आज हमें एक
जगह खड़े होकर देखना है कि आगे किस तरफ जाना है । किसी समय तान्त्रिक धर्म ने
भारतीय संस्कृति के विस्तार के लिये स्तुत्य प्रयास किया था, किन्तु आज हम उसकी
अच्छाइयों को भुला चुके हैं । समाज ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, के घेरे में बंटा हुआ है, सन्तों
की वाणी का, जिनका कि प्रेरणा-स्रोत मुख्यतः २तान्त्रिक वाङ्मय ही रहा है, समाज पर
केवल मौखिक प्रभाव है, अर्थात् उसका उपयोग केवल एक दूसरे को उपदेश देने तक सीमित
है । अपनी दैनिक दिनचर्या में उसको उतारने का प्रयास नहीं किया जाता । इसका भी एक
मौलिक कारण है। उपनिषद्, गीता या अन्य आध्यात्मिक ग्रन्थों के उत्कृष्ट उपदेशों का अधिकारी
सामान्य मनुष्य को नहीं माना जाता । उनके लिये इन उत्कृष्ट आध्यात्मिक मूल्यों का अनुसरण
कर पाना कठिन है, ऐसा मान कर नाना प्रकार के कर्मकाण्डों की सृष्टि कर दी गई है, जैसा
कि इस ग्रन्थ के १० वें श्लोक में बताया गया है। ऐहलौकिक जीवन की अपेक्षा पारलौकिक
जीवन पर ध्यान अधिक केन्द्रित कर दिया गया है । फलतः सामान्य मनुष्य निकृष्टतम जीवन
बिताते हुए भी कुछ कर्मकाण्डों का नियमित आचरण कर धार्मिक बन बैठता है । इस स्थिति
को दूर किया जाना चाहिये । विज्ञानभैरव जैसे ग्रन्थ इनमें सहायक हो सकते हैं ।
भारतीय दर्शनों में ऐहलौकिक अभ्युदय को हेय दृष्टि से देखा जाता है और पार-
लौकिक अभ्युदय को उपादेय । फलतः इनमें ऐहलौकिक अभ्युदय संबन्धी विचारों को बहुत
१. “ओष्ठचान्त्यत्रितयासेवी ब्रह्मचारी स उच्यते" (तन्त्रा० २९।९८) । ओष्ठचान्त्यत्रितया-
सेवी का तात्पर्य तीन मकारों के सेवन से है ।
२. डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने 'तन्त्र और सन्त' नामक ग्रन्थ में इस विषय पर अच्छा प्रकाश
डाला है, किन्तु 'तन्त्र' शब्द का प्रयोग उन्होंने सीमित अर्थ में किया है । वस्तुतः प्राचीन
शैव और वैष्णव आगम भी इसी श्रेणी में आते हैं और सन्तों की वाणी पर इन सबका
प्रभाव है ।

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( ३९ )
कम स्थान मिला है। भारतीय वाङ्मय की एक शाखा आगमशास्त्र या तन्त्रशास्त्र ने एक ही
जन्म में भोग और मोक्ष, अभ्युदय और निःश्रेयस को प्राप्त कराने की बात की है, किन्तु
इसमें भी व्यक्तिगत भावना ही प्रधान रही है। कहा जा सकता है कि भारतीय दर्शन और
आध्यात्मिकता में वैयक्तिक उन्नति का तो चूड़ान्त उत्कर्ष है, किन्तु साथ ही सामूहिक उन्नति
का पक्ष अत्यन्त दुर्बल है। इसी तरह से इसमें ऐहलौकिक दृष्टि की अपेक्षा पारलौकिक दृष्टि
का प्राबल्य हो गया है। साधारण भारतीय की यह दृढ़ धारणा है कि संसार अवनति की
ओर तेजी से बढ़ रहा है, इसको रोका नहीं जा सकता। कर्मवाद और भाग्यवाद उसको इसी
ओर ढकेलते हैं। उसका सारा पुरुषार्थ कलिकाल की अर्गला से अवरुद्ध है।
इसके विपरीत “स्वात्मैव देवता प्रोक्ता ललिता विश्वविग्रहा” सरीखे आगमिक एवं
तान्त्रिक दर्शन के प्रतिपादक वाक्यों के सहारे अपने में विश्वाहन्ता¹ का विकास कर अरविन्द
जैसे महायोगी इसी धरती पर दिव्य मानवता के अवतार की बात करते हैं और महामनीषी
श्रद्धेयचरण श्रीगोपीनाथ कविराज अखण्ड महायोग के माध्यम से इस स्थिति को लाना चाहते
है। पुरुषार्थ की महत्ता के प्रतिष्ठापक योगवासिष्ठ सरीखे और विश्वाहन्ता का उपदेश देने
वाले विरूपाक्षपंचाशिका, विज्ञानभैरव सरीखे योगशास्त्र के ग्रन्थ उनके इस कार्य में
सहायक हैं।
आधुनिक विश्व स्वत्व के संकोच के कारण दुःखी है। यह स्वत्व धर्म, राष्ट्र, राज्य,
भाषा, जाति, कुटुम्ब-कबीले आदि के नाना विभ्रमों में पड़ कर बँटा हुआ है। अखण्ड संस्कृति
के माध्यम से इन विभ्रमों को तोड़ पाने के उपरान्त ही अखण्ड स्वत्व का बोध हो सकता
है। सहिष्णुता और समन्वय भारतीय इतिहास की विशेषता रही है। यह प्रक्रिया अब भी
निरन्तर क्रियाशील है। त्याग और तपस्या के उच्च आदर्शों से अनुप्राणित साधु-सन्तों की
परम्परा परस्पर के स्थूल भेदों को मिटाने में निरन्तर सचेष्ट रही है। आधुनिक विश्व के
वर्तमान धर्मों और विभिन्न वादों के विरोधी दृष्टिकोणों में सहिष्णुतापूर्वक समन्वय स्थापित
कर अखण्ड संस्कृति के निर्माण का पथ प्रशस्त किया जा सकता है, जिससे कि विश्व-समष्टि
में इस अखण्ड संस्कृति के आविर्भाव से स्वत्व का संकोच दूर हो और “वसुधैव कुटुम्बकम्”
की उदात्त भावना का विकास हो। जहाँ प्रत्येक वस्तु के अभेद के प्रतिष्ठित होने पर भी
अपने स्वरूप के नष्ट होने का कोई प्रसंग नहीं है, वहाँ विश्व के किसी वाद, धर्म अथवा
संस्कृति के स्वत्व के लोप का भय क्यों उपस्थित होगा ?
अद्वैतवादी आगमिकों की मान्यता है कि नट अपने मन से राम-कृष्ण, रावण-कंस
प्रभृति की भूमिका में प्रविष्ट होकर नाना प्रकार के सुख-दुःखों की अनुभूति स्वयं तटस्थ
भाव से करता हुआ भी जैसे दर्शकों में साधारणीकरण प्रक्रिया के आधार पर सचमुच की सी
अनुभूति पैदा करा देता है, उसी तरह से ईश्वर भी तटस्थ भाव से लीला करता है। लीला
१. धारणा संख्या ६५ और ७९ के विवरण के प्रसंग में इस शब्द की व्याख्या की गई है।
९८,१०३, १०७-१०८ श्लोक में भी यही विषय प्रतिपादित है।

