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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 248 में से

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पृष्ठ 124

९८ वात्स्यायन-कामसूत्र
उनका अनुराग बढ़ता है और वे सम्भोग की अभिलाषा करती हैं। ऐसे समय वे पुरुष के प्रस्ताव
को मना नहीं कर पातीं। अतएव ऐसे ही समय नायिका को सम्भोग के लिये तैयार करना
चाहिये॥ ३१॥
एकपुरुषाभियोगानां त्वसम्भवे गृहीतार्थया धात्रेयिकया सख्या वा
तस्यामन्तर्भूतया तमर्थमनिर्वदन्त्या सहैनामङ्कमानाययेत्। ततो यथोक्तमभि-
युञ्जीत॥ ३२॥
नायिका से दूर रहने के कारण यदि अकेले अभियोग सम्भव न हो, तो उसकी धाय की
पुत्री या सखी को, जो इस प्रेम-प्रसङ्ग से परिचित हो, माध्यम बना ले, और वह नायिका को
बिना बताये ही, नायक के घर ले आये। तत्पश्चात् पूर्वोक्त विधि से सम्भोग करना चाहिये॥ ३२॥
स्वां वा परिचारिकामादावेव सखीत्वेनास्याः प्रणिदध्यात्॥ ३३॥
अथवा अपनी परिचारिका को उसकी सखी बनाकर पहले से ही उसके पास छोड़
दे॥ ३३॥
यज्ञे विवाहे यात्रायामुत्सवे व्यसने प्रेक्षणक्षकव्यापृते जने तत्र तत्र च
दृष्टेङ्गिताकारां परीक्षितभावामेकाकिनीमुपक्रमेत॥ ३४॥
यज्ञ, विवाह, यात्रा, उत्सव और विपत्ति के समय सभी व्यक्ति व्यग्र (व्यस्त) हो जाते हैं।
ऐसे अवसर पर जिस युवती ने हाव-भाव और चेष्टाओं से अनुकूलता दिखा दी हो, और जिसके
भावों की परीक्षा कर ली गयी हो, उसे गान्धर्व विधि से प्राप्त कर ले॥ ३४॥
न हि दृष्टभावा योषितो देशे काले च प्रयुज्यमाना व्यावर्तन्त इति वात्स्यायनः।
इत्येकपुरुषाभियोगाः॥ ३५॥
जिनके भावों की अनेक बार परीक्षा की जा चुकी हो, ऐसी युवतियाँ देश और काल के
अनुरूप प्रयोग की जायें, तो वे कदापि मना नहीं करतीं—यह महर्षि वात्स्यायन का अभिमत
है॥ ३५॥
एकपुरुषाभियोग नामक प्रकरण पूर्ण॥
मन्दापदेशा गुणवत्यपि कन्या धनहीना कुलीनापि समानैरयाच्यमाना
मातापितृवियुक्ता वा ज्ञातिकुलवर्तिनी वा प्राप्तयौवना पाणिग्रहणं स्वयम-
भीप्सेत॥ ३६॥
प्रयोज्योपावर्तन प्रकरण : विवाह न हो पाने के कारण—हीन कुल में उत्पन्न हुई हो
या गुण सम्पन्न होने पर उसके अभिभावक विवाह न कर रहे हो, अथवा कुलीन होने पर भी
निर्धनता के कारण समानता वाले विवाह न कर रहे हों, अथवा आभिजात्य कुल में उत्पन्न होने
पर भी माता पिता से रहित हो, जाति और कुल के उच्च होने पर भी यौवन आने पर ऐसी कन्या
को स्वयं विवाह कर लेना चाहिये॥ ३६॥
सा तु गुणवन्तं शक्ते सुदर्शनं बालप्रीत्याभियोजयेत्॥ ३७॥
समान पति चुनने के उपाय—ऐसी युवती किसी ऐसे गुणवान्, शक्तिशाली और सुन्दर
युवक से विवाह करे जो बालसखा हो॥ ३७॥