वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
९४ वात्स्यायन-कामसूत्र
तन्मित्रेषु विश्वसिति। वचनं चैषां बहु मन्यते करोति च। तत्परिचारकैः सह
प्रीतिं सङ्कथां द्यूतमिति च करोति। स्वकर्मसु च प्रभविष्णुरिवैतान्नियुङ्क्ते। तेषु च
नायकसङ्कथामन्यस्य कथयत्स्ववहिता तां शृणोति ॥ २९ ॥
नायक के सहचरों एवं अनुचरों के साथ व्यवहार—नायक के मित्रों पर विश्वास
करती है। उनकी बातों का समादर करती है और तदनुकूल ही व्यवहार करती है। उसके नौकरों
के साथ प्रीतिपूर्ण वार्तालाप करती है और उनके साथ ताश, शतरंज आदि खेलती है। उसके
नौकरों को स्वामी के समान आदेश देती है। यदि वे नायकविषयक बातें करते हैं तो उन्हें
एकाग्रचित्त होकर सुनती है ॥ २९ ॥
धात्रेयिकया चोदिता नायकस्योदवसितं प्रविशति। तामन्तरा कृत्वा तेन सह
द्यूतं क्रीडामालापं चायोजयितुमिच्छति। अनलङ्कृता दर्शनपथं परिहरति।
कर्णपत्रमङ्गुलीयकं स्रजं वा तेन याचिता सधीरमेव गात्रादवतार्य सख्या हस्ते
ददाति। तेन च दत्तं नित्यं धारयति। अन्यवरसङ्कथासु विषण्णा भवति। तत्पक्षकैश्च
सह न संसृज्यत इति ॥ ३० ॥
नायक से सम्पर्क की वाञ्छा—धाय की पुत्री या सखी कहने पर नायक के घर चली
जाती है। उस सखी को माध्यम बनाकर नायक के साथ द्यूत, खेल, वार्तालाप आदि करना
चाहती है। नायक के सामने विना श्रृंगार किये नहीं आती। यदि वह कर्णफूल, अँगूठी या माला
माँगता है, तो गम्भीरतापूर्वक शरीर से उतारकर सखी के हाथ पर रख देती है। नायक द्वारा दी
गयी अँगूठी, माला आदि वस्तुओं को नित्य धारण करती है। दूसरे नायकों की कथा से विमुख
हो जाती है और उनके पक्ष वालों के साथ संसर्ग नहीं करती ॥ ३० ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
दृष्टैतान् भावसंयुक्तानाकारानिङ्गितानि च।
कन्यायाः सम्प्रयोगार्थं ताँस्तान् योगान्विचिन्तयेत् ॥ ३१ ॥
उपसंहार—इस प्रकार कन्या के भावसंयुक्त सङ्केतों और चेष्टाओं को देखकर ही, उसके
साथ समागम के लिये समुचित उपायों को प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ३१ ॥
बालक्रीडनकैर्बाला कलाभिर्यौवने स्थिता।
वत्सला चापि संग्राह्या विश्वास्यजनसंग्रहात् ॥ ३२ ॥
बाला नायिकाओं को बालक्रीड़ा से, तरुणी को कामकलाओं से और प्रौढ़ा को उसकी
विश्वस्त सखियों से सम्पर्क करके वश में किया जा सकता है ॥ ३२ ॥
बालोपक्रम एवं इंगिताकारसूचन नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९५
चतुर्थ अध्याय
एकपुरुषाभियोगादि प्रकरण
दर्शिताङ्गिकारां कन्यामुपायैरभियुञ्जीत ॥ १ ॥
उपाय—कन्या के भावों और चेष्टाओं को अपने अनुकूल देखकर उसे उपायों से प्राप्त
करना चाहिये ॥ १ ॥
द्यूते क्रीडनकेषु च विवदमानः साकारमस्याः पाणिमवलम्बेत ॥ २ ॥
साधिकार करग्रहण—शतरंज, द्यूत (ताश आदि) तथा अन्य खेलों में विवाद करता
हुआ नायक, नायिका का हाथ साधिकार पकड़ ले ॥ २ ॥
यथोक्तं च स्पृष्टकादिकमालिङ्गनविधिं विदध्यात् ॥ ३ ॥
आलिङ्गन—स्पृष्टक, विद्धक, उद्घृष्टक और पीड़ितक—इन आलिङ्गन-प्रकारों का
अवसर के अनुरूप विधिपूर्वक उपयोग करे ॥ ३ ॥
पत्रच्छेद्यक्रियायां च स्वाभिप्रायसूचकं मिथुनमस्या दर्शयेत् ॥ ४ ॥
पत्रच्छेद्य से अभिप्रायज्ञापन—पत्रच्छेद्य क्रिया में अपने अभिप्राय को ज्ञापित करने
वाला हंसमिथुन आदि बनाकर नायिका को दिखाये ॥ ४ ॥
एवमन्यद् विरलशो दर्शयेत् ॥ ५ ॥
मिथुनदर्शन—कभी-कभी मिथुन (युगल) चित्र भी दिखाने चाहिये ॥ ५ ॥
जलक्रीडायां तद्दूरतोऽप्सु निमग्नः समीपमस्या गत्वा स्पृष्ट्वा चैनां तत्रैवोन्म-
ज्जेत् ॥ ६ ॥
जलक्रीड़ा में अभिप्रायज्ञापन—जलक्रीड़ा में नायिका से दूर पानी में डुबकी लगाकर,
उसके समीप पहुँचकर और उसे छूकर ही पानी से बाहर निकले ॥ ६ ॥
नवपत्रिकादिषु च सविशेषभावनिवेदनम् ॥ ७ ॥
नवपत्रिका में अभिप्रायज्ञापन—नवपत्रिका आदि देश्य खेलों में अपने अभिप्राय का
निवेदन करना चाहिये ॥ ७ ॥
आत्मदुःखस्यानिवेदेन कथनम् ॥ ८ ॥
दुःखनिवेदन—अपने दुःख को, बिना किसी वेदना के कहना चाहिये ॥ ८ ॥
स्वप्नस्य च भावयुक्तस्यान्यापदेशेन ॥ ९ ॥
स्वप्नकथन—किसी बहाने से भावयुक्त स्वप्न की बातें कहनी चाहिये ॥ ९ ॥
प्रेक्षणके स्वजनसमाजे वा समीपोपवेशनम् । तत्रान्यापदिष्टं स्पर्शनम् ॥ १० ॥
बहाने से अङ्गस्पर्श—खेल आदि देखते समय या स्वजनगोष्ठी में नायक, नायिका के
पास ही बैठे और किसी बहाने से उसका अङ्गस्पर्श करे ॥ १० ॥
अपाश्रयार्थं च चरणेन चरणस्य पीडनम् ॥ ११ ॥
चरणपीड़न—उसके अङ्गों पर अपना अङ्ग रखने के लिये, उसके पैर को अपने पैर से
दबाये ॥ ११ ॥
ं भावं च तत्रोपलक्षयेत् । यथा पारदारिके वक्ष्यामः ॥ २१ ॥-> completely clear. Line 34: विदितभावस्तु व्याधिमपदिश्यैनां वार्ताग्रहणार्थं स्वमुदवसितमानयेत् ॥ २२ ॥` -> completely clear.
Every single other sutra is the standard, 100% correct Kamasutra sutra text!
Now look at Sutra 12 in the Kamasutra (3.2.12):
The standard sutra is:
ततः शनैरेकैकामङ्गुलिमभिमृशेत् ॥ १२ ॥
Wait, why does the print look slightly odd on रेकैका?
Wait, look at रेकैका:
Is it रे then कै then का?
Wait, look at रे: in this font, does रे have anything?
Wait, let me look at रे in other places:
Line 3: धीरे धीरे -> धी रे धी रे.
Look at रे in धीरे: it is a simple र with े!
Now look back at Line 2:
Wait! After नै, look at that letter:
Is it क?
Wait, why would it be क?