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( ४० )
करते-करते वह बौद्ध और पौरुष अज्ञान से आवृत हो जाता है और इस तरह से उसकी
शक्तियाँ और स्वरूप संकुचित हो जाते हैं । संकुचित प्रमाता के रूप में वह अपने स्वरूप को
भूल बैठता है। यह स्वरूप की विस्मृति ही इनके यहाँ बन्ध है और स्वरूप की स्मृति ही मोक्ष
कहलाती है । इस तरह से इनके मत में बन्ध और मोक्ष की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है ।
इनकी दृष्टि में यह सारा विश्व 'अहम्' का ही विलास है । चित्रकार कागज, कपड़ा या
दीवाल पर अपनी कल्पना का चित्र बनाता है। यह शिव ऐसा अनोखा चित्रकार है कि
बिना आधार के अपने आप में इस विश्व के उन्मीलन और निमीलन की लीला करता रहता
है । अपनी अहन्ता को वह परिमित प्रमाता के रूप में भौतिक शरीर तक सीमित कर देता
है और फिर वही पर प्रमाता के रूप में इस पूरे विश्व में विश्वाहन्ता के रूप में इसका विस्तार
कर लेता है । इस स्थिति में वह इस पूरे विश्व को अपना कुटुम्ब नहीं, किन्तु स्वयं अपना ही
स्वरूप मानता है ।
शक्तिसंगम तन्त्र में समताष्टक मार्ग का उल्लेख है । इसका परिचय हमने पृ० ७१
पर दिया है । सन्तों और भक्तों की परम्परा से और योगवासिष्ठ जैसे ग्रन्थों के माध्यम से
यह समता दृष्टि भारतीय जनमानस में सामान्य रूप से अपना स्थान बनाये हुए हैं। महात्मा
गाँधी में इसी दृष्टि का उन्मेष हुआ था । किन्तु आज इस समता दृष्टि के मूल स्रोत को
हमने भुला दिया है । आज का प्रबुद्ध भारतीय इस साम्यवाद की खोज में उस कस्तूरी मृग
की भाँति भटक रहा है, जिसको इसका ज्ञान नहीं है कि उस मनोमोहक गन्ध का स्वामी वह
स्वयं ही है। आज इस बात की आवश्यकता है कि जैसे तत्कालीन सभी धर्मों की उदात्त
भावनाओं में समन्वय स्थापित कर मानव मात्र के कल्याण के लिये तान्त्रिक धर्म की प्रतिष्ठा
की गई थी, उसी तरह से विश्व के सभी धर्मों की उदात्त भावनाओं में समरसता, समन्वय
स्थापित कर एक विश्व-धर्म और विश्व-संस्कृति की प्रतिष्ठा की जाय ।
भारतीय समाजवाद के प्रवर्तक आचार्य नरेन्द्रदेव ने भारतीय संस्कृति और समाज-
वाद में सुन्दर समन्वय स्थापित किया था। उनका१ कहना था कि संस्कृति २चित्तभूमि की
खेती है । व्यक्तियों के चित्त के साथ-साथ लोकचित्त के कार्यक्षेत्र का विस्तार आवश्यक है ।
लोकचित्त का राष्ट्रचित्त में और विश्वचित्त का विश्वसंस्कृति के रूप में विकास अभिप्रेत
है । जीवन और संस्कृति दोनों परिवर्तनशील हैं । कालप्रवाह से जीर्ण और अनुपयोगी
पुराने विचारों के परित्याग के साथ श्रैणिक नैतिकता के नाम पर सभी पुराने आदर्शों और
सिद्धान्तों का बहिष्कार तथा समाज के दीर्घकालीन अनुभव तथा संचित ज्ञान का अनादर
अनुचित होगा । हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी संस्कृति का सतर्क और वैज्ञानिक अध्ययन
१. प्रोफेसर श्रीमुकुटबिहारीलाल के ग्रन्थ “आचार्य नरेन्द्रदेव : युग और नेतृत्व" से साभार
संकलित ।
२. “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (१।२) इस योगसूत्र के अनुसार योगशास्त्र भी एक प्रकार से
चित्तभूमि की खेती ही है ।

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( ४१ )
प्रस्तुत करें, उसके जीवनपूर्ण तत्त्वों की रक्षा करें और आधुनिक विचारों से उनका सामंजस्य
स्थापित कर नव संस्कृति का निर्माण करें। आदान-प्रदान से ही संस्कृतियाँ संपुष्ट और
ऐश्वर्यमय हो सकती हैं।
भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा तत्त्व विभिन्न जीवन प्रणालियों में एकता और जीवन
के हर क्षेत्र में समन्वय स्थापित करना है। इसकी दूसरी विशेषता नैतिक व्यवस्था की
स्थापना तथा आचरण की शुद्धता है। अपना ध्यान रखते हुए दूसरे का भी ध्यान रखना
इसका मूल मन्त्र है—"आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्"। इसका तीसरा महत्त्वपूर्ण
तत्त्व विश्वभावना है। "आत्मोपम्येन सर्वत्र समं पश्यति", "वसुधैव कुटुम्बकम्" इसकी
शिक्षा है। भारतीय संस्कृति के दो पहलू रहे हैं। एक व्यक्तिवादी तो दूसरा समष्टिवादी,
अर्थात् विश्वजनीन । इन्हीं को हम व्यक्तिगत मानस और लोकमानस कह सकते हैं।
व्यष्टि और समष्टि में सामंजस्य युग की माँग है । मानव की उन्नति के लिये
व्यक्ति-स्वातन्त्र्य और समष्टि-भावना दोनों आवश्यक है। भारतीय विद्वानों द्वारा प्रतिपादित
समत्व, कर्मयोग, विश्वभावना, लोकहित तथा शील के विचारों का अर्वाचीन विद्वानों द्वारा
प्रतिपादित राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, लोकतन्त्र, समाजवाद और इतिहास की वैज्ञानिक
व्यवस्था से समयोग अपेक्षित है। इसके लिये अपने शास्त्रों के साथ अर्वाचीन विद्वानों के
लोकतन्त्र, देशबन्धुत्व, विश्वसहयोग तथा समताराज्य सम्बन्धी विचारों का भी विवेचनात्मक
अध्ययन होना चाहिये। अपनी संस्कृति के कालविपरीत तत्त्वों का परित्याग कर उसके
युगानुरूप कल्याणकारी तत्त्वों का संरक्षण और परिवर्धन करना और साथ ही अर्वाचीन
विचारों के हानिकारक सिद्धान्तों और परिपाटियों की यथोचित समीक्षा करते हुए उनके
लाभप्रद प्रगतिशील विचारों का परिग्रहण करना युग की माँग है।
जात्या च सदृशाः सर्वे कुलेन सदृशास्तथा ।
न चोद्योगेन बुद्ध्याऽथ रूपद्रव्येण वा पुनः ॥
महाभारत शान्तिपर्व में गणराज्य के प्रकरण में कही गई ये दोनों बातें अर्वाचीन
विद्वानों को स्वीकार हैं। वे प्रत्येक जाति, कुल और व्यक्ति की समानता को स्वीकार करते
हुए उद्योग और बुद्धि की क्षमता की विभिन्नता को स्वीकार करते हैं और चाहते हैं कि
क्षमता, कर्तव्यपरायणता और सद्व्यवहार ही जनविश्वास तथा पदों पर नियुक्तियों का
आधार हो । हमारे पूर्वजों ने कहा है कि ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है (नहि ज्ञानेन
सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।) और उसे सब किसी से ग्रहण किया जा सकता है।
हमारे पूर्वजों ने हमारे सामने "वसुधैव कुटुम्बकम्" का आदर्श प्रस्तुत किया है।
इस आदर्श को जीवन में आत्मसात् करना हमारा कर्तव्य है। यदि हम विभिन्न सम्प्रदायों,
प्रजातियों तथा जातियों में विभाजित मानव समाज में भ्रातृत्व का अनुभव कर सकते हैं,
तो कोई कारण नहीं कि हम सम्पूर्ण हिन्दू समाज तथा भारतीय समाज में बन्धुत्व और
आत्मीयता का अनुभव न करें। महात्मा गाँधी ने ठीक ही कहा है कि देशबन्धुत्व को आत्म-
सात् किये बिना विश्वबन्धुत्व की उपलब्धि असम्भव है। देशबन्धुत्व और समता पर आश्रित

