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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 256 में से

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४ : विज्ञानभैरव
माना जाता। प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रारंभिक श्लोकों में बहुत ही संक्षेप में इस विषय पर अच्छा
प्रकाश डाला गया है। इस स्थिति मे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब इनकी अलग
से कोई सत्ता नहीं है, तब इनमें संवाद कैसे संभव है ? क्योंकि संवाद तो परस्पर दो या
अधिक व्यक्तियों का ही हो सकता हैं। इस प्रश्न का समाधान अद्वैतवादी तन्त्र-ग्रन्थों के
टीकाकारों ने अपनी-अपनी शैली में किया है।
कविकुलगुरु कालिदास ने पार्वती और परमेश्वर को शब्द और अर्थ के समान परस्पर
अनुस्यूत माना है (रघु० १।१)। महावैयाकरण भर्तृहरि ने कहा है कि शब्दब्रह्म ही अर्थ
अर्थात् जगत् के रूप में परिणत होता है (वाक्य० १।१)। तन्त्रशास्त्र बताते हैं कि जब परब्रह्म
शब्दब्रह्म और अर्थ के रूप में परिणत होता है तो उसका यह परिणाम ही शिव और शक्ति
नाम से जाना जाता है। शिवपुराण की ¹वायवीय संहिता में बताया गया है—
शब्दजातमशेषं तु धत्ते शर्वस्य वल्लभा।
अर्थस्वरूपमखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः ॥
अर्थात् भगवान् शिव की शक्ति समस्त शब्दों का ओर भगवान् शिव समस्त अर्थों
का स्वरूप धारण करते हैं।
शब्दब्रह्म ही क्रमशः परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ²वाणी के रूप में परिणत
होता है और तदनुसार पर, सूक्ष्म, स्थूल अर्थों की अभिव्यक्ति होती है। परावस्था में
शिव और शक्ति अर्थात् शब्द ओर अर्थ अभिन्न रूप से ³स्त्यानावस्था में अवस्थित रहते
हैं। पंचकृत्यों के संपादन में प्रवृत्त परमेश्वर इस अवस्था में निरन्तर अनुग्रहशील पराशक्ति
से संचालित होकर स्वयं भी अनुग्रहस्वभाव का बन जाता है, तब ⁴रुद्रयामल की समावेश

  1. सोन्दर्यलहरी की व्याख्या अरुणामोदिनी (पृ० ३०) द्रष्टव्य (गणेश एण्ड कम्पनी, मद्रास,
    सन् १९५७ का संस्करण)।
  2. प्रपंचसार, शारदातिलक प्रभृति ग्रन्थों के आधार पर लेखक ने 'आगम ओर तन्त्रशास्त्र
    की सृष्टिप्रक्रिया' नामक निबन्ध में 'भास्करराय-संमत सृष्टिप्रक्रिया' शीर्षक के अन्तर्गत
    इस विषय को विस्तार से समझाने का प्रयत्न किया है।
  3. 'स्त्यै ष्ट्यै शब्दसंघातयों' (भ्वा० ९१०-९११) धातु से कर्ता अर्थ में क्त प्रत्यय होने
    पर 'स्त्यान' शब्द बनता है। हिम (बर्फ) दशा में जल जब संघातावस्था में रहता है,
    तो उसकी स्वाभाविक स्पन्दन क्रिया भी रुक जाती है। इसी तरह से शब्द और अर्थ
    की इस संघातावस्था में क्रिया-शक्ति स्तिमित रहती है, निष्पन्द रहती है। शब्द और
    अर्थ शिव और शक्ति से अभिन्न है, यह बताया जा चुका है। शिव और शक्ति की
    इसी निष्क्रिय (निष्पन्द) स्थिति को स्त्यानावस्था कहते हैं।
  4. शैव और शाक्त अद्वैतवादी दार्शनिक प्रकाश शब्द को शिव का तथा विमर्श पद को शक्ति
    का वाचक मानते हैं। इन दोनों शब्दों का विवेचन नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात
    (पृ० ८३) की एक टिप्पणी में किया गया है। शब्द और अर्थ की तरह, पार्वती