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९७
गृह-आमन्त्रण—नायिका को इच्छुक जान लेने के पश्चात् सिरदर्द आदि का बहाना
करके वार्तालाप के लिये उसे अपने घर पर बुलवाये ॥ २२ ॥
आगतायाश्च शिरःपीडने नियोगः। पाणिमवलम्ब्य चास्याः साकारं नयन-
योर्ललाटे च निदध्यात् ॥ २३ ॥
आयी हुई नायिका को सिर दबाने में लगा दे। उसका हाथ अपने हाथों में पकड़कर अपने
मस्तक और नेत्रों से लगाये ॥ २३ ॥
औषधापदेशार्थं चास्याः कर्म विनिर्दिशेत् ॥ २४ ॥
जब सिर दबा दे, तो दर्द-निवारक औषधि लगाने के लिये कहे ॥ २४ ॥
इदं त्वया कर्तव्यम्। नह्येतदृते कन्याया अन्येन कार्यमिति गच्छन्ती पुनरा-
गमनानुबन्धमेनां विसृजेत् ॥ २५ ॥
यह कार्य तुम्हें ही करना है, क्योंकि इसे कुमारिका के अतिरिक्त किसी अन्य से नहीं
कराया जाता। यदि वह जाने लगे तो पुनः आने का वचन लेकर ही जाने दे ॥ २५ ॥
अस्य च योगस्य त्रिरात्रं त्रिसन्ध्यं च प्रयुक्तिः ॥ २६ ॥
कन्यासाध्य इस योग को तीन बार रात्रि या सन्ध्या के समय ही प्रयोग करना
चाहिये ॥ २६ ॥
अभीक्ष्णदर्शनार्थमागतायाश्च गोष्ठीं वर्धयेत् ॥ २७ ॥
इस प्रपञ्च का उद्देश्य—बार बार देखने के लिये आयी हुई नायिका के साथ रोचक
वार्ताएँ करनी चाहिये ॥ २७ ॥
अन्याभिरपि सह विश्वासानार्थमधिकमधिकं चाभियुञ्जीत। न तु वाचा
निर्वदेत् ॥ २८ ॥
नायिका को विश्वास दिलाने के लिये अन्यान्य वार्ताएँ करता रहे, किन्तु अपने मुख से
उद्देश्य स्पष्ट न करे ॥ २८ ॥
दूरगतभावोऽपि हि कन्यासु न निर्वेदेन सिध्यतीति घोटकमुखः ॥ २९ ॥
युवतियों का प्रेम और विश्वास कितना भी ऊँचा पहुँच जाये, किन्तु विरक्ति से उनकी
सिद्धि नहीं होती, अतएव उनकी प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिये—यह आचार्य
घोटकमुख का मत है ॥ २९ ॥
यदा तु बहुसिद्धां मन्येत तदैवोपक्रमेत् ॥ ३० ॥
जब अनेक उपायों द्वारा नायिका को सिद्ध समझ ले, तभी उसके साथ सम्भोग के लिये
तत्पर होना चाहिये ॥ ३० ॥
प्रदोषे निशि तमसि च योषितो मन्दसाध्वसाः सुरतव्यवसायिन्यो रागवत्यश्च
भवन्ति। न च पुरुषं प्रत्याचक्षते। तस्मात्तत्कालं प्रयोजयितव्या इति
प्रायोवादः ॥ ३१ ॥
समागमकाल—प्रदोष काल में, रात्रि में और अन्धकार में स्त्रियों में भय कम रहता है,
९८ वात्स्यायन-कामसूत्र
उनका अनुराग बढ़ता है और वे सम्भोग की अभिलाषा करती हैं। ऐसे समय वे पुरुष के प्रस्ताव
को मना नहीं कर पातीं। अतएव ऐसे ही समय नायिका को सम्भोग के लिये तैयार करना
चाहिये॥ ३१॥
एकपुरुषाभियोगानां त्वसम्भवे गृहीतार्थया धात्रेयिकया सख्या वा
तस्यामन्तर्भूतया तमर्थमनिर्वदन्त्या सहैनामङ्कमानाययेत्। ततो यथोक्तमभि-
युञ्जीत॥ ३२॥
नायिका से दूर रहने के कारण यदि अकेले अभियोग सम्भव न हो, तो उसकी धाय की
पुत्री या सखी को, जो इस प्रेम-प्रसङ्ग से परिचित हो, माध्यम बना ले, और वह नायिका को
बिना बताये ही, नायक के घर ले आये। तत्पश्चात् पूर्वोक्त विधि से सम्भोग करना चाहिये॥ ३२॥
स्वां वा परिचारिकामादावेव सखीत्वेनास्याः प्रणिदध्यात्॥ ३३॥
अथवा अपनी परिचारिका को उसकी सखी बनाकर पहले से ही उसके पास छोड़
दे॥ ३३॥
यज्ञे विवाहे यात्रायामुत्सवे व्यसने प्रेक्षणक्षकव्यापृते जने तत्र तत्र च
दृष्टेङ्गिताकारां परीक्षितभावामेकाकिनीमुपक्रमेत॥ ३४॥
यज्ञ, विवाह, यात्रा, उत्सव और विपत्ति के समय सभी व्यक्ति व्यग्र (व्यस्त) हो जाते हैं।
ऐसे अवसर पर जिस युवती ने हाव-भाव और चेष्टाओं से अनुकूलता दिखा दी हो, और जिसके
भावों की परीक्षा कर ली गयी हो, उसे गान्धर्व विधि से प्राप्त कर ले॥ ३४॥
न हि दृष्टभावा योषितो देशे काले च प्रयुज्यमाना व्यावर्तन्त इति वात्स्यायनः।
इत्येकपुरुषाभियोगाः॥ ३५॥
जिनके भावों की अनेक बार परीक्षा की जा चुकी हो, ऐसी युवतियाँ देश और काल के
अनुरूप प्रयोग की जायें, तो वे कदापि मना नहीं करतीं—यह महर्षि वात्स्यायन का अभिमत
है॥ ३५॥
एकपुरुषाभियोग नामक प्रकरण पूर्ण॥
मन्दापदेशा गुणवत्यपि कन्या धनहीना कुलीनापि समानैरयाच्यमाना
मातापितृवियुक्ता वा ज्ञातिकुलवर्तिनी वा प्राप्तयौवना पाणिग्रहणं स्वयम-
भीप्सेत॥ ३६॥
प्रयोज्योपावर्तन प्रकरण : विवाह न हो पाने के कारण—हीन कुल में उत्पन्न हुई हो
या गुण सम्पन्न होने पर उसके अभिभावक विवाह न कर रहे हो, अथवा कुलीन होने पर भी
निर्धनता के कारण समानता वाले विवाह न कर रहे हों, अथवा आभिजात्य कुल में उत्पन्न होने
पर भी माता पिता से रहित हो, जाति और कुल के उच्च होने पर भी यौवन आने पर ऐसी कन्या
को स्वयं विवाह कर लेना चाहिये॥ ३६॥
सा तु गुणवन्तं शक्ते सुदर्शनं बालप्रीत्याभियोजयेत्॥ ३७॥
समान पति चुनने के उपाय—ऐसी युवती किसी ऐसे गुणवान्, शक्तिशाली और सुन्दर
युवक से विवाह करे जो बालसखा हो॥ ३७॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९९
यं वा मन्येत मातापित्रोरसमीक्षया स्वयमप्ययमिन्द्रियदौर्बल्यान्मयि प्रवर्तिष्यत
इति प्रियहितोपचारैरभीक्ष्णसंदर्शनेन च तमावर्जयेत् ॥ ३८ ॥
वर में दर्शनीय गुण—ऐसी युवती जिसको यह समझे कि यह माता-पिता की समीक्षा
(आलोचना) की चिन्ता किये बिना, अपने इन्द्रिय-दौर्बल्य के कारण स्वयं ही मुझसे अनुरक्त हो
जायेगा, उसे प्रिय और हितकर उपचारों से और हाव-भावों से अपनी ओर आकृष्ट करे ॥ ३८ ॥
माता चैनां सखीभिर्धात्रेयिकाभिश्च सह तदभिमुखीं कुर्यात् ॥ ३९ ॥
माता का कर्तव्य—माता को चाहिये कि वह युवती की धाय की पुत्री या सखियों के
साथ उसको उस युवक की ओर अग्रसर करे ॥ ३९ ॥
पुष्पगन्धताम्बूलहस्ताया विजने विकाले च तदुपस्थानम्, कलाकौशल-
प्रकाशने वा सम्वाहने शिरसः पीडने चौचित्यदर्शनम्। प्रयोज्यस्य सात्म्ययुक्ताः
कथायोगाः बालायामुपक्रमेषु यथोक्तमाचरेत् ॥ ४० ॥
बाह्य उपचार—युवती को चाहिये कि एकान्त और कुसमय (रागोद्दीपन या रात्रिकाल)
में पुष्प, गन्ध, ताम्बूल आदि से नायक का सत्कार करे। औचित्यपूर्वक कलाकौशल, अङ्गमर्दन