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( ४२ )
राष्ट्रीयता ही भारतीय गणतन्त्र को संघबद्ध तथा सबल कर सकती है, विभिन्न जातियों,
उपजातियों और सम्प्रदायों से सम्बद्ध सज्जनों में सौजन्य की वृद्धि कर सकती है तथा
विश्वबन्धुत्व का मार्ग प्रशस्त कर सकती है ।
समता पर आधृत संस्कृति ही श्रेष्ठ मानी जा सकती है। तभी विश्वबन्धुत्व, मान-
वता और विश्वकल्याण की भावना को बढ़ावा मिल सकता है । निराग्रही समीक्षा तथा
सर्जनात्मक समन्वय द्वारा ही यह सम्भव है । विचार-वैचित्र्य से घबराने की कोई बात नहीं
है। विचार-स्वातन्त्र्य चिर काल से भारतीय संस्कृति का सद्गुण रहा है। भारतीय संस्कृति
के विकास में विचार-स्वातन्त्र्य और विचार-विमर्श का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है और इनके
द्वारा ही इस समय भी जड़ता और संकीर्णता का परित्याग तथा सर्जनात्मक चिन्तन हमारे
लिये सम्भव हो सकते हैं ।
राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, लोकतन्त्र और समाजवाद इस युग की मुख्य मान्यताएँ
हैं। इन्हें अपनाना, भारतीय संस्कृति में इनका समावेश करना नितान्त आवश्यक है । इस
तरह समाजवाद भारतीय संस्कृति के दीर्घकालीन, सर्वजनीन, सजीव मूल्यों तथा तथ्यों का
पाश्चात्य संस्कृति के सजीव, प्रगतिशील तत्त्वों तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों से समन्वय करता
है। आचार्य नरेन्द्रदेव के शब्दों में समाजवाद पर आस्था रखने वाले विचारक एक ऐसी नई
संस्कृति का निर्माण करना चाहते हैं, जिसका मूल प्राचीन सभ्यता में होगा, जिसका रूप-रंग
देशी होगा, जिसमें पुरातन सभ्यता के उत्कृष्ट अङ्ग सुरक्षित रहेंगे और साथ-साथ उसमें
ऐसे नवीन अंशों का भी समावेश होगा, जो आज जगत् में प्रगतिशील हैं और संसार के
सामने एक नवीन आदर्श उपस्थित करना चाहते हैं । तभी उस विश्व-संस्कृति का निर्माण
हो सकेगा, जिसमें कि सभो मनुष्य आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दासता से मुक्त हों,
सभी को मौलिक मानवाधिकार प्राप्त हों तथा सबको स्वतन्त्रता और सम्मान के साथ अपने
आर्थिक अभ्युदय और सांस्कृतिक उन्नति की सुविधा प्राप्त हो, जिसमें प्रत्येक राष्ट्र को
बराबर की जनतान्त्रिक आजादी हासिल हो, सब अन्तरराष्ट्रीय झगड़े शान्तिमय ढंग से
निपटाये जा सकें और सब राष्ट्र पारस्परिक सहयोग के जरिये मानव-कल्याण में वृद्धि करें।
यह खेद की बात है कि भारतीय समाजवादी आन्दोलन आचार्य नरेन्द्रदेव सरीखे
मानवतावादी मनीषी के उक्त विचारों का अनुवर्तन न कर सका। उनके कुछ अन्तरंग
साथियों ने ही उनका अन्तिम जीवन दूभर बना दिया था। उनके कुछ दूसरे साथियों ने
राजनीति से संन्यास ले लिया। किन्तु आचार्यजी अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक इन सब
विपरीत परिस्थितियों से जूझते रहे और अपने सिद्धान्तों के मूल्य पर कभी भी किसी के
सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। आज उनके कुछ अनुयायी तान्त्रिकों और बाबाओं की
देहली ढोकने लगे हैं और कुछ धम्म की शरण में चले गये हैं। महात्मा गाँधी और आचार्य
नरेन्द्रदेव के द्वारा स्थापित मूल्यों का अनुवर्तन न कर पाने के कारण ही भारतीय गणतन्त्र ने
दलतन्त्र का रूप ले लिया है। आज भारतीय राजनीतिज्ञों की देश की अपेक्षा अपने दल के

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( ४३ )
प्रति अधिक गहरी भक्ति है। दूसरी तरफ तान्त्रिक धर्म को रहस्यवादी मान्यताओं के कारण
धर्म और मोक्ष के क्षेत्र में भी जब छद्म वेश में अर्थ और काम ने प्रवेश पा लिया, तो सामान्य
नागरिक के सामने नैतिकता का प्रश्न ही कहाँ रह जाता है। आभिजात्यवाद से वह दबा
हुआ है। 'समरथ को नहि दोष गुसाईं' की घुट्टी उसे पिलाई गई है। वह उत्पीड़क को दोष
न देकर अपने ही पूर्व जन्म के कृत्यों को कोसता है। भगवद्गीता में वर्णित आसुरी सम्पति
का सर्वत्र साम्राज्य फैला हुआ है। विश्वविद्यालय जैसी पवित्र संस्थाएँ भी इनसे अछूती नहीं
हैं। देश में असंख्य छोटे-मोटे तानाशाह हैं। उनके आतंक से आसपास का वातावरण भय
और आशंका से भरा रहता है। हमने 'शोचनीया भारतीया नैतिकता' शीर्षक संस्कृत निबन्ध
में भारतीय जनमानस की इस कमजोरी पर प्रकाश डाला था कि उसकी अन्याय के प्रतीकार
की शक्ति अत्यन्त प्रसुप्त है। इसी का यह परिणाम है कि दुर्योधन के औद्धत्य जैसी सभापर्व
की घटनाओं को हम अनुशासन पर्व मान बैठते हैं।
योगशास्त्र का स्वरूप बतलाते हुए हमने उसको धर्म-निरपेक्ष शास्त्र बताया है। आज
से १५ वर्ष पहले महावीर जयन्ती के अवसर पर आचार्य नरेन्द्रदेव ने अपने भाषण में इस
बात का उल्लेख किया था और सम्पूर्ण भारतीय योगशास्त्र का एक तुलनात्मक अनुशीलन
प्रस्तुत करने के लिए विद्वानों का आह्वान किया था। यह कार्य अब भी जहाँ का तहाँ पड़ा
हुआ है। प्रत्येक भारतीय दर्शन की अपनी योगविधि है और अपने चरम लक्ष्य तक पहुँचने
के लिए उसका आचरण आवश्यक माना गया है। इन योगविधियों की पृथक् सत्ता रहते हुए
भी इनमें अद्भुत साम्य है। बौद्ध तन्त्र की योगविधि को ही लें। वज्रयान, कालचक्रयान
और सहजयान के नाम से इसके तीन भेद किये गये हैं। सहजयान को बौद्ध सिद्धों की अनोखी
देन माना जाता है। वस्तुतः योगवासिष्ठ, विज्ञानभैरव सरीखे ग्रन्थों को देखने से यह सारा
कल्पनाओं का महल ढह जाता है। वैष्णव, शैव, शाक्त प्रायः सभी तान्त्रिक धाराओं में वज्र-
यान, कालचक्रयान, और सहजयान के सिद्धान्तों का विस्तार से प्रतिपादन मिलता है। यह
बताया जा चुका है कि १जैन योगशास्त्र में प्रतिपादित पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत
ध्यानविधि कौलदर्शन में भी स्वीकृत है और मालिनीविजय, तन्त्रालोक जैसे ग्रन्थों में इनका
विस्तार से वर्णन मिलता है।
इन पंक्तियों के लेखक का यह स्पष्ट विचार है कि भारतीय तत्त्वज्ञान के क्रमिक
विकास को ब्राह्मण, बौद्ध, जैन, हिन्दू आदि के कल्पित काल विभागों में बाँटकर किया गया
अध्ययन वस्तुतः अधूरा है। सम्पूर्ण भारतीय चिन्तन के दैशिक और कालिक क्रमिक विकास
का तुलनात्मक एवं घात-प्रतिघातात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाना चाहिये और ऐसा करते
समय ब्राह्मण, बौद्ध, जैन जैसे कल्पित विभाग सत्य की खोज में बाधक नहीं होने चाहिये। इस
प्रकार का अध्ययन प्रस्तुत न हो पाने से ही भारतीय चिन्तन में अनेक प्रकार की विसंगतियाँ
प्रविष्ट हो गई हैं।
१. द्रष्टव्य—आचार्य शुभचन्द्र कृत ज्ञानार्णव, ३४-३७ प्रकरण ।

