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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 248 में से

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पृष्ठ 128

१०२ वात्स्यायन-कामसूत्र
सा चैनामविदिता नाम नायकस्य भूत्वा तद्गुणैरनुरञ्जयेत्। तस्याश्च
रुच्यान्नायकगुणान् भूयिष्ठमुपवर्णयेत् ॥ २ ॥
निसृष्टार्था दूती के कार्य—वह नायक से अपरिचित सी बनकर उस नायिका को नायक
के गुणों पर अनुरक्त कर दे। इसके लिये वह नायक के उन्हीं गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करे
जो नायिका को रुचिकर लगते हों ॥ २ ॥
अन्येषां वरयितॄणां दोषानभिप्रायविरुद्धान् प्रतिपादयेत् ॥ ३ ॥
अन्य प्रतिद्वन्द्वियों में दोषदर्शन—अन्य नायकों (जिनमें लड़की की रुचि हो या जिनसे
विवाहविषयक बातें चल रहीं हों) के उन दोषों को प्रकट करे, जिन्हें वह पसन्द न करती हो या
जिनसे वह घृणा करती हो ॥ ३ ॥
मातापित्रोश्च गुणानभिज्ञतां लुब्धतां च चपलतां च बान्धवानाम् ॥ ४ ॥
अभिभावकों की भर्त्सना—दूती नायिका से कहे कि तुम्हारे माता-पिता और भाई-
बन्धु गुणों को नहीं समझते, वे लोभी हैं, इसलिये गुणसम्पन्न वर को न खोजकर गुणविहीन
धनवान् को चाहते हैं ॥ ४ ॥
याश्चान्या अपि समानजातीयाः कन्याः शकुन्तलाद्याः स्वबुद्ध्या भर्त्तारं प्राप्य
सम्प्रयुक्ता मोदन्ते स्म ताश्चास्या निदर्शयेत् ॥ ५ ॥
स्वयंवरण के उदाहरण—अन्य सजातीय कन्याओं और शकुन्तला आदि, जो अपनी
बुद्धि से वर चुनकर, सम्प्रयोग को प्राप्त होकर, आनन्दित रही थीं, की कहानियाँ सुनाये और उसे
स्वयंवरण के लिये प्रेरित करे ॥ ५ ॥
महाकुलेषु सापत्नकैर्बाध्यमाना विद्विष्टाः दुःखिताः परित्यक्ताश्च
दृश्यन्ते ॥ ६ ॥
नायिका को समझाये कि बड़े घरों में सपत्नियों द्वारा पीड़ित, विद्वेष का शिकार बनी,
दुःखी और पतिपरित्यक्ता स्त्रियाँ भी देखी जाती हैं ॥ ६ ॥
आयतिं चास्य वर्णयेत् ॥ ७ ॥
नायक की प्रशंसा—दूती जिस नायक से उसका विवाह कराना चाहे, उसके उज्ज्वल और
मङ्गलमय भविष्य का वर्णन करे ॥ ७ ॥
सुखमनुपहतमेकचारितायां नायकानुरागं च वर्णयेत् ॥ ८ ॥
उसका अक्षुण्ण सुख और नायक का एकचारिता (एकपत्नीव्रत) में अनुराग भी
दिखाये ॥ ८ ॥
समनोरथायाश्चास्या अपायं साध्वसं व्रीडां च हेतुभिरवच्छिन्द्यात् ॥ ९ ॥
जब दूती यह देख ले कि नायिका उसकी ओर आकृष्ट हो रही है, तो समुचित हेतुओं से
उसके भय और सङ्कोच को दूर कर दे ॥ ९ ॥
दूतीकल्पं च सकलमाचरेत् ॥ १० ॥
उसे चाहिये कि दूती के समस्त कर्मों का प्रयोग करे ॥ १० ॥