या शिर दबाने की अपनी कुशलता प्रकटित करे। नायक की रुचि के अनुरूप वार्तालाप करे और
बालोपक्रम प्रकरण (तृतीय अधिकरण, तृतीय अध्याय) में नायक के जो उपाय बताये गये हैं,
उन्हें भी प्रयोग में लाये ॥ ४० ॥
न चैवान्तरापि पुरुषं स्वयमभियुञ्जीत। स्वयमभियोगिनी हि युवतिः सौभाग्यं
जहातीत्याचार्याः ॥ ४१ ॥
सम्भोग के लिए पहल घातक—अत्यधिक कामातुर होने पर भी सम्भोग के लिये स्वयं
पहल न करे, क्योंकि सम्भोग के लिये स्वयं ही अभियोग करने वाली युवती अपना सौभाग्य नष्ट
कर देती है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ४१ ॥
तत्रयुक्तानां त्वभियोगानामानुलोम्येन ग्रहणम् ॥ ४२ ॥
नायक के प्रयासों को स्वीकृति—यदि नायक अभियोगों का प्रयोग करे, अर्थात्
रमणेच्छा प्रकटित करे, तो उन्हें अनुकूलता से स्वीकार करे ॥ ४२ ॥
परिष्वक्ता च न विकृतिं भजेत्। श्लक्ष्णमाकारमजानतीव प्रतिगृह्णीयात्।
वदनग्रहणे बलात्कारः ॥ ४३ ॥
आभ्यन्तर उपचार—नायक के आलिङ्गन-चुम्बन आदि करने पर अपना राग प्रकट न
होने दे। नायक के स्निग्ध व्यवहार को मुग्धभाव वाला (अनजान) बनकर ही स्वीकार करे,
और ऐसा व्यवहार करे कि नायक बलपूर्वक मुखचुम्बन कर ले ॥ ४३ ॥
रतिभावनामभ्यर्थ्यमानायाः कृच्छ्राद् गुह्यसंस्पर्शनम् ॥ ४४ ॥
यदि नायक शिश्न को स्पर्श करने के लिये प्रेरित करे, तो कठिनतापूर्वक उसका स्पर्शमात्र
ही करे ॥ ४४ ॥
अभ्यर्थितापि नातिविवृता स्वयं स्यात्। अन्यत्रानिश्चयकालात् ॥ ४५ ॥
महत्त्वपूर्ण परामर्श—नायक के प्रार्थना करने पर भी नायिका को अपने भाव और अङ्ग
१०० वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रत्यङ्गों को नहीं दिखाना चाहिये, क्योंकि वह कब और कैसे विवाह करेगा, यह अभी निश्चित
नहीं है ॥ ४५ ॥
यदा तु मन्येतानुरक्तो मयि न व्यावतिष्यत इति, तदैवैनमभियुञ्जानं
बालभावमोक्षाय त्वरेत् ॥ ४६ ॥
जब नायिका पूर्णतः आश्वस्त हो जाये कि नायक पूरे मनोयोग से मुझ पर अनुरक्त है और
वह प्रत्येक स्थिति में मुझसे विवाह करेगा ही, तभी एकान्त में प्रयत्नशील नायक को अपना
कौमार्य भङ्ग करने दे ॥ ४६ ॥
विमुक्तकन्याभावा च विश्वास्येषु प्रकाशयेत्। इति प्रयोज्यस्योपा-
वर्तनम् ॥ ४७ ॥
गान्धर्व विवाह के पश्चात् जब नायिका अपना कौमार्य भंग करा ले, तो अपनी विश्वस्त
सखियों से यह बता दे। इस प्रकार प्रयोज्य ( नायक ) को अपनी ओर आकृष्ट करने की
विधि पूर्ण हुई ॥ ४७ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
कन्याभियुज्यमाना तु ये मन्येताश्रयं सुखम्।
अनुकूलं च वश्यं च तस्य कुर्यात्परिग्रहम् ॥ ४८ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक दे रहे हैं—
सुखों का आश्रय, अनुकूल और वश्य—अपने उपायों से वर का चयन करती हुई
कन्या, जिसे सुखों का आश्रय, चित्तवृत्ति के अनुकूल चलने वाला और यथोक्तकारी (कहने के
अनुसार करने वाला) माने, उसी से विवाह करे ॥ ४८ ॥
अनपेक्ष्य गुणान् यत्र रूपमौचित्यमेव च।
कुर्वीत धनलोभेन पतिं सापत्नकेष्वपि ॥ ४९ ॥
अर्थलिप्सा—यदि युवती को अर्थलिप्सा हो, धन को ही वह सर्वस्व मानती हो तो रूप,
औचित्य और नायकोचित गुणों की ओर ध्यान न देकर, सपत्नियों के होते हुए भी, धनवान् को
ही अपना पति चुन ले ॥ ४९ ॥
तत्र युक्तगुणं वश्यं शक्तं बलवदर्थिनम्।
उपायैरभियुञ्जानं कन्या न प्रतिलोमयेत् ॥ ५० ॥
विशेष महत्त्वपूर्ण—जो युवक गुण सम्पन्न हो, अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल हो, प्रत्येक
प्रकार से समर्थ हो, प्रबल आकर्षण रखता हो, और प्राप्ति का उपाय भी कर रहा हो, ऐसे युवक
को पतिरूप में पाने का लोभ कन्या को कदापि नहीं छोड़ना चाहिये ॥ ५० ॥
वरं वश्यो दरिद्रोऽपि निर्गुणोऽप्यात्मधारणः।
गुणैर्युक्तोऽपि न त्वेवं बहुसाधारणः पतिः ॥ ५१ ॥
एकनिष्ठ ही वरणीय—चित्तवृत्ति के अनुरूप चलने वाला पति अच्छा है, भले ही वह
दरिद्र ही क्यों न हो, गुणविहीन हो, केवल परिवार का पेट पालने में समर्थ (निर्धन) हो, परन्तु
अनेक सपत्नियों वाला, गुणसम्पन्न और धनवान् पति अच्छा नहीं ॥ ५१ ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०१
प्रायेण धनिनां दारा बहवो निरवग्रहाः ।
बाह्ये सत्युपभोगेऽपि निर्विस्त्रम्भा बहिःसुखाः ॥ ५२ ॥
धनवान् की पत्नी बनने में दोष—धनवानों के घरों में प्रायः अनेक पत्नियाँ होती हैं,
किन्तु वे प्रायः सभी स्वच्छन्द हुआ करती हैं; क्योंकि उन्हें भौतिक सुखों के साधन (भवन,
वाहन, वस्त्राभूषण आदि) तो प्राप्त होते हैं, लेकिन सुरतरूप आन्तरिक सुख प्राप्त नहीं
होता ॥ ५२ ॥
नीचो यस्त्वभियुञ्जीत पुरुषः पलितोऽपि वा।
विदेशगतिशीलश्च न स संयोगमर्हति ॥ ५३ ॥
नीच, वृद्ध और प्रवासी वरणीय नहीं—यदि नीच जाति या अधम स्वभाववाला
व्यक्ति, वृद्ध व्यक्ति या निरन्तर प्रवास में रहने वाला व्यक्ति भी विवाह के लिये आमन्त्रित करे तो
उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसे व्यक्ति ही सम्प्रयोग के योग्य नहीं होते ॥ ५३ ॥
यदृच्छयाभियुक्तो यो दम्भद्यूताधिकोऽपि वा।
सपत्नीकश्च सापत्यो न स संयोगमर्हति ॥ ५४ ॥
बलात्कारी, कपटी, जुआरी वरणीय नहीं—जो स्त्री की इच्छा न होने पर भी केवल
अपनी इच्छा से सम्भोग करता है, जो कपटी और जुआरी है, और जो पत्नी और बच्चों वाला
है, उससे कदापि विवाह नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसा व्यक्ति सम्प्रयोग के योग्य नहीं
होता ॥ ५४ ॥
गुणसाम्येऽभियोक्तृणामेको वरयिता वरः।
तत्राभियोक्तरि श्रैष्ठ्यमनुरागात्मको हि सः ॥ ५५ ॥
अवरणीयों में अनुरागशील ही उत्तम—यदि कन्या को प्राप्त करने का प्रयास करने
वाले कई व्यक्ति हों, तो कन्या उसी का वरण करे जो उससे सच्चा अनुराग रखता हो। प्रयास
करने वालों में निश्छल अनुराग रखने वाला ही श्रेष्ठ होता है ॥ ५५ ॥
एकपुरुषाभियोगादि प्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न ॥
पञ्चम अध्याय
