वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०५
सुप्तां चैकचारिणीं धात्रेयिकां वारयित्वा संज्ञामप्रतिपद्यमानां दूषयित्वेति
समानं पूर्वेण ॥ २६ ॥
एकाकी को दूषित कर प्राप्त करना—सोती हुई, अकेली जाती हुई या सखी को अलग
कर एकाकी बनायी हुई नायिका को चेतनाशून्य कर , तदुपरान्त सम्भोग द्वारा उसे दूषित कर,
पूर्ववत् विवाह करना भी पैशाच विवाह है ॥ २६ ॥
ग्रामान्तरमुद्यानं वा गच्छन्तीं विदित्वा सुसंभृतसहायो नायकस्तदा रक्षिणो
वित्रास्य हत्वा वा कन्यामपहरेत् । इति विवाहयोगाः ॥ २७ ॥
राक्षसविवाह—दूसरे गाँव या उद्यान को जाती हुई नायिका का पता लगाकर, अपने
साथियों को साथ ले जाकर और उसके रक्षकों को डरा-धमकाकर या मारकर कन्या का हरण
कर लेना राक्षस विवाह है। इस प्रकार ये विवाहयोग पूर्ण हुए ॥ २७ ॥
पूर्वः पूर्वः प्रधानं स्याद् विवाहो धर्मतः स्थिते ।
पूर्वाभावे ततः कार्यो यो य उत्तर उत्तरः ॥ २८ ॥
उत्कृष्टता का विचार—यदि धर्म की दृष्टि से विचार किया जाये, तो पूर्व पूर्व विवाह श्रेष्ठ
हैं, और पूर्व के अभाव में ही उत्तरोत्तर विवाह-प्रकारों को स्वीकार करना चाहिये ॥ २८ ॥
व्यूढानां हि विवाहानामनुरागः फलं यतः ।
मध्यमोऽपि हि सद्योगो गान्धर्वस्तेन पूजितः ॥ २९ ॥
गान्धर्वविवाह की श्रेष्ठता—क्योंकि विवाह का उद्देश्य ही अनुराग प्राप्त करना है,
अतएव मध्यम होते हुए भी गान्धर्वविवाह अच्छे योग वाला होने से पूज्य है ॥ २९ ॥
सुखत्वादबहुक्लेशादपि चावरणादिह ।
अनुरागात्मकत्वाच्च गान्धर्वः प्रवरो मतः ॥ ३० ॥
गान्धर्वविवाह सुख का हेतु, अल्प प्रयत्न वाला, वरणसंविधान के प्रपञ्चों से मुक्त और
अनुरागात्मक होने से श्रेष्ठ माना जाता है ॥ ३० ॥
विवाहयोग प्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