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( ४४ )
अन्त में सत्य की विजय होती है, यह एक सही भारतीय अवधारणा है। कुछ लोगों का
कहना है कि सत्य की नहीं, शक्ति की विजय होती है। वस्तुतः आध्यात्मिक दृष्टि से देखा
जाय तो सत्य और शक्ति में कोई विरोधाभास नहीं है। लोक-व्यवहार में देखा जाता है कि
पाशविक शक्तियाँ सदा सत्य का गला घोटे रहती हैं। किन्तु पीड़ित व्यक्ति घबरा कर उस
पाशविक शक्ति के सामने घुटने नहीं टेकता, तो उसके भीतर धीरे-धीरे दिव्य शक्ति का
आलोक फैलने लगता है। यह शक्ति कहीं से आती नहीं, यह उसका अपना ही स्वरूप है।
तन्त्रशास्त्र का उद्घोष है कि अपनी आत्मा ही अपना इष्टदेव है। इस पवित्र आध्यात्मिक
शक्ति की ही आराधना का तन्त्रशास्त्र उपदेश करते हैं और विज्ञानभैरव सरीखे योगशास्त्र
के ग्रन्थों में सहज योगविधि से अपने इस स्वरूप का साक्षात्कार करने का विधान है। इसी
दिव्य शक्ति को जगाने का योगी अरविन्द और श्रद्धेय पं० गोपीनाथ कविराज उपदेश करते
हैं। इस दिव्य शक्ति का आविर्भाव होने पर ही जगत् की पाशविक शक्तियाँ दब सकती हैं।
गाँधीवादी दर्शन अथवा समाजवादी दर्शन में किसी योगविधि को नहीं अपनाया गया
है। इसीलिये आज यह दिग्भ्रान्त है। यम (अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)
और नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योगविधि के अत्यावश्यक
अंग हैं। नये-नये भूदान जैसे कर्मकाण्डों की सृष्टि करने से यह कार्य पूरा नहीं होगा। आज
मानव जाति, विशेष कर भारतीय जनता तन और मन से बीमार है। योगशास्त्र से ये बीमारियाँ
दूर हो सकती हैं। यह तब होगा, जब कि योगशास्त्र के सही स्वरूप का चुनाव किया जाय।
तभी व्यक्तिगत उन्नति के साथ सामूहिक उन्नति की भावना की, पारलौकिक उपलब्धि के
साथ ऐहलौकिक नैतिकता की, सीमित रूप में ही सही ह्रासवाद के स्थान पर विकासवाद और
भाग्यवाद के स्थान पर पुरुषकारवाद की भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठा हो सकती है। हमारे
मत से योगवासिष्ठ और विज्ञानभैरव सरीखे ग्रन्थ इस कमी को पूरी ईमानदारी से पूरा कर
सकते हैं।
कृतज्ञता-ज्ञापन
इस ग्रन्थ को पाठकों के सामने उपस्थित करते हुए सभी पूर्वाचार्यों और श्रद्धेयचरण
गुरुदेव स्वर्गीय पं० गोपीनाथ कविराज एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वेदान्त
विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष पं० श्रीरघुनाथ शर्मा के प्रति नतमस्तक हूँ।
इस ग्रन्थ के अनुवाद कार्य का आरम्भ तब हुआ था, जब कि यह लेखक जातीय और
क्षेत्रीय संकीर्णता की तीखी डाढ़ों में फंसा हुआ था। इस दुष्काल के प्रमुख सहायक परमा-
दरणीय अनन्तश्रीविभूषित पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य एवं स्वामी करपात्रीजी महाराज के
प्रति आभार प्रदर्शित करता हूँ। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पालि विभाग के
अध्यक्ष सुहृद्वर पं० श्री जगन्नाथ उपाध्याय कष्ट और अभाव के दिनों के सदा साथी रहे हैं।
इन सब महानुभावों की सहायता के बिना इस दुःस्थिति से निकल पाना कठिन था। उत्तर

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( ४५ )
प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल महामहिम मरि डॉ० चेन्ना रेड्डी महोदय की असीम अनुकम्पा से इस
दुःस्थिति का अन्त हो सका। अतः यह ग्रंथ उन्हीं को समर्पित किया जा रहा है। इस प्रसंग
में मैं अपने परिवार को और सहधर्मिणी सौ० सुशीला द्विवेदी को भी नहीं भुला सकता,
जिन्होंने कि रुग्ण रहते हुए भी बड़े धैर्य और शालीनता के साथ इस दुःस्थिति का सामना
किया। इनके कारण ही मैं परिवार के दैनन्दिन उत्तरदायित्व से मुक्ति पाकर भगवती सर-
स्वती की आराधना के लिये पर्याप्त समय निकाल पाता हूं।
अनेक भारतीय लिपियों के विशेषज्ञ और सरस्वतीभवन पुस्तकालय के वरिष्ठ सदस्य
पं० श्रीजनार्दन शास्त्री पाण्डेय एवं मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था की वाराणसी शाखा
के व्यवस्थापक श्रीनरेन्द्रकुमार जैन के परामर्श से इस ग्रन्थ के अनुवाद कार्य का श्रीगणेश किया
गया था और भारतीय दर्शन एवं संगीत के प्रसिद्ध विद्वान् ठाकुर श्रीजयदेवसिंहजी ने इस
अनुवाद को सराहा और साथ में अनुवाद को टिप्पणियों से सुसज्जित करने का बहुमूल्य परा-
मर्श दिया था। हिन्दी के माने हुए विद्वान् श्रीकृष्णशंकर शुक्ल ने ग्रन्थ के पूरे हिन्दी अनुवाद
को धैर्यपूर्वक सुनकर उसमें यथोचित संशोधन प्रस्तुत किये थे और सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व-
विद्यालय के आगमशास्त्र के प्रसिद्ध विद्वान् श्रीरघुनाथ मिश्र ने सम्पूर्ण उपोद्घात को मनो-
योगपूर्वक पढ़कर आवश्यक परिवर्तन एवं संशोधन सुझाये हैं। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्या-
लय के बौद्ध दर्शन विभाग के प्राध्यापक नवाचार्य श्रीलक्ष्मण त्रिवेदी, सरस्वतीभवन पुस्तका-
लय के मुद्रित विभाग के वरिष्ठ सदस्य श्रीजानकीप्रसाद शर्मा और पं० श्रीहरिवंश त्रिपाठी
ने भी इस कार्य में यथोचित सहयोग किया है। गोयनका विश्वनाथ पुस्तकालय के अध्यक्ष
श्रीदेवमणि याज्ञिक ने संबद्ध पुस्तकों के अभाव की प्रतीति कभी नहीं होने दी। इन सब महा-
नुभावों के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।
मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन संस्था के अध्यक्ष श्रीसुन्दरलाल जैन के सहयोग से
ही यह पुस्तक पाठकों तक पहुंच रही है। इसके त्वरित मुद्रण में काशी के महावीर प्रेस के
व्यवस्थापक श्रीबाबूलाल जैन 'फागुल्ल' ने सराहनीय सहयोग किया है। इनके प्रति भी यह
लेखक कृतज्ञता-ज्ञापन करता है। श्लोकार्ध-सूची और शब्द-सूची तैयार करने में सहायता
करनेवाली अपनी पुत्री कु० करुणा द्विवेदी के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।
हमने यहाँ कुछ विषयों पर अपने विचार प्रकट करने की धृष्टता की है। उनकी
साधुता-असाधुता का निर्णय तो मनीषीगण ही कर सकते हैं। स्खलन और त्रुटियाँ मनुष्य
के स्वभाव के साथ लगी हुई हैं। भट्ट कुमारिल के शब्दों में 'समादधति सज्जनाः' कह कर
हम इस उपोद्घात को पूरा करते हैं।
गीता जयन्ती, सं० २०३४ विद्वद्वशंवद—
दि० २१-१२-७७ व्रजवल्लभ द्विवेदी

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द्वितीय संस्करण
इस ग्रन्थ का पहला संस्करण सन् १९७७ के बीतते-बीतते प्रकाशित हुआ था । यह
प्रसन्नता की बात है कि अब १९८३ के बीतते-बीतते इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हो
रहा है । किसी परीक्षा का पाठ्यग्रन्थ न रहते हुए भी अथवा उपन्यास एवं कथा साहित्य
जैसी मनोरंजक सामग्री के न रहने पर भी ६ वर्ष की स्वल्प अवधि में इसका यह दूसरा
संस्करण प्रकाशक की ओर से प्रस्तुत किया जा रहा है, अपने आप में यह एक घटना है । इससे
पाठकों की योग और अध्यात्म सम्बन्धी रुझान का पता चलता है । आशा है कि इस द्वितीय
संस्करण का भी पाठक उसी उत्साह से स्वागत करेंगे ।
इस ग्रन्थ को एक तरफ मध्यप्रदेश के एक बाबा का श्राप मिला है और दूसरी तरफ
गणेशपुरी के सन्त स्वामी मुक्तानन्द जी महाराज का प्रसाद । दुःख के साथ लिखना पड़ रहा
है कि अब वे स्थूल रूप में हमारे सामने नहीं रहे । निग्रह और अनुग्रह दोनों भगवान् भैरव
के ही व्यापार हैं । गणेशपुरी आश्रम के एक वाक्य की ओर मैं पाठकों का ध्यान आकृष्ट
करना चाहता हूँ । वह वाक्य है—परस्परदेवो भव । प्रस्तुत ग्रन्थ में प्रतिपादित विश्वाहन्ता
दृष्टि के विकास की कुञ्जी इस वाक्य में छिपी-सी प्रतीत होती है । इस विषय पर गहन मनन
करने की आवश्यकता है ।
इस ग्रन्थ के एक समालोचक का कहना है कि गांधीवादी दर्शन दिग्भ्रान्त नहीं है,
देशवासी दिग्भ्रान्त हैं और उसके अनेक कारण हैं । कौन दिग्भ्रान्त है, इसका निर्णय पाठकों
पर ही छोड़ा जा रहा है ।
इस संस्करण में टिप्पणी आदि में यत्र-तत्र किये गये सामान्य संशोधनों के अतिरिक्त
कोई विशेष परिवर्तन-परिवर्धन नहीं किये गये हैं और न उस प्रकार के सुझाव ही हमारे पास
आये हैं । प्रबुद्ध पाठकों के द्वारा भेजे गये सुझावों का हम सदा स्वागत करेंगे और आवश्य-
कता के अनुसार तदनुरूप सामग्री का अगले संस्करणों में साभार समावेश करने का प्रयत्न
करेंगे ।
पौष कृष्ण ६, वि० २०४० विद्वद्वशंवद—
बड़ा दिन (२५-१२-८३) व्रजवल्लभ द्विवेदी