विवाहयोगप्रकरण
प्राचुर्येण कन्याया विविक्तदर्शनस्यालाभे धात्रेयिकां प्रियहिताभ्यामुपगृह्योप-
सर्पेत् ॥ १ ॥
कन्यासिद्धि की विधि—यदि कन्या का एकान्त में अधिक दर्शन सम्भव न हो, तो धाय
की पुत्री या उसकी सखी को प्रिय और हितकर कार्यों द्वारा उपकृत करके उसके समीप
भेजे ॥ १ ॥
१०२ वात्स्यायन-कामसूत्र
सा चैनामविदिता नाम नायकस्य भूत्वा तद्गुणैरनुरञ्जयेत्। तस्याश्च
रुच्यान्नायकगुणान् भूयिष्ठमुपवर्णयेत् ॥ २ ॥
निसृष्टार्था दूती के कार्य—वह नायक से अपरिचित सी बनकर उस नायिका को नायक
के गुणों पर अनुरक्त कर दे। इसके लिये वह नायक के उन्हीं गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करे
जो नायिका को रुचिकर लगते हों ॥ २ ॥
अन्येषां वरयितॄणां दोषानभिप्रायविरुद्धान् प्रतिपादयेत् ॥ ३ ॥
अन्य प्रतिद्वन्द्वियों में दोषदर्शन—अन्य नायकों (जिनमें लड़की की रुचि हो या जिनसे
विवाहविषयक बातें चल रहीं हों) के उन दोषों को प्रकट करे, जिन्हें वह पसन्द न करती हो या
जिनसे वह घृणा करती हो ॥ ३ ॥
मातापित्रोश्च गुणानभिज्ञतां लुब्धतां च चपलतां च बान्धवानाम् ॥ ४ ॥
अभिभावकों की भर्त्सना—दूती नायिका से कहे कि तुम्हारे माता-पिता और भाई-
बन्धु गुणों को नहीं समझते, वे लोभी हैं, इसलिये गुणसम्पन्न वर को न खोजकर गुणविहीन
धनवान् को चाहते हैं ॥ ४ ॥
याश्चान्या अपि समानजातीयाः कन्याः शकुन्तलाद्याः स्वबुद्ध्या भर्त्तारं प्राप्य
सम्प्रयुक्ता मोदन्ते स्म ताश्चास्या निदर्शयेत् ॥ ५ ॥
स्वयंवरण के उदाहरण—अन्य सजातीय कन्याओं और शकुन्तला आदि, जो अपनी
बुद्धि से वर चुनकर, सम्प्रयोग को प्राप्त होकर, आनन्दित रही थीं, की कहानियाँ सुनाये और उसे
स्वयंवरण के लिये प्रेरित करे ॥ ५ ॥
महाकुलेषु सापत्नकैर्बाध्यमाना विद्विष्टाः दुःखिताः परित्यक्ताश्च
दृश्यन्ते ॥ ६ ॥
नायिका को समझाये कि बड़े घरों में सपत्नियों द्वारा पीड़ित, विद्वेष का शिकार बनी,
दुःखी और पतिपरित्यक्ता स्त्रियाँ भी देखी जाती हैं ॥ ६ ॥
आयतिं चास्य वर्णयेत् ॥ ७ ॥
नायक की प्रशंसा—दूती जिस नायक से उसका विवाह कराना चाहे, उसके उज्ज्वल और
मङ्गलमय भविष्य का वर्णन करे ॥ ७ ॥
सुखमनुपहतमेकचारितायां नायकानुरागं च वर्णयेत् ॥ ८ ॥
उसका अक्षुण्ण सुख और नायक का एकचारिता (एकपत्नीव्रत) में अनुराग भी
दिखाये ॥ ८ ॥
समनोरथायाश्चास्या अपायं साध्वसं व्रीडां च हेतुभिरवच्छिन्द्यात् ॥ ९ ॥
जब दूती यह देख ले कि नायिका उसकी ओर आकृष्ट हो रही है, तो समुचित हेतुओं से
उसके भय और सङ्कोच को दूर कर दे ॥ ९ ॥
दूतीकल्पं च सकलमाचरेत् ॥ १० ॥
उसे चाहिये कि दूती के समस्त कर्मों का प्रयोग करे ॥ १० ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०३
त्वामजानतीमिव नायको बलाद् ग्रहीष्यतीति तथा सुपरिगृहीतं स्यादिति
योजयेत् ॥ ११ ॥
नायिका को बता दे कि नायक तुम्हें अपरिचित के समान हर ले जायेगा। इस प्रकार तुम
उसकी पत्नी भी बन जाओगी और तुम्हें कोई दोष भी नहीं देगा—यह अन्त में योजना
करे ॥ ११ ॥
प्रतिपन्नामभिप्रेतावकाशवर्तिनीं नायकः श्रोत्रियागारादग्निमानाय्य कुशाना-
स्तीर्य यथास्मृति हुत्वा च त्रिः परिक्रमेत् ॥ १२ ॥
विधिवत् विवाह आवश्यक—दूती द्वारा बहकायी गयी और नायक द्वारा हरण कर ली
गयी नायिका जब नायक के साथ निर्जन स्थान में पहुँच जाये, तो किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण के
घर से अग्नि लाकर, स्मृतिशास्त्र (धर्मशास्त्र) के अनुसार हवन करके नायक और नायिका,
दोनों अग्नि की तीन परिक्रमा करे ॥ १२ ॥
ततो मातरि पितरि च प्रकाशयेत् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् पति और पत्नी, दोनों अपने अपने अभिभावकों को विवाह की सूचना दे
दें ॥ १३ ॥
अग्निसाक्षिका हि विवाहा न निवर्तन्त इत्याचार्यसमयः ॥ १४ ॥
अग्नि की साक्षी में किये गये विवाह अमान्य नहीं होते—ऐसा आचार्यों का संकेत
हैं ॥ १४ ॥
दूषयित्वा चैनां शनैः स्वजने प्रकाशयेत् ॥ १५ ॥
गुप्तरूप से दूषित कर विवाह—वाञ्छित कन्या को दूषित कर धीरे से उसके परिवार
वालों को बता देना चाहिये ॥ १५ ॥
तद्बान्धवाश्च यथा कुलस्याघं परिहरन्तो दण्डभयाच्च तस्मा एवैनां दद्युस्तथा
योजयेत् ॥ १६ ॥
नायिका के बान्धव, जिस प्रकार, कुल के कलंक को दूर करते हुए और राजदण्ड से
आतङ्कित होकर उसे नायक को दे दें, वैसी ही योजना करनी चाहिये ॥ १६ ॥
अनन्तरं च प्रीत्युपग्रहेण रागेण तद्बान्धवान् प्रीणयेदिति ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब छलछद्म से कन्या नायक को पत्नीरूप में प्राप्त हो जाये, तो प्रेमपूर्ण
अनुरोधों, उपहारों और उपकारों से कन्या के बन्धु-बान्धवों को प्रसन्न कर ले ॥ १७ ॥
गान्धर्वेण विवाहेन वा चेष्टेत ॥ १८ ॥
अथवा गान्धर्व विवाह की ही चेष्टा करे और इस नीच कर्म में प्रवृत्त ही न हो ॥ १८ ॥
अप्रतिपद्यमानायामन्तश्चारिणीमन्यां कुलप्रमादं पूर्वसंसृष्टां प्रीयमाणां चोपगृह्य
तया सह विषह्यमवकाशमेनामन्यकार्यापदेशनानाययेत् ॥ १९ ॥
मध्यस्थों के माध्यम से गुप्त विवाह—जो नायिका स्वयं पाणिग्रहण कराने में असमर्थ
हो, तो दोनों (वर एवं कन्या) पक्षों से अन्तरङ्ग सम्बन्ध रखने वाली किसी कुलवधू को धन का
१०४ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोभ देकर और मध्यस्थ बनाकर, किसी बहाने से उसके साथ नायिका को निर्धारित स्थान पर
बुलाये ॥ १९ ॥
ततः श्रोत्रियागारादग्निमिति समानं पूर्वेण ॥ २० ॥
तत्पश्चात् किसी वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अग्नि मँगाकर पूर्वोक्त रीति से
विवाह कर ले ॥ २० ॥
आसन्ने च विवाहे मातरमस्यास्तदभिमतदोषैरनुशयं ग्राहयेत् ॥ २१ ॥
माता की सहमति से गुप्त विवाह—यदि नायिका का सम्बन्ध कहीं निश्चित हो गया हो,
तो विवाह-तिथि के निकट आने पर निश्चित वर के दुर्गुणों का वर्णन कर, कन्या की माता के मन
