विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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अन्त में सत्य की विजय होती है, यह एक सही भारतीय अवधारणा है। कुछ लोगों का
कहना है कि सत्य की नहीं, शक्ति की विजय होती है। वस्तुतः आध्यात्मिक दृष्टि से देखा
जाय तो सत्य और शक्ति में कोई विरोधाभास नहीं है। लोक-व्यवहार में देखा जाता है कि
पाशविक शक्तियाँ सदा सत्य का गला घोटे रहती हैं। किन्तु पीड़ित व्यक्ति घबरा कर उस
पाशविक शक्ति के सामने घुटने नहीं टेकता, तो उसके भीतर धीरे-धीरे दिव्य शक्ति का
आलोक फैलने लगता है। यह शक्ति कहीं से आती नहीं, यह उसका अपना ही स्वरूप है।
तन्त्रशास्त्र का उद्घोष है कि अपनी आत्मा ही अपना इष्टदेव है। इस पवित्र आध्यात्मिक
शक्ति की ही आराधना का तन्त्रशास्त्र उपदेश करते हैं और विज्ञानभैरव सरीखे योगशास्त्र
के ग्रन्थों में सहज योगविधि से अपने इस स्वरूप का साक्षात्कार करने का विधान है। इसी
दिव्य शक्ति को जगाने का योगी अरविन्द और श्रद्धेय पं० गोपीनाथ कविराज उपदेश करते
हैं। इस दिव्य शक्ति का आविर्भाव होने पर ही जगत् की पाशविक शक्तियाँ दब सकती हैं।
गाँधीवादी दर्शन अथवा समाजवादी दर्शन में किसी योगविधि को नहीं अपनाया गया
है। इसीलिये आज यह दिग्भ्रान्त है। यम (अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)
और नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योगविधि के अत्यावश्यक
अंग हैं। नये-नये भूदान जैसे कर्मकाण्डों की सृष्टि करने से यह कार्य पूरा नहीं होगा। आज
मानव जाति, विशेष कर भारतीय जनता तन और मन से बीमार है। योगशास्त्र से ये बीमारियाँ
दूर हो सकती हैं। यह तब होगा, जब कि योगशास्त्र के सही स्वरूप का चुनाव किया जाय।
तभी व्यक्तिगत उन्नति के साथ सामूहिक उन्नति की भावना की, पारलौकिक उपलब्धि के
साथ ऐहलौकिक नैतिकता की, सीमित रूप में ही सही ह्रासवाद के स्थान पर विकासवाद और
भाग्यवाद के स्थान पर पुरुषकारवाद की भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठा हो सकती है। हमारे
मत से योगवासिष्ठ और विज्ञानभैरव सरीखे ग्रन्थ इस कमी को पूरी ईमानदारी से पूरा कर
सकते हैं।
कृतज्ञता-ज्ञापन
इस ग्रन्थ को पाठकों के सामने उपस्थित करते हुए सभी पूर्वाचार्यों और श्रद्धेयचरण
गुरुदेव स्वर्गीय पं० गोपीनाथ कविराज एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के वेदान्त
विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष पं० श्रीरघुनाथ शर्मा के प्रति नतमस्तक हूँ।
इस ग्रन्थ के अनुवाद कार्य का आरम्भ तब हुआ था, जब कि यह लेखक जातीय और
क्षेत्रीय संकीर्णता की तीखी डाढ़ों में फंसा हुआ था। इस दुष्काल के प्रमुख सहायक परमा-
दरणीय अनन्तश्रीविभूषित पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य एवं स्वामी करपात्रीजी महाराज के
प्रति आभार प्रदर्शित करता हूँ। सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के पालि विभाग के
अध्यक्ष सुहृद्वर पं० श्री जगन्नाथ उपाध्याय कष्ट और अभाव के दिनों के सदा साथी रहे हैं।
इन सब महानुभावों की सहायता के बिना इस दुःस्थिति से निकल पाना कठिन था। उत्तर