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विज्ञानभैरवः

श्रीभैरवी¹ उवाच
श्रुतं देव मया सर्वं ²रुद्रयामलसंभवम् ।
त्रिकभेदमशेषेण सारात्सारविभागशः ॥१॥
अद्यापि न निवृत्तो मे संशयः परमेश्वर ।
अन्वयार्था
हे देव, मया रुद्रतच्छक्तिसामरस्यात्मनो यामलात् संभूतं सर्वं त्रिकभेदम् अशेषेण
सामस्त्येन सारात्सारविभागशः श्रुतम्। वेदादिशास्त्रेषु त्रिकशास्त्रं सारम्, तत्रापि
सिद्धा-मालिनी-¹उत्तरशास्त्राणि क्रमश उत्कृष्टानि सारात्सारपदाभिधेयानि विभागशो
मया श्रुतानि। तथापि हे परमेश्वर ! नाद्यापि मे संशयः शान्तः। 'यामलादिषु भाषितम्'
इति पाठे यामलादिषु शिवशक्तिसंघट्टनात्महेतुषु ब्रह्मविष्णुरुद्रभैरवादियामलेषु तदाख्येषु
आगमेषु यत्किञ्चिदुक्तमित्यर्थः ॥१॥
रहस्यार्थ
अनुबन्ध-चतुष्टय
शास्त्रीय ग्रन्थों के टीकाकारों की यह परम्परा रही है कि प्रारंभ में व्याख्येय ग्रन्थ के
अनुबन्ध-चतुष्टय का स्पष्ट लेखा-जोखा रखा जाय । विषय, प्रयोजन, संबन्ध और अधिकारी
ये अनुबन्ध-चतुष्टय कहलाते हैं। ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय क्या है ? इसके अध्ययन से किस
१. देवी-क० । २. यामलादिषु भाषितम्-ख० ।

  1. तन्त्रालोक के टीकाकार जयरथ ने (१।१८; पृ० ४९) त्रिकशास्त्र को सिद्धा, नामक
    और मालिनी नाम के तीन खण्डों में विभक्त किया है। इनमें क्रिया-प्रधान तन्त्र को सिद्धा
    और ज्ञान-प्रधान तन्त्र को नामक बताया गया है। मालिनीमत में क्रिया और ज्ञान दोनों
    प्रतिपादित हैं। अभिनवगुप्त ने स्वयं "तत्सारं त्रिकशास्त्रं हि तत्सारं मालिनीमतम्"
    (१।१८) ऐसा कह कर इनमें मालिनीमत को प्रधानता दी है। क्षेमराज अपने विज्ञानो-
    द्योत (पृ० ४) में सिद्धा, मालिनी और उत्तर यह नाम देकर इनका उत्तरोत्तर उत्कर्ष
    बताते हैं। नामक नाम का कोई तन्त्र हमारी दृष्टि में नहीं आया। क्षेमराज के 'उत्तर'
    नाम को देख कर ऐसी कल्पना करने की इच्छा होती है कि जयरथ के ग्रन्थ में 'नामक'
    न होकर 'वामक' पाठ होना चाहिये। वाम तन्त्र शिव के उत्तर मुख से उद्भूत माने जाते
    हैं। क्या 'वामक' नाम से वामकेश्वर तन्त्र का ग्रहण किया जाय ?

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२ : विज्ञानभैरव
प्रयोजन की सिद्धि होगी ? इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी कौन है ? ये बातें परस्पर
एक दूसरे से कैसे जुड़ी हुई हैं ? इनका संक्षिप्त विवरण दे दिया जाय तो पाठक को अपनी
रुचि के शास्त्र का अध्ययन करने में सुविधा अवश्य होती है । इस तरह से अनुबन्ध-चतुष्टय
का विश्लेषण करते हुए प्राचीन टीकाकार संक्षेप में प्रायः उन सभी बातों की चर्चा कर देते
हैं, जिनकी कि विस्तार से चर्चा आधुनिक ग्रन्थ-संपादन पद्धति में प्रारंभ में भूमिका लिख
कर की जाती है । प्रस्तुत संस्करण में भी प्रारंभ में उपोद्घात लिख कर इन बातों की
विस्तार से चर्चा की जायेगी, किन्तु प्राचीन टीकाकारों की पद्धति के अनुसार यहाँ उन
बातों को संक्षेप में बता देना भी आवश्यक प्रतीत होता है ।
अन्य शास्त्रों की अपेक्षा आगमशास्त्र¹ या तन्त्रशास्त्र की यह विशेषता रही है कि यहाँ
सृष्टि, स्थिति और संहार के अतिरिक्त तिरोधान और अनुग्रह भी भगवान् के कृत्य (कार्य)
मान जाते हैं । इस तरह से प्रत्येक आगमिक या तान्त्रिक संप्रदाय अपने उपास्य परम तत्त्व
को पंचकृत्यकारी मानता है । ईश्वर की तिरोधान शक्ति के कारण जीव अपने वास्तविक
स्वरूप को भूल बैठता है और वह सृष्टि, स्थिति, संहार के अर्थात् आवागमन के एक अटूट
से चक्कर में पड़ जाता है । इस चक्कर से जीव ईश्वर का अनुग्रह होने पर ही निकल
सकता है । ईश्वर के इस अनुग्रह को तन्त्रशास्त्र में 'शक्तिपात' के नाम से कहा गया है ।
ईश्वर का अनुग्रह, ²शक्तिपात, अर्थात् कृपादृष्टि जिस जीव पर होती है, शास्त्रों के अध्ययन
में उसकी रुचि जाग उठती है और अनायास ही उस पर गुरु की कृपा हो जाती है ।
³गुरु की कृपा से, शास्त्रों के अध्ययन से और अन्ततः निजी प्रयत्नों से जीव जब अपने

  1. आगमशास्त्र और तन्त्रशास्त्र एक ही मूल उद्गम की दो धाराएँ हैं । इसके लिए लेखक
    का 'आगम आणि तन्त्रशास्त्र' शीर्षक निबन्ध देखना चाहिये ।
  2. साधक या शिष्य पर ईश्वर या गुरु की कृपा को शक्तिपात कहा जाता है । शैव,
    शाक्त और वैष्णव आगमों का यह एक पारिभाषिक शब्द है । पंचकृत्यकारी (सृष्टि,
    स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह) प्रभु की अनुग्रह शक्ति का यह व्यापार है । ईश्वर
    या गुरु अपनी शक्ति का संचार साधक या शिष्य के हृदय में कर देता है, जिससे कि
    उसकी बुद्धि निर्मल होकर विवेकोन्मुख हो उठती है, स्वात्मस्वरूप की खोज में लग जाती
    है । अभिनवगुप्त ने शक्तिपात के लक्षण, भेद आदि के संबन्ध में मत-मतान्तरों की आलो-
    चना करते हुए अपने विशाल ग्रन्थ तन्त्रालोक के तेरहवें आह्निक (भा० ८, पृ० १-२१४)
    में विस्तार से विचार किया है । लु० सं० उपोद्घात (पृ० १५५-१५७) भी देखिये ।
  3. "गुरुतः शास्त्रतः स्वतः" किरणागम के इस वचन को अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक (४।७८)
    में उद्धृत किया है । वहीं (४।७९) निशाटन नाम का एक अन्य ग्रन्थ भी उद्धृत है,
    जिसमें कि क्रमभेद से यही बात कही गई है—"त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानमात्मा शास्त्रं
    गुरोर्मुखम्" । महार्थमंजरीपरिमल (पृ०६) में भी यह प्रसंग आया है ।