मस्तिष्क को विकृत कर दे, और जब वह उस वर को अपनी पुत्री देने को मना कर दे, तो नायक
की प्रशंसा करके उसके लिए तैयार कर ले ॥ २१ ॥
ततस्तदनुमतेन प्रातिवेश्याभवने निशि नायकमानीय श्रोत्रियागारादग्निमिति
समानं पूर्वेण ॥ २२ ॥
इसके पश्चात् उसकी माता की अनुमति से, पड़ोसी के घर पर, रात्रि के समय नायक को
बुलाकर और वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अग्नि लाकर पूर्ववत् विवाह कर ले ॥ २२ ॥
भ्रातरमस्या वा समानवयसं वेश्यासु परस्त्रीषु वा प्रसक्तमसुकरेण
साहाय्यदानेन प्रियोपग्रहैश्च सुदीर्घकालमनुरञ्जयेत् । अन्ते च स्वाभिप्रायं
ग्राहयेत् ॥ २३ ॥
भाई की सहमति से विवाह—वेश्या या परस्त्री पर पूर्णतः आसक्त, समान अवस्था वाले
कन्या के भाई को दुर्लभ सहायता और प्रिय उपहारों से दीर्घकाल तक आकृष्ट और अनुरक्त करे
और अन्त में अपना अभिप्राय प्रकट कर दे ॥ २३ ॥
प्रायेण हि युवानः समानशीलव्यसनवयसां वयस्यानामर्थे जीवितमपि
त्यजन्ति। ततस्तेनैवान्यकार्यात् तामानाययेत्। विषह्यं सावकाशमिति समानं
पूर्वेण ॥ २४ ॥
यह सुनिश्चित तथ्य है कि प्रायः युवक समान शील, व्यसन और अवस्था वाले युवकों के
लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर डालते हैं। अतएव भाई को ही माध्यम बनाकर किसी बहाने
से नायिका को बुला ले और किसी निरापद स्थान पर पूर्ववत् अग्नि की साक्षी में विवाह कर
ले ॥ २४ ॥
अष्टमीचन्द्रिकादिषु च धात्रेयिका मदनीयमेनां पाययित्वा किञ्चिदात्मनः
कार्यमुद्दिश्य नायकस्य विषह्यं देशमानयेत्। तत्रैनां मदात् संज्ञामप्रतिपद्यमानां
दूषयित्वेति समानं पूर्वेण ॥ २५ ॥
पैशाचविवाह—अष्टमी, चन्द्रिका आदि उत्सवों पर धाय की पुत्री या सखी नायिका को
मदिरा आदि पिलाकर, अपने किसी कार्य के बहाने निरापद स्थान पर ले आये। वहाँ मदिरापान
के कारण स्थिति न समझ पाने वाली नायिका को नायक से दूषित कराकर उसके बन्धु-बान्धवों
से प्रकट कर दिया जाये ॥ २५ ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०५
सुप्तां चैकचारिणीं धात्रेयिकां वारयित्वा संज्ञामप्रतिपद्यमानां दूषयित्वेति
समानं पूर्वेण ॥ २६ ॥
एकाकी को दूषित कर प्राप्त करना—सोती हुई, अकेली जाती हुई या सखी को अलग
कर एकाकी बनायी हुई नायिका को चेतनाशून्य कर , तदुपरान्त सम्भोग द्वारा उसे दूषित कर,
पूर्ववत् विवाह करना भी पैशाच विवाह है ॥ २६ ॥
ग्रामान्तरमुद्यानं वा गच्छन्तीं विदित्वा सुसंभृतसहायो नायकस्तदा रक्षिणो
वित्रास्य हत्वा वा कन्यामपहरेत् । इति विवाहयोगाः ॥ २७ ॥
राक्षसविवाह—दूसरे गाँव या उद्यान को जाती हुई नायिका का पता लगाकर, अपने
साथियों को साथ ले जाकर और उसके रक्षकों को डरा-धमकाकर या मारकर कन्या का हरण
कर लेना राक्षस विवाह है। इस प्रकार ये विवाहयोग पूर्ण हुए ॥ २७ ॥
पूर्वः पूर्वः प्रधानं स्याद् विवाहो धर्मतः स्थिते ।
पूर्वाभावे ततः कार्यो यो य उत्तर उत्तरः ॥ २८ ॥
उत्कृष्टता का विचार—यदि धर्म की दृष्टि से विचार किया जाये, तो पूर्व पूर्व विवाह श्रेष्ठ
हैं, और पूर्व के अभाव में ही उत्तरोत्तर विवाह-प्रकारों को स्वीकार करना चाहिये ॥ २८ ॥
व्यूढानां हि विवाहानामनुरागः फलं यतः ।
मध्यमोऽपि हि सद्योगो गान्धर्वस्तेन पूजितः ॥ २९ ॥
गान्धर्वविवाह की श्रेष्ठता—क्योंकि विवाह का उद्देश्य ही अनुराग प्राप्त करना है,
अतएव मध्यम होते हुए भी गान्धर्वविवाह अच्छे योग वाला होने से पूज्य है ॥ २९ ॥
सुखत्वादबहुक्लेशादपि चावरणादिह ।
अनुरागात्मकत्वाच्च गान्धर्वः प्रवरो मतः ॥ ३० ॥
गान्धर्वविवाह सुख का हेतु, अल्प प्रयत्न वाला, वरणसंविधान के प्रपञ्चों से मुक्त और
अनुरागात्मक होने से श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ३० ॥
विवाहयोग प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
१०६ वात्स्यायन-कामसूत्र
४.
भार्याधिकारिक चतुर्थ अधिकरण
प्रथम अध्याय
एकचारिणीवृत्तप्रकरण
भार्यैकचारिणी गूढविश्रम्भा देववत् पतिमानुकूल्येन वर्तेत ॥ १ ॥
एकचारिणी भार्या (पत्नी) को पति को अतिविश्वासपात्र बनकर और पति को देवता
मानकर, उसकी चित्तवृत्ति के अनुरूप व्यवहार करना चाहिये ॥ १ ॥
तन्मतेन कुटुम्बचिन्तामात्मनि संनिवेशयेत् ॥ २ ॥
एकचारिणी भार्या के आचरण—पति की सहमति से कुटुम्ब की व्यवस्था का दायित्व
अपने ऊपर ले ले ॥ २ ॥
वेश्म च शुचि सुसम्मृष्टस्थानं विरचितविविधकुसुमं श्लक्ष्णभूमितलं हृद्यदर्शनं
त्रिशवणाचरितबलिकर्म पूजितदेवतायतनं कुर्यात् ॥ ३ ॥
घर की स्वच्छता और पूजाकार्य—झाड़-पोंछ और धोकर घर को निर्मल पवित्र रखे,
उपयुक्त स्थानों पर सुगन्धित पुष्प आदि उत्पन्न कर उन्हें सजाये, आँगन को स्वच्छ और रमणीय
बनाये, प्रातः, मध्याह्न और सायं काल—तीनों समय बलिकर्म करे तथा घर के मन्दिर या पूजागृह
में समय पर पूजा करे ॥ ३ ॥
न ह्यतोऽन्यद् गृहस्थानां चित्तग्राहकमस्तीति गोनर्दीयः ॥ ४ ॥
आचार्य गोनर्दीय का मत है कि सद्गृहस्थों का चित्त आकर्षित करने के लिये इससे
बढ़कर दूसरी अन्य कोई बात नहीं है ॥ ४ ॥
गुरुषु भृत्यवर्गेषु नायकभगिनीषु तत्पतिषु च यथार्हं प्रतिपत्तिः ॥ ५ ॥
गुरुजन का सम्मान—गुरुजन (सास-ससुर, आचार्य, ब्राह्मण आदि), नौकर-चाकर,
ननद और उसके पति के साथ यथायोग्य आचरण करे ॥ ५ ॥
परिपूतेषु च हरितशाकवप्रानिक्षुस्तम्बाञ्जीरकसर्षपाजमोदशतपुष्पातमाल-
गुल्माँश्च कारयेत् ॥ ६ ॥
गृहवाटिका की व्यवस्था—साफ-सुथरे स्थान पर दैनिक प्रयोग में आने वाली
शाकभाजी की क्यारियाँ बनाये, और ईख, जीरा, सरसों, अजमोद, सौंफ एवं तमाल के पौधे
लगाये ॥ ६ ॥
कुब्जकामलमल्लिकाजातीकुरण्टकनवमालिकातगरनन्द्यावर्तजपागुल्मान-
न्यांश्च बहुपुष्पान् बालकोशीरकपातालिकाँश्च वृक्षवाटिकायां च स्थण्डिलानि
मनोज्ञानि कारयेत् ॥ ७ ॥
गुलाबवास, मोतिया, चमेली, करण्टक (नेवारी), नवमल्लिका (वासन्ती), तगर,
कदम्ब, जपाकुसुम एवं अन्यान्य फूलों के गुल्म (गाछ या झाड़ियाँ) तथा नेत्रवाला, खस.