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विज्ञानभैरव : ३
वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, तो वह आवागमन से छुटकारा पा जाता है और उसके
लिये ईश्वर की पंचकृत्यकारिता समाप्त हो जाती है।
आगम¹ या तन्त्रशास्त्र की अनेक शाखा-उपशाखाएँ हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ 'विज्ञानभैरव'
कश्मीर के प्रत्यभिज्ञा या त्रिक संप्रदाय से संबद्ध माना जाता है। तन्त्रालोक में अभिनवगुप्त ने
तन्त्रशास्त्र को चार कोटियों में विभक्त किया है—²अनुपाय, शाम्भवोपाय, शाक्तोपाय और
आणवोपाय । प्रत्यभिज्ञा या त्रिक दर्शन को उन्होंने अनुपाय कोटि में रखा है। सिद्ध-साहित्य
में प्रचलित 'सहज' शब्द को हम अनुपाय शब्द का पर्याय मान सकते हैं। अनुपाय पद्धति से
जिस परम तत्त्व का ज्ञान प्राप्त होता है, किसी यौगिक पद्धति का सहारा लिये बिना वहाँ
तक पहुँचा नहीं जा सकता। अनुपाय शब्द का जयरथ³ ने 'अल्प उपाय' अर्थ किया है, क्योंकि
पर्युदास स्थल में नञ् ⁴अल्पार्थक माना जाता है जैसा कि 'अनुदरा कन्या' इस प्रयोग में
'अनुदरा' शब्द का अर्थ 'पतली कमर वाली' होता है। जिस यौगिक प्रक्रिया के सहारे इस
अनुपाय पद्धति से परम तत्त्व तक पहुँचा जा सकता है, विज्ञानभैरव में उसी का विस्तार से बड़ी
गंभीरता से विवेचन किया गया है। इस तरह प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय अनुपाय
(सहज) योग है। अनुपाय दर्शन के द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व (विज्ञानभैरव) तक साधक
को पहुँचा देना इसका प्रयोजन है। गुरु की कृपा, शास्त्र के अध्ययन और स्वयं अपनी प्रतिभा
के सहारे परम तत्त्व के अन्वेषण में लगा हुआ व्यक्ति इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी
होगा और ये परस्पर प्रतिपाद्य-प्रतिपादक एवं प्रतिपत्ता के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए
रहेंगे।
प्रश्नोत्तरतत्त्वनिर्णय
तन्त्रशास्त्र के प्रायः सभी ग्रन्थ प्रश्न-प्रतिवचन (उवाच) शैली में लिखे गये हैं। शैव
और शाक्त तन्त्र शिव-पार्वती अथवा भैरव-भैरवी के संवाद अर्थात् प्रश्नोत्तर पद्धति में
मिलते हैं। अद्वैतवादी शैव और शाक्त तन्त्रों में शिव और शक्ति का पृथक् अस्तित्व नहीं

  1. आगम और तन्त्रशास्त्र के स्वरूप, शाखा-उपशाखा आदि के विषय में लेखक ने पूना
    की वेदशास्त्रोत्तेजक सभा के शताब्दी ग्रन्थ 'प्राचीन भारतीय विद्येचे पुनर्दर्शन' में
    प्रकाशित 'आगम आणि तन्त्रशास्त्र' शीर्षक निबन्ध में विस्तार से प्रकाश डाला है।
    लुप्तागमसंग्रह के उपोद्घात का पूर्वार्ध भी देखिये।
  2. इन चारों उपायों के संबन्ध में उपोद्घात में विस्तार से विचार किया गया है।
  3. "पर्युदासस्य 'अनुदरा कन्या' इतिवदल्पार्थत्वेऽपि भावात् । (तथा च) अनुपायत्वम्
    (इत्यस्य) अल्पोपायत्वमित्यर्थः" (तन्त्र० वि० २।२; पृ० ३)।
  4. "नञ्भावे विषेधे च स्वरूपार्थेऽप्यतिक्रमे । ईषदर्थे च सादृश्ये तद्विकारतदन्ययोः ॥"
    मेदिनीकोश के इस श्लोक में आठ अर्थों में नञ् का प्रयोग बताया गया है। प्रस्तुत
    स्थल में ईषत् (अल्प) अर्थ में नञ् का प्रयोग हुआ है।
  5. 'विज्ञानभैरव' पद की व्याख्या एवं विश्लेषण उपोद्घात में देखना चाहिये।
    Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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४ : विज्ञानभैरव
माना जाता। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रारंभिक श्लोकों में बहुत ही संक्षेप में इस विषय पर अच्छा
प्रकाश डाला गया है। इस स्थिति मे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब इनकी अलग
से कोई सत्ता नहीं है, तब इनमें संवाद कैसे संभव है ? क्योंकि संवाद तो परस्पर दो या
अधिक व्यक्तियों का ही हो सकता हैं। इस प्रश्न का समाधान अद्वैतवादी तन्त्र-ग्रन्थों के
टीकाकारों ने अपनी-अपनी शैली में किया है।
कविकुलगुरु कालिदास ने पार्वती और परमेश्वर को शब्द और अर्थ के समान परस्पर
अनुस्यूत माना है (रघु० १।१)। महावैयाकरण भर्तृहरि ने कहा है कि शब्दब्रह्म ही अर्थ
अर्थात् जगत् के रूप में परिणत होता है (वाक्य० १।१)। तन्त्रशास्त्र बताते हैं कि जब परब्रह्म
शब्दब्रह्म और अर्थ के रूप में परिणत होता है तो उसका यह परिणाम ही शिव और शक्ति
नाम से जाना जाता है। शिवपुराण की ¹वायवीय संहिता में बताया गया है—
शब्दजातमशेषं तु धत्ते शर्वस्य वल्लभा।
अर्थस्वरूपमखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः ॥
अर्थात् भगवान् शिव की शक्ति समस्त शब्दों का ओर भगवान् शिव समस्त अर्थों
का स्वरूप धारण करते हैं।
शब्दब्रह्म ही क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ²वाणी के रूप में परिणत
होता है और तदनुसार पर, सूक्ष्म, स्थूल अर्थों की अभिव्यक्ति होती है। परावस्था में
शिव और शक्ति अर्थात् शब्द ओर अर्थ अभिन्न रूप से ³स्त्यानावस्था में अवस्थित रहते
हैं। पंचकृत्यों के संपादन में प्रवृत्त परमेश्वर इस अवस्था में निरन्तर अनुग्रहशील पराशक्ति
से संचालित होकर स्वयं भी अनुग्रहस्वभाव का बन जाता है, तब ⁴रुद्रयामल की समावेश

  1. सोन्दर्यलहरी की व्याख्या अरुणामोदिनी (पृ० ३०) द्रष्टव्य (गणेश एण्ड कम्पनी, मद्रास,
    सन् १९५७ का संस्करण)।
  2. प्रपंचसार, शारदातिलक प्रभृति ग्रन्थों के आधार पर लेखक ने 'आगम ओर तन्त्रशास्त्र
    की सृष्टिप्रक्रिया' नामक निबन्ध में 'भास्करराय-संमत सृष्टिप्रक्रिया' शीर्षक के अन्तर्गत
    इस विषय को विस्तार से समझाने का प्रयत्न किया है।
  3. 'स्त्यै ष्ट्यै शब्दसंघातयों' (भ्वा० ९१०-९११) धातु से कर्ता अर्थ में क्त प्रत्यय होने
    पर 'स्त्यान' शब्द बनता है। हिम (बर्फ) दशा में जल जब संघातावस्था में रहता है,
    तो उसकी स्वाभाविक स्पन्दन क्रिया भी रुक जाती है। इसी तरह से शब्द और अर्थ
    की इस संघातावस्था में क्रिया-शक्ति स्तिमित रहती है, निष्पन्द रहती है। शब्द और
    अर्थ शिव और शक्ति से अभिन्न है, यह बताया जा चुका है। शिव और शक्ति की
    इसी निष्क्रिय (निष्पन्द) स्थिति को स्त्यानावस्था कहते हैं।
  4. शैव और शाक्त अद्वैतवादी दार्शनिक प्रकाश शब्द को शिव का तथा विमर्श पद को शक्ति
    का वाचक मानते हैं। इन दोनों शब्दों का विवेचन नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात
    (पृ० ८३) की एक टिप्पणी में किया गया है। शब्द और अर्थ की तरह, पार्वती