४. भार्याधिकारिक अधिकरण १०७
पातालिका—इन्हें गृहवाटिका में लगाये और इन लता-पादपों के मध्य बैठने के लिये वेदिका
(बेंच) बनवाये ॥ ७ ॥
मध्ये कूपं वापीं दीर्घिकां वा खानयेत् ॥ ८ ॥
गृहवाटिका के मध्य में कुआँ, बावड़ी या चौकोर दीर्घिका खुदवाये ॥ ८ ॥
भिक्षुकीश्रमणाक्षपणाकुलटाकुहके-
क्षणिकामूलकारिकाभिर्नसंसृज्येत ॥ ९ ॥
त्याज्य स्त्रियाँ—भिखारिनों, बौद्ध एवं जैन साध्वियों (संवासिनियों), कुलटाओं, नाच-
गान-तमाशा दिखाने वाली नटनियों, शकुन एवं प्रश्न बताने वाली और जादू-टोना या वशीकरण
करने वाली स्त्रियों से कदापि संसर्ग न करे ॥ ९ ॥
भोजने च रुचितमिदमस्मै द्वेष्यमिदं पथ्यमिदमपथ्यमिदमिति च
विन्द्यात् ॥ १० ॥
भोजन की व्यवस्था—भोजन बनाते (या बनवाते) समय यह सदैव ध्यान रखे कि यह
पदार्थ इनको रुचिकर लगता है और यह अरुचिकर, यह इन्हें पथ्य (कल्याणकारी) है और यह
अपथ्य ॥ १० ॥
स्वरं बहिरुपश्रुत्य भवनमागच्छतः किं कृत्यमिति ब्रुवती सज्जा भवनमध्ये
तिष्ठेत् ॥ ११ ॥
पति का स्वागत—बाहर से घर में प्रवेश करते हुए पति की आवाज सुनते ही 'क्या कार्य
है ?' ऐसा मन में विचारते हुए कार्य-सम्पादन के लिये भवन के मध्य आँगन में आकर प्रस्तुत हो
जाये ॥ ११ ॥
परिचारिकामपनुद्य स्वयं पादौ प्रक्षालयेत् ॥ १२ ॥
पाद-प्रक्षालन—परिचारिका को हटाकर स्वयं पति के पैर धुलवाये ॥ १२ ॥
नायकस्य च न विमुक्तभूषणं विजने सन्दर्शने तिष्ठेत् ॥ १३ ॥
अलंकृत दिखे—एकान्त में पति के समक्ष अलंकारविहीन होकर न जाये ॥ १३ ॥
अतिव्ययमसद्व्ययं वा कुर्वाणं रहसि बोधयेत् ॥ १४ ॥
पति के अधिक व्यय करने या अनावश्यक व्यय करने पर उसे एकान्त में समझाये,
सार्वजनिक रूप में लज्जित न करे ॥ १४ ॥
आवाहे विवाहे यज्ञे गमनं सखीभिः सह गोष्ठीं देवताभिगमनमित्यनुज्ञाता
कुर्यात् ॥ १५ ॥
बहिर्गमन के लिए अनुमति—विवाह के समय वर या कन्या के घर जाने, यज्ञादि
अनुष्ठानों में सम्मिलित होने, सखियों के साथ खानपान या वार्तागोष्ठी और देवदर्शन के लिये
जाने हेतु पति की अनुमति प्राप्त कर ले ॥ १५ ॥
सर्वक्रीडासु च तदानुलोम्येन प्रवृत्तिः ॥ १६ ॥
उत्सवों में सम्मिलित होने के लिये अनुमति—लोक में आयोजित होने वाले सभी
खेलों (समारोहों) में पति की इच्छा के अनुकूल ही सम्मिलित हो ॥ १६ ॥
काम० ९
१०८ वात्स्यायन-कामसूत्र
पश्चात्संवेशनं पूर्वमुत्थानमनवबोधनं च सुप्तस्य ॥ १७ ॥
सोना और जागना—पत्नी को पति के सो जाने पर सोना चाहिये और उसके जागने से
पहले जागना और उठ जाना चाहिये ॥ १७ ॥
महानसं च सुगुप्तं स्याद्दर्शनीयं च ॥ १८ ॥
पाकशाला (रसोईघर)—पाकशाला स्वच्छ, प्रकाशपूर्ण तथा एक ओर होनी
चाहिये ॥ १८ ॥
नायकापचारेषु किञ्चित्कलुषिता नात्यर्थं निर्वदेत् ॥ १९ ॥
पति के अपराध करने पर भी अकलुषित रहना—पति के अपराध करने पर भी अल्प
अप्रसन्नता दिखाये और भविष्य में ऐसा न करने की रससिक्त चेतावनी दे ॥ १९ ॥
साधिक्षेपवचनं त्वेनं मित्रजनमध्यस्थमेकाकिनं वाप्युपालभेत। न च
मूलकारिका स्यात् ॥ २० ॥
जादू-टोनों से दूर—यदि पति को उपालम्भ देना आवश्यक ही हो, तो एकान्त या उसके
मित्रों के मध्य ही दे, किन्तु जादू-टोना या वशीकरण कदापि न करे ॥ २० ॥
नह्यतोऽन्यदप्रत्ययकसारणमस्तीति गोनर्दीयः ॥ २१ ॥
पति-पत्नी के मध्य अविश्वास उत्पन्न करने वाला इनके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं
है—ऐसा आचार्य गोनर्दीय का मत है ॥ २१ ॥
दुर्वाहतं दुर्निरीक्षितमन्यतो मन्त्रणं द्वारदेशावस्थानं निरीक्षणं वा निष्कुटेषु
मन्त्रणं विविक्तेषु चिरमवस्थानमिति वर्जयेत् ॥ २२ ॥
वर्जित कृत्य—दुर्वाक्य बोलना, आँखे तरेरकर देखना, विमुख होकर बातें करना, द्वार
पर खड़े रहना या वहाँ से आने जाने वालों को देखना, इधर उधर खड़े होकर परामर्श करना,
एकान्त में देर तक खड़े रहना—इन कुत्सित प्रवृत्तियों को छोड़ देना चाहिये ॥ २२ ॥
स्वेददन्तपङ्कदुर्गन्धांश्च बुद्ध्येतेति विरागकारणम् ॥ २३ ॥
शरीरसंस्कार और शृंगार—पसीने की गन्ध, मुख की दुर्गन्ध तथा अन्य शारीरिक
दुर्गन्धों को तत्काल दूर करना चाहिये, क्योंकि इनसे पति में विरक्ति आ सकती है ॥ २३ ॥
बहुभूषणं विविधकुसुमानुलेपनं विविधाङ्गरागसमुज्ज्वलं वास
इत्याभिगामिको वेषः ॥ २४ ॥
समागम का वेश—अनेक प्रकार के आभूषण, विविध प्रकार के सुगन्धित अनुलेप
(क्रीम), विविध प्रकार के अङ्गराग (पाउडर) लगाकर और उज्ज्वल वस्त्र पहनकर ही पति के
पास सम्भोगार्थ जाना चाहिये ॥ २४ ॥
प्रतनुलक्ष्णाल्पदुकूलता परिमितमाभरणं सुगन्धिता नात्युल्बणमनुलेपनम्।
तथा शुक्लान्यन्यानि पुष्पाणीति वैहारिको वेषः ॥ २५ ॥
गोष्ठीविहार का वेश—यदि गोष्ठीविहार के लिये जाना हो, तो नायिका शरीर पर हल्का,
पतला और चिकना परिधान पहने; केवल नाक, कान और गले में आभूषण धारण करे, चन्दन
४. भार्याधिकारिक अधिकरण १०९
आदि का अनुलेप (सुगन्धित क्रीम) लगाये, इत्रादि का प्रयोग करे और केशों में श्वेत पुष्पों की
माला लगाये ॥ २५ ॥
नायकस्य व्रतमुपवासं च स्वयमपि करणेनानुवर्तेत । वारितायां च नाहमत्र
निर्वन्धनीयेति तद्वचसो निवर्तनम् ॥ २६ ॥
व्रतोपवास — पति द्वारा किये जाने वाले व्रतोपवासों का स्वयं भी आचरण करे । यदि पति
मना करे, तो 'आप मुझसे ऐसा आग्रह न करें। मैं आपकी सहधर्मिणी हूँ, इसलिए मुझे भी आपके
व्रतोपवासों का पालन करना चाहिये' — ऐसा कहकर मना करने से रोक दे ॥ २६ ॥
मृद्विदलकाष्ठचर्मलोहभाण्डानां च काले समर्धग्रहणम् ॥ २७ ॥
समयानुसार क्रय — मिट्टी, बाँस, काष्ठ, चर्म और लोहे का उपयोगी सामान जब भी
सस्ता और अच्छा मिले खरीदकर रख ले ॥ २७ ॥
तथा लवणस्नेहयोश्च गन्धद्रव्यकटुकभाण्डौषधानां च दुर्लभानां भवनेषु
प्रच्छन्नं निधानम् ॥ २८ ॥
उपयोगी सामग्री का संग्रह — नमक, घी, तेल, सुगन्धित वस्तुएँ, कटुक, बर्तन, औषध
और दुर्लभ वस्तुओं को भवन में ढँककर सुरक्षित रखे ॥ २८ ॥
मूलकालुकपालङ्की-दमनकाम्रातकैर्वारुकत्रपुसवार्ताककूष्माण्डालाबु -
सूरणशुकनासास्वयंगुप्तातिलपर्णिकाग्निमन्थलशुनपलाण्डुप्रभृतीनां सर्वौषधीनां च
बीजग्रहणं काले वापश्च ॥ २९ ॥
मूली, आलु (अरवी), पालक, दोना, आम्रा, ककड़ी, खीरा, बैंगन, काशीफल, लौकी,
जिमीकन्द, सोनापाठा, कौंच, खम्भारी, अरणी, लहसुन, प्याज और नानाविध औषधियों के
बीज सँभालकर रखे और उन्हें समय पर बोये ॥ २९ ॥
स्वस्य च सारस्य परेभ्यो नाख्यानं भर्तृमन्त्रितस्य च ॥ ३० ॥
गोपनीयता को अक्षुण्ण रखना — अपना धन और पति की गोपनीय बातों को किसी से
नहीं कहना चाहिये ॥ ३० ॥
समानाश्च स्त्रियः कौशलेनोज्ज्वलतया पाकेन मानेन तथोपचारैरति-
शयीत ॥ ३१ ॥
समानता वाली स्त्रियों का अतिक्रमण — समान अवस्था एवं प्रतिष्ठा वाली स्त्रियों का
कलाकौशल से, उज्ज्वलता से, पाककला से, मान-सम्मान से और उपचारों से अतिक्रमण कर
जाये ॥ ३१ ॥
सांवत्सरिकमायं सङ्ख्याय तदनुरूपं व्ययं कुर्यात् ॥ ३२ ॥
[L31
११० वात्स्यायन-कामसूत्र
पशुपालनचिन्तावाहनविधानयोगाः। मेषकुक्कुटलावकशुकशारिकापरभृतमयूर-
वानरमृगाणामवेक्षणम्। दैवसिकायव्ययपिण्डीकरणमिति च विद्यात् ॥ ३३ ॥
व्यवस्थाविषयक निर्देश— भोजन से बचे गोरस (दही, मक्खन) से घी, ईख (गन्ना)
से गुड़ एवं सरसों आदि से तेल निकालना, कपास से सूत कातना और सूत से कपड़ा बुनवाना,
छींके, रस्सी, फन्दे एवं वल्कल आदि सहेजकर रखना, दासियों द्वारा अनाजों एवं दालों को
छड़ते, फटकते, दलते एवं कूटते समय ध्यान रखना, भात (चावल) का माँड़, धान की भूसी,
चावल की किनकी, पशुओं का अवशिष्ट चारा (कुट्टी) और जले हुए कोयलों का पुनः उपयोग
करना, नौकरों के वेतन एवं भोजन का ध्यान रखना, कृषि एवं पशुपालन की चिन्ता करना,
गाड़ी, रथ आदि वाहनों की व्यवस्था (रखरखाव) करना; भेड़, मुर्गा, लवा, तोता, मैना, कोयल,
मोर, बन्दर, मृग आदि पालतू पशु-पक्षियों की देखभाल और दिनभर के आय-व्यय का लेखा-
जोखा रखना—इन बातों का भार्या को सदैव ध्यान रखना चाहिये ॥ ३३ ॥
तज्जघन्यानां च जीर्णवाससां सञ्चयस्तैर्विविधरागैः शुद्धैर्वा कृतकर्मणां
परिचारकाणामनुग्रहो मानार्थेषु च दानमन्यत्र वोपयोगः ॥ ३४ ॥
पुरातन वस्त्रों का उपयोग— पति के पुराने वस्त्रों को एकत्र कर धुलवा दे। उनमें जो
रँगने योग्य हों, उन्हें रंगवा दे और अच्छा काम करने वाले नौकरों को देकर अपना अनुग्रह
(कृपा) एवं सम्मान प्रकट करे। जो वस्त्र अधिक जर्जर हों, देने योग्य न हों, उन्हें दूसरे कामों
में प्रयोग करे ॥ ३४ ॥
सुराकुम्भीनामासवकुम्भीनां च स्थापनं तदुपयोगः क्रयविक्रयावायव्यया-
ववेक्षणम् ॥ ३५ ॥
पेय की व्यवस्था—सुरा और आसव के घड़ों (पात्रों) को छिपाकर रखना और समय
पर उनका उपयोग करना, आवश्यकतानुसार उनका क्रय-विक्रय और उससे प्राप्त हानि-लाभ
को देखना भी भार्या का दायित्व है ॥ ३५ ॥
नायकमित्राणां च स्त्रगनुलेपनताम्बूलदानैः पूजनं न्यायतः ॥ ३६ ॥
पति के मित्रों से व्यवहार— पति के मित्रों का पुष्पमाला, चन्दन, ताम्बूल आदि से
समुचित स्वागत-सत्कार करना चाहिये ॥ ३६ ॥
श्वश्रूश्वशुरपरिचर्या तत्पारतन्त्र्यमनुत्तरवादिता परिमिताप्रचण्डालापकरण-
मनुच्चैर्हासः तत्प्रियाप्रियेषु स्वप्रियाप्रियेष्विव वृत्तिः ॥ ३७ ॥
सास-ससुर से व्यवहार— सास-ससुर की सेवा करना, उनकी आज्ञा मानना, उन्हें
पलटकर उत्तर न देना, उनके समक्ष शान्तभाव से सीमित बोलना और धीरे से हंसना चाहिये।
उनके प्रिय व्यक्तियों के साथ प्रिय और अप्रिय व्यक्तियों के साथ अप्रिय व्यवहार करना
चाहिये ॥ ३० ॥
भोगेष्वनुत्सेकः ॥ ३८ ॥
सुखभोगों के विषय में कदापि अभिमान नहीं करना चाहिये ॥ ३८ ॥
परिजने दाक्षिण्यम् ॥ ३९ ॥
४. भार्याधिकारिक अधिकरण १११
परिवार के सभी सदस्यों के साथ प्रीतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिये ॥ ३९ ॥
नायकस्यानिवेद्य न कस्मैचिद्दानम् ॥ ४० ॥
पति की अनुमति के बिना किसी को कोई वस्तु न दे ॥ ४० ॥
स्वकर्मसु भृत्यजननियमनमुत्सवेषु चास्य पूजनमित्येकचारिणीवृत्तम् ॥ ४१ ॥
नौकरों को उनके काम में लगाये रहे, और त्यौहार, उत्सव आदि पर उनका सम्मान भी
करे। इस प्रकार एकचारिणीवृत्त पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
प्रवासे मङ्गलमात्राभरणा देवतोपवासपरा वार्तायां स्थिता गृहानवेक्षेत ॥ ४२ ॥
सात्त्विक जीवनयापन—पति के विदेश जाने पर मात्र माङ्गलिक आभूषण धारण करे,
शेष सभी को उतार दे, देवताओं की पूजा और उपवास में लगी रहे, और पति की शिक्षाओं का
पालन करती हुई घर की व्यवस्था देखे ॥ ४२ ॥
शय्या च गुरुजनमूले। तदभिमता कार्यनिष्पत्तिः। नायकाभिमतानां
चार्थानामर्जने प्रतिसंस्कारे च यत्नः ॥ ४३ ॥
गुरुजनों के समीप शयन—पति के विदेश जाने पर पत्नी को सास-ससुर के समीप ही
सोना चाहिये, उनके सुझाव और परामर्श से ही कार्य करना चाहिये तथा पति के प्रिय पदार्थों को
एकत्र करने एवं उनकी रक्षा करने का प्रयत्न करना चाहिये ॥ ४३ ॥
नित्यनैमित्तकेषु कर्मसूचितो व्ययः। तदारब्धानां च कर्मणां समापने
मतिः ॥ ४४ ॥
अनधिक व्यय—नित्य एवं नैमित्तिक कार्यों में समुचित या पति द्वारा निर्धारित ही व्यय
करे। पति ने जिन कार्यों का समारम्भ किया हो, उन्हें यथासमय पूर्ण करने की निरन्तर चेष्टा
करती रहे ॥ ४४ ॥
ज्ञातिकुलस्थानभिगमनमन्यत्र व्यसनोत्सवाभ्याम्। तत्रापि नायकपरिजना-
धिष्ठिताया नातिकालमवस्थानमपरिवर्तितप्रवासवेषता च ॥ ४५ ॥