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विज्ञानभैरव : ५
दशा का उन्मेष होता है, जो कि प्रकाश और विमर्श के नाम से शास्त्रों में व्यवहृत है । इस
प्रकार पश्यन्ती अवस्था में शास्त्रों का सूक्ष्म रूप से आविर्भाव होता है और मध्यमा एवं
वैखरी अवस्था में आकर ये स्थूल रूप धारण कर लेते हैं ।
परा शक्ति पर भैरव से अभिन्न है, किन्तु अनुग्रह व्यापार में प्रवृत्त होकर जब यह
पश्यन्ती भूमिका में प्रवेश करती है, तो लोक के कल्याण के लिए यह स्वयं प्रश्नकर्ता के रूप
में उपस्थित होती है । उसको अपनी परा भूमि का सदा अपने आप भान होता रहता है,
किन्तु वह आन्तर या बाह्य इन्द्रियों का विषय नहीं है, इसलिये यह उस परा वाणी को सदा
परोक्ष मानती है । वह परा भूमि पश्यन्ती आदि से पहले विद्यमान है, अतः उसका भूतकाल
में निर्देश माना जाता है । उस परा भूमि में दिन, मास आदि का संबन्ध न होने से अत्यन्त
परोक्ष भूत काल का, जैसे वह आज भी विद्यमान है, इस तरह से भान होता है । लोक में
'सुप्तोऽहं किल विललाप' (मैं जब सोया हुआ था, तब प्रलाप कर रहा था) इस तरह से
वर्तमान काल में भूत काल का प्रयोग होता है, उसी तरह से यहाँ वर्तमान काल की अनुस्यूति
रहते हुए भी अवस्था की भिन्नता के आधार पर 'उवाच' इस भूत काल की क्रिया
का प्रयोग उचित ही माना जायगा । इसका अभिप्राय यह है कि लोक में गाढ़ी नींद से जाग
उठने पर व्यक्ति को उस बीती अवस्था का स्मरण नहीं रहता, क्योंकि वह उसके जाग्रत्
अनुभव का विषय नहीं रही है । बाद में दूसरे व्यक्ति के कहने से तथा पूर्व अवस्था में की
गई विलाप, गान आदि क्रियाओं के कारण उत्पन्न अपने शरीर के कम्प, हर्ष आदि विकारों
को देख कर यह जान पाता है कि सोये हुए मैंने ऐसा किया था । इन अनुभूति का सर्वथा
अपलाप नहीं किया जा सकता । मद, स्वप्न, मूर्छा प्रभृति अवस्थाओं में किसी विशेष वस्तु का
ज्ञान न होने से उसको परोक्ष अनुभूति मान लिया जाता है । परावस्था में तो वेद्य (जानने
योग्य) विषय का सर्वथा अभाव ही रहता है । इन दोनों ही स्थितियों में विषय की परोक्षता
तो समान ही है, किन्तु अन्तर यह है कि मद आदि अवस्थाओं में अज्ञान से आवृत्त (छिपा)
और परमेश्वर की तरह, प्रकाश और विमर्श की भी स्थिति यामल भाव में ही रहती है ।
ये सदा साथ रहते हैं । वस्तुतः शब्द-अर्थ, पार्वती-परमेश्वर और प्रकाश-विमर्श शब्द
पर्यायवाची हैं । अर्धनारीश्वर रूप में भगवान् शिव जैसे सतत यामल भाव में रहते हैं,
वैसे ही प्रारंभ में प्रकाश और विमर्श की स्थिति सामरस्य अवस्था में रहती है । इसी
को समावेश दशा भी कहते हैं । समावेश दशा में जीव में परिमित प्रमाता का भाव
गौण हो जाता है और वह अपने को स्वतन्त्र, बोधस्वरूप समझने लगता है, किन्तु शिव
और शक्ति का यह समावेश (सामरस्य) प्रपंच के उन्मेष के लिये होता है । जीव जिस
तरह शिवभाव में समाविष्ट होता है, उसी तरह से शिव और शक्ति का यामल भाव
भी प्रपंच के रूप में समाविष्ट हो जाता है, प्रपंच के रूप में दिखाई देने लगता है ।

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६ : विज्ञानभैरव
होने से विषय का साक्षात्कार नहीं होता, परावस्था में तो ¹वेद्यवेदकभाव की सत्ता बनती
ही नहीं।
इस विश्लेषण के आधार पर 'भैरवी उवाच' और 'भैरव उवाच' जैसे शास्त्र में
व्यवहृत वाक्यों का यह अर्थ होता है कि परमशिव विश्व का कल्याण करने की दृष्टि से स्वयं ही
विमर्श रूप में बदल कर अनुग्राह्य की योग्यता के अनुसार पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी
के माध्यम से प्रश्न करते हैं और प्रकाश स्वरूप में अवस्थित होकर इसी पद्धति से वे प्रश्नों
का उत्तर भी देते हैं। 'उवाच' पद यहाँ लिट् लकार के उत्तम पुरुष के एक वचन में प्रयुक्त
हुआ है। यद्यपि यहाँ 'वच्मि' इस वर्तमान काल की क्रिया का प्रयोग होना चाहिए, किन्तु
शास्त्र तो सनातन हैं, अर्थात् इनको संप्रदाय परम्परा तीनों कालों में अविच्छिन्न रूप से
चलती रहती है, अतः साधारणतः यहाँ भूत काल की क्रिया का ही प्रयोग होता है। शास्त्रों
में ऐसा अनेक स्थलों में देखा गया है कि जो प्रकरण बाद में आने वाला है, उसके लिए भी
भविष्य काल की क्रिया का प्रयोग न होकर भूत काल की क्रिया का प्रयोग होता है²।
महास्वच्छन्दतन्त्र के निम्न वचन से इस बात की पुष्टि होती है—
³गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः।
प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत् ।।
अर्थात् स्वयं सदाशिव देव शिव और शक्ति के रूप में गुरु और शिष्य बनकर प्रश्न
और प्रतिवचन के रूप में तन्त्रों की अवतारणा करते हैं।
ग्रन्थोपक्रम (तन्त्रावतार)
प्रस्तुत ग्रन्थ में 'श्रुतं देव' से लेकर 'छिन्धि संशयम्' पर्यन्त प्रथम सात श्लोकों में देवी
अपने संशय को उपस्थित करती है और 'साधु साधु'से 'शिवः प्रिये' पर्यन्त चौदह श्लोकों में

  1. अभी बताया गया है कि परावस्था में शब्द और अर्थ अभिन्न रूप से स्त्यानावस्था में
    रहते हैं। वाच्य और वाचक के भेद के अभाव में लोक-व्यवहार नहीं चल सकता।
    इसी बात को वाक्यपदीयकार ने कहा है—"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते।
    अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ।।" (१।१२३)। अर्थात् बिना शब्द के किसी भी
    वस्तु का ज्ञान नहीं हो सकता। वस्तुमात्र का ज्ञान किसी न किसी शब्द से जुड़ा हुआ
    ही रहता है। इस तरह से परावस्था में जब वाच्यवाचकभाव की स्थिति नहीं बनती,
    तो उसके सहारे चलने वाले वेद्यवेदकभाव, यह वेद्य (जानने योग्य) है और यह वेदक
    (जानने वाला है) है, की भी स्थिति सुतरां नहीं बन सकती।
  2. "अत एव तन्त्रराज उत्तरपटलेषु वक्ष्यमाणोऽप्यर्थः पूर्वपटलेषु प्रोक्त इति भूतार्थकपदेनैव
    तत्र तत्र निर्दिश्यते" (नि० से० १।१३)।
  3. योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २) में यह श्लोक उद्धृत है। मुद्रित स्वच्छन्दतन्त्र (८.३१-३२)
    में पाठभेद के साथ यह श्लोक मिलता है।
    Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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विज्ञानभैरव : ७
शिव संक्षेप में उसका समाधान करते हैं। इसके बाद 'देवदेव' से 'ब्रूहि भैरव' पर्यन्त श्लोकों
में देवी शिव द्वारा प्रतिपादित परमतत्त्व की प्राप्ति का उपाय पूछती है और शिव इसके उत्तर
में आगे के ग्रन्थ में ११२ धारणाओं का वर्णन करते हैं। इन धारणाओं के अभ्यास की फल-
श्रुति सुन कर 'इदं यदि वपुर्देव' इत्यादि दो श्लोकों से देवी पुनः कुछ प्रश्न उठाती है और
आगे के ग्रन्थ में शिव उनका भी समाधान प्रस्तुत करते हैं। अन्त के दो श्लोकों में देवी पूरी
तरह से अपने संशय की निवृत्ति की बात स्वीकार करते हुए इस समाधान के प्राप्त परितृप्ति
(प्रसन्नता) का वर्णन करती हैं और शिव के साथ तन्मय हो जाती हैं। इस प्रकार प्रश्न-
प्रतिवचनात्मक इस पूरे ग्रन्थ का तात्पर्य वैखरी प्रभृति परा पर्यन्त वाणी के माध्यम से
विज्ञानभैरव के साथ साधक की समावेश दशा की उपलब्धि में है। अर्थात् परा देवी के प्रश्नों का
समाधान हो जाने पर जिस तरह से वह शिव के साथ तन्मय हो गई, उसी तरह से प्रत्येक
साधक विज्ञानभैरव स्वरूप परम तत्त्व के साथ तादात्म्य लाभ कर सकता है, जब कि वह परा-
वस्था तक पहुँच कर इस शास्त्र के रहस्य को ठीक समझ लेता है। इसलिए इस शास्त्र का
नाम भी यही रख दिया गया है ।
इस शास्त्र के रचयिता स्वयं भैरव ही हैं। जब वे तिरोधान व्यापार में प्रवृत्त होते
हैं तो सुख-दुःख, नील-पीत आदि नाना प्रकार के आन्तर और बाह्य विचित्र स्वरूपों और
तदनुकूल चेष्टाओं से अपने स्वरूप को ढक लेते हैं और अनुग्रह व्यापार में प्रवृत्त होनेपर
वे ही सूर्य से निकली किरणों की तरह अपने स्वरूप से बाहर निकले भक्त जनों पर अनुग्रह
करने की दृष्टि से प्रश्नोत्तर शैली में शास्त्र की अवतारणा करते हैं।
'श्रुतं देव....परमेश्वर' इस श्लोक में विमर्शमयी भैरवी प्रकाशस्वरूप भैरव से पूछती
है कि हे देव, १ अर्थात् विश्व को प्रकाशित करने जैसी क्रीड़ा करने वाले स्वात्मस्वरूप भगवन् !
समस्त रोगों को नष्ट करने वाले रुद्र और उसकी शक्ति के सामरस्य स्वरूप यामल से जिनकी
उत्पत्ति हुई है, २ ऐसे समस्त शास्त्रों को मैंने सुन लिया है। ये शास्त्र त्रिक अर्थात् परा, परा-
परा और अपरा शक्ति के सारभूत शिव, शक्ति और नर (जीव) नामक तीनों तत्त्वों के भेद से

  1. दिवादि गण में पठित 'दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु'
    इस धातु से 'पचाद्यच्' प्रत्यय होने पर देव शब्द बनता है। क्रीडा, विजिगीषा, व्यवहार,
    द्युति, स्तुति ओर गति शब्दों के साम्प्रदायिक अर्थ महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १७३) में
    मिलते हैं।
  2. "अदृष्टविग्रहाच्छान्ताच्छिवात् परमकारणात् । ध्वनिरूपं विनिष्क्रान्तं शास्त्रं परम-
    दुर्लभम् ॥" यह श्लोक विज्ञानभैरवोद्योत (पृ० ३) और स्वच्छन्दोद्योत (१।३; पृ० ६)
    में उद्धृत है। कुछ पाठ भेदों के साथ यह स्वच्छन्दतन्त्र (८।२७-२८), श्रीकण्ठीयसंहिता
    (स्वच्छन्दोद्योत, वहीं, पृ० १९) और पौष्करागम (श० २० सं०, पृ० ७) में उपलब्ध
    होता है। इन स्थलों में शास्त्रों की नादरूपता का प्रतिपादन मिलता है। इस विषय की
    विशद जानकारी के लिये लु० सं० उपोद्घात (पृ० ११२-११३) देखिये।

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८ : विज्ञानभैरव
ज्ञान, क्रिया आदि के प्राधान्य और अप्राधान्य का प्रतिपादन करने से अनेक भेदों में विभक्त
हो जाते हैं। उन सबके सारभूत त्रिक शास्त्र को भी मैंने पूरी सावधानी से सुन लिया है, किन्तु
मेरा संदेह अभी भी दूर नहीं हुआ है ।
'यामलादिषु भाषितम्' इस पाठान्तर का अर्थ यह होगा कि शिव और शक्ति के
सामरस्य से उत्पन्न हुए ब्रह्मयामल, विष्णुयामल, रुद्रयामल, भैरवयामल आदि में जो कुछ
आपने कहा है, आपके साथ अभिन्नरूप से रहने के कारण वह सब मैंने पहले सुना ही है ।
इस पूरे कथन का अभिप्राय यह है कि दर्पण में प्रतिबिम्बित वस्तु की जैसे अपने बिम्ब
से भिन्न और अभिन्न दोनों तरह की प्रतीति होती है, उसी तरह से आन्तर रूप से एकता
और बाह्य रूप से नर, शक्ति और शिव के रूप में भिन्नता का भी बोध होता है । इस
भेदावस्था में असाधारण और साधारण रूप से यद्यपि मैंने इस विषय को आप से सुन लिया
है, किन्तु अभी भी मेरा संदेह दूर नहीं हो रहा है, क्योंकि माया¹ प्रभृति के ढांचे में पड़-
कर मेरा स्वरूप और ज्ञान संकुचित हो गया है ।
²वेदादिभ्यः परं शैवं शैवाद् वामं तु दक्षिणम् ।
दक्षिणात् परतः कौलं कौलात् परतरं त्रिकम् ॥
इस वचन के अनुसार वेद से श्रेष्ठ शैव शास्त्र, शैव से श्रेष्ठ वाम, वाम से श्रेष्ठ दक्षिण,
दक्षिण से कौल और उससे भी श्रेष्ठतर त्रिक शास्त्र है । त्रिक शास्त्र में भी सिद्धा, मालिनी
और उत्तर³ शासन क्रमशः ज्ञान और उपदेश के प्रकर्ष के आधार पर उत्कृष्ट माने जाते हैं ।
'सारात्सारविभागशः' इस पद का अभिप्राय यही है कि इन सब शास्त्रों को, जो कि एक से
एक बढ़कर हैं, मैंने सुना है । त्रिक शास्त्र ही नहीं, उसमें भी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट सिद्धा,
मालिनी और उत्तर शास्त्र को भी मैंने सुन लिया, किन्तु मेरा संशय अभी दूर नहीं
हुआ है ।।१।।

  1. “सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च विभो-
    र्विधिज्ञा : षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य ।।” (वा० पु० १२।३३) इस श्लोक में शिव के
    सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबेध, वतन्त्रता, अलुप्तशक्तित्ता और अनन्तशक्तित्ता—ये छः गुण
    गिनाये गये हैं । अद्वैत सिद्धान्त के अनुसार जीव शिव से अभिन्न है, किन्तु माया के
    कारण उसका स्वरूप संकुचित हो जाता है और इसके बाद कला, विद्या,
    राग, काल और नियति तत्त्वों के कारण क्रमशः उसकी सर्वकर्तृता, सर्वज्ञता,
    नित्यपरिपर्णतृप्तिता, नित्यता और स्वतन्त्रता—ये पाँच शक्तियाँ संकुचित हो जाती हैं
    (द्रष्टव्य—सौ० सू० १. ३२-३९), अतः इन पाँच तत्त्वों को पंचकंचुक कहा जाता है ।
    माया का भी इनमें समावेश कर कुछ आचार्य कंचुकों की संख्या छः मानते हैं ।
  2. परारित्रशिका की व्याख्या (पृ० ९२) में अभिनवगुप्त ने भी इसी आशय का श्लोक उद्धृत
    किया है, जिसमें कि त्रिकशास्त्र को सर्वोत्तम माना गया है ।
  3. उत्तर शब्द के स्पष्टीकरण के लिए पृ० १ की टिप्पणी द्रष्टव्य ।