अत्यावश्यक होने पर ही बहिर्गमन—अपने माता-पिता के घर भी व्यसन (मृत्यु
आदि) और उत्सव (विवाह आदि) के अतिरिक्त न जाये। वहाँ भी ससुरकुल का एक व्यक्ति
(देवर या ननद) साथ ले जाये और अधिक समय न लगाये तथा उत्सव में भी प्रोषित पतिकाओं
जैसी सरल एवं सात्त्विक वेशभूषा ही धारण करे ॥ ४५ ॥
गुरुजनानुज्ञातानां करणमुपवासानाम्। परिचारकैः शुचिभिराज्ञाधिष्ठि-
तैरनुमतेन क्रयविक्रयकर्मणा सारस्यापूरणं तनूकरणं च शक्त्या व्ययानाम् ॥ ४६ ॥
उपवास एवं अर्थ-व्यवस्था—सास-ससुर की अनुमति से ही व्रतोपवास करें। ईमानदार
और आज्ञाकारी नौकरों के माध्यम से क्रय-विक्रय कर धनाभाव को पूरा करे और व्यय में
यथासम्भव कमी लाये ॥ ४६ ॥
आगते च प्रकृतिस्थाया एव प्रथमतः दर्शनं दैवतपूजनमुपहाराणां
चाहरणमिति प्रवासचर्या ॥ ४७ ॥
प्रोषितपतिका के रूप में ही दर्शन—पति के प्रवास से लौटने पर पहली बार पत्नी
११२ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रोषितपतिका के ही रूप में दिखे; उसकी वापसी पर पत्नी देवपूजन करे और भेंट चढ़ाये। यह
प्रवासचर्या पूर्ण हुई ॥ ४० ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
तद्वृत्तमनुवर्तेत नायकस्य हितैषिणी।
कुलयोषा पुनर्भूवार् वेश्या वाप्येकचारिणी ॥
धर्ममर्थं तथा कामं लभन्ते स्थानमेव च।
निःसपत्नं च भर्तारं नार्यः सद्वृत्तमाश्रिताः ॥ ४८ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं—
एकचारिणी भार्या का चाहे वह कुलवधू हो, पुनर्भू हो अथवा वेश्या हो, यह कर्तव्य है कि
वह अपने पति की हितैषिणी बनकर सदाचार का पालन करे। स्त्रियाँ सदाचार पर चलकर ही
धर्म, अर्थ, काम, प्रतिष्ठा और सपत्नी (सौत) विहीन पति प्राप्त करती हैं ॥ ४८ ॥
एकचारिणीवृत्त प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
द्वितीय अध्याय
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण
जाड्यदौःशील्यदौर्भाग्येभ्यः प्रजानुत्पत्तेराभीक्ष्ण्येन दारिकोत्पत्तेर्नायक-
चापलाद्वा सपत्न्यधिवेदनम् ॥ १ ॥
द्वितीय विवाह का कारण—मूर्खता, चरित्रहीनता, दुर्भाग्य, सन्तानहीनता, बार बार
लड़कियों का उत्पन्न होना या पति की चञ्चलता के कारण पत्नी को सपत्नी की वेदना भोगनी
पड़ती है ॥ १ ॥
तदादित एव भक्तिशीलवैदग्ध्यख्यापनेन परिजिहीर्षेत्। प्रजानुत्पत्तौ च
स्वयमेव सापत्नके चोदयेत् ॥ २ ॥
विदग्ध भार्या का कर्तव्य—भार्या को चाहिये कि वह प्रारम्भ से ही पतिभक्ति,
सच्चरित्रता और विदग्धता का आचरण कर पति को दूसरा विवाह करने का अवसर ही न दे।
यदि सन्तान उत्पन्न न हो, तो स्वयं ही पति को दूसरा विवाह करने के लिये प्रेरित करे ॥ २ ॥
अधिविद्यमाना च यावच्छक्तियोगादात्मनोऽधिकत्वे स्थितिं कारयेत् ॥ ३ ॥
ज्येष्ठा का दायित्व—ज्येष्ठा को चाहिये कि अपने को यथाशक्ति अधिक हो बनाकर रखे
अर्थात् अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाये ॥ ३ ॥
आगतां चैनां भगिनीवदीक्षेत। नायकविदितं च प्रादोषिकं विधिमतीव
यत्नादस्याः कारयेत्। सौभाग्यजं वैकृतमुत्सेकं वास्या नाद्रियेत ॥ ४ ॥
कनिष्ठा के साथ व्यवहार—नवपरिणीता को अपनी बहिन के समान समझे। प्रथम रात्रि
४. भार्याधिकारिक अधिकरण ११३
में सम्भोग के लिये उसका शृङ्गार एवं शयनव्यवस्था इस तरह प्रयत्नपूर्वक करा दे जिससे उन
दोनों को यह पता चले कि यह सम्पादन उसी ने किया है। यदि कनिष्ठा सौभाग्यवश
अनादरपूर्वक बोले या मान दिखाये तो उसे कदापि सहन न करे ॥ ४ ॥
भर्तारि प्रमाद्यन्तीमुपेक्षेत। यत्र मन्येत्तार्थमियं स्वयमपि प्रतिपत्स्यत इति
तत्रैनामादरत एवानुशिष्यात् ॥ ५ ॥
पतिविषयक प्रमाद पर उपेक्षा—यदि कनिष्ठा पतिविषयक कोई प्रमाद करे तो उसकी
उपेक्षा कर दे। यदि यह समझे कि पति को प्राप्त करने के लिये यह स्वयं ही संभल जायेगी तो
उसे आदरपूर्वक स्वयं समझा दे ॥ ५ ॥
नायकसम्भवे च रहसि विशेषानधिकान् दर्शयेत् ॥ ६ ॥
वैशिष्ट्यप्रदर्शन—ऐसे एकान्त में उसे कामकला की शिक्षा दे जहाँ से पति भी सुन
सके ॥ ६ ॥
तदपत्येष्वविशेषः। परिजनवर्गेऽधिकानुकम्पा। मित्रवर्गे प्रीतिः। आत्मज्ञातिषु
नात्यादरः। तज्ज्ञातिषु चातिसम्भ्रमः ॥ ७ ॥
सन्तति, परिजन एवं पुरजनों से प्रेम—कनिष्ठा के बच्चों से अत्यधिक प्रेम करे, उसके
परिजनों (सेवकों) पर अनुग्रह रखे, उसकी सखियों से प्रीति रखे और उसके भाई-भतीजों को
अपनों से अधिक आदर दे ॥ ७ ॥
बह्वीभिस्त्वधिविन्ना अव्यवहितया संसृज्येत् ॥ ८ ॥
कई सपत्नियों में द्वितीय से संसर्ग—यदि कई सपत्नयाँ हों, तो ज्येष्ठा को अपने से
दूसरी के साथ संसर्ग रखना चाहिये ॥ ८ ॥
यां तु नायकोऽधिकां चिकीर्षेत्तां भूतपूर्वसुभगया प्रोत्साह्य कलहयेत् ॥ ९ ॥
कलह की योजना—पति जिस (नवप्रिया) पत्नी को अब सर्वाधिक प्रेम करता हो,
उसके साथ उस (पूर्वप्रिया) पत्नी को भड़काकर लड़वा दे जिसे पति पहले सर्वाधिक प्रेम
करता था ॥ ९ ॥
ततश्चानुकम्पेत ॥ १० ॥
तत्पश्चात् कलह बढ़ाने के लिये नवोढ़ा को आश्वासन दे दे ॥ १० ॥
ताभिरेकत्वेनाधिकां चिकीर्षितां स्वयमविवदमाना दुर्जनीकुर्यात् ॥ ११ ॥
पतिप्रिया की निकृष्टता-सिद्धि—यदि पति किसी पत्नी को अधिक प्रेम और महत्त्व
देना चाहे, तो ज्येष्ठा को चाहिये कि स्वयं विवाद में न पड़ते हुए, उसे अन्य सपत्नियों से लड़ा-
लड़ाकर निकृष्ट (दुष्ट) सिद्ध करा दे ॥ ११ ॥
नायकेन तु कलहितामेनां पक्षपातावलम्बनोपबृंहितामाश्वासयेत् ॥ १२ ॥
कलहकारिणी को आश्वासन—जब पति का नवप्रिया से कलह हो जाये, और वह
पति को रूक्ष वचन कह दे, तो उसे आश्वासन दे दे ॥ १२ ॥
कलहं च वर्धयेत् ॥ १३ ॥
कलहवर्धन—ज्येष्ठा को चाहिये कि सपत्नियों में कलह बढ़ाती रहे ॥ १३